एक सड़क हादसे के बाद बाइक चलाना नरेंद्र के लिए सपना हो गया था। कई साल से वे अपने रोजमर्रा के कामों के लिए परिजनों या दूसरों पर निर्भर थे। लेकिन, अब ऐसा नहीं है। इलेक्ट्रॉनिक प्रोस्थेटिक हाथों ने उनकी जिंदगी में फिर से वही चमक बिखेर दी है। 23 साल पहले करंट से महेंद्र के दोनों हाथ जल गए थे। अब उन्हें भी नई जिंदगी मिल गई है। स्वास्थ्य विभाग और एनएचएम की पहल से सिविल अस्पताल हथाईखेड़ा में ऐसे 113 लोगों को नि:शुल्क इलेक्ट्रॉनिक प्रोस्थेटिक हाथ लगाए गए। कोई अरसे बाद लिखेगा तो कोई गाड़ी दौड़ाएगा। डॉक्टरों का कहना है कि इन हाथों से 7 किलो तक वजन उठाया जा सकेगा। इनमें कुछ ऐसे लोग भी शामिल थे, जिन्हें जन्मजात ही एक हाथ नहीं था। मशीनी हाथों में भरी खुशियां तो फूले नहीं समाए हादसे के बाद मैं अपनी बाइक तक नहीं चला पा रहा था। हर काम के लिए दूसरों पर निर्भर रहना बहुत मुश्किल था। अब मैं फिर से खुद काम कर सकूंगा और अपनी गाड़ी चला सकूंगा। – नरेंद्र साल 2003 में खेत में करंट लगने के बाद मेरे दोनों हाथ जल गए थे। 23 साल बाद इलेक्ट्रॉनिक हाथ मिलने से अब मैं खुद वाहन चला सकूंगा और घर के छोटे काम कर सकूंगा। यह मेरे लिए नई जिंदगी है। -महेंद्र सिंह कई साल बाद मैंने दोबारा पेन पकड़कर लिखा। यह मेरे लिए सपने जैसा था। अब मैं अपने विचारों को फिर से कागज पर उतार सकूंगी। -साक्षी बटन से अंगुलियां ऑपरेट हो रहीं
इन हाथों की मदद से व्यक्ति सुई जैसी छोटी चीज पकड़ने से लेकर 7 किलो तक वजन उठा सकेंगे। खाना खाना, लिखना, बोतल पकड़ना या डिजाइनिंग जैसे काम अब उनके लिए आसान हो जाएंगे। हाथों में उंगलियों को खोलने-बंद करने के लिए बटन दिए गए हैं। बैटरी से संचालित होते हैं हाथ
शिविर में मुख्यत: गैंगरीन, कैंसर, रोड या ट्रेन एक्सीडेंट, मशीन क्रश या इलेक्ट्रानिक शॉक के कारण हाथ गंवाने वाले ऐसे लोग जिनके कोहनी से निचला हिस्सा नहीं है, उन्हें बैटरी से संचालित होने वाले कृत्रिम हाथ लगाए गए हैं।
– डॉ. मनीष शर्मा, सीएमएचओ
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