OMG! 4 फीट की लाठी से 10-12 लोगों को बांध देते हैं भगवानदास, दुर्लभ ‘बंदिश विधा’ के लिए राष्ट्रपति करेंगी सम्मानित 

OMG! 4 फीट की लाठी से 10-12 लोगों को बांध देते हैं भगवानदास, दुर्लभ ‘बंदिश विधा’ के लिए राष्ट्रपति करेंगी सम्मानित 


अनुज गौतम, सागर: मध्यप्रदेश के सागर से एक ऐसी खबर आई है, जिसने पूरे बुंदेलखंड को गर्व से भर दिया है. बुंदेली लोकयुद्ध कला को मिटने से बचाने वाले साधक भगवानदास रैकवार को भारत सरकार ने पद्मश्री अवार्ड 2026 देने का ऐलान किया है. यह सम्मान सिर्फ एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि उस पूरी लोकसंस्कृति को मिला है, जिसे भगवानदास ने 60 साल की साधना से जिंदा रखा.

बुंदेली युद्ध कला के चलते-फिरते दस्तावेज
लाठी, तलवार और भाले के पारंपरिक प्रहार से आगे बढ़कर भगवानदास रैकवार ने बुंदेली मार्शल आर्ट की एक दुर्लभ और लगभग लुप्त होती विधा ‘बंदिश’ को नई पहचान दी. आज उन्हें बुंदेली संस्कृति का “चलता-फिरता दस्तावेज” कहा जाता है. उनकी वजह से यह कला अब सिर्फ अखाड़ों तक सीमित नहीं, बल्कि देशभर में पहचानी जाने लगी है.

क्या है ‘बंदिश’ विधा?
बुंदेली मार्शल आर्ट में ‘बंदिश’ का मतलब होता है बांधना या रोकना. इस विधा में सामने वाले के लाठी प्रहार का जवाब सीधे वार से नहीं दिया जाता. बल्कि अपनी लाठी से उसकी लाठी को फंसा लिया जाता है, घुमाया जाता है या दबाकर पूरी तरह जाम कर दिया जाता है, ताकि वह दोबारा वार ही न कर सके. भगवानदास बताते हैं कि बंदिश केवल ताकत की नहीं, बल्कि संतुलन, फुर्ती और मानसिक एकाग्रता की कला है. यह आक्रामकता नहीं, बल्कि आत्मरक्षा और नियंत्रण सिखाती है.

पिता की विरासत, बेटे की सोच
उनके बेटे राजकुमार रैकवार, जो श्री राम छत्रसाल अखाड़ा को आगे बढ़ा रहे हैं, कहते हैं कि कोई भी कला अगर एक गांव या जिले में सिमट जाए तो खत्म हो जाती है. पिताजी का सपना था कि बुंदेली युद्ध कला देश के हर कोने तक पहुंचे. इसी सोच के साथ उन्होंने देशभर में वर्कशॉप कीं, थिएटर ग्रुप्स को ट्रेनिंग दी और लड़कियों व लड़कों दोनों को समान रूप से यह कला सिखाई. आज उनके शिष्य इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं.

लाठी से ‘बांधने’ की अनोखी तकनीक
राजकुमार बताते हैं कि बंदिश शैली को युद्ध कला में उनके पिता ने ही विकसित किया और इसमें उन्हें महारथ हासिल है. आमतौर पर किसी को बांधने के लिए रस्सी या तार की जरूरत होती है, लेकिन लाठी से बांध देना बेहद कठिन काम है. भगवानदास एक लाठी से कई लोगों को इस तरह जकड़ सकते हैं कि बिना उनकी अनुमति कोई छूट नहीं सकता. यही उनके अखाड़े की सबसे बड़ी खासियत है, जो आज पूरे देश में पहचानी जाती है.

अखाड़े में जन्मी साधना
भगवानदास रैकवार का जन्म 2 जनवरी 1944 को सागर के रामपुरा वार्ड स्थित छत्रसाल व्यायाम शाला परिसर में हुआ. पिता स्व. गोरेलाल रैकवार के सान्निध्य में बचपन से अखाड़ा संस्कृति को देखा. 1964 में, मात्र 20 वर्ष की उम्र में, नवरात्र से पहले लाठी, तलवार, भाला और त्रिशूल के अभ्यास को देखकर उन्होंने तय कर लिया कि जीवन इसी कला को समर्पित करेंगे.

बुंदेलखंड की कला को मिला राष्ट्रीय सम्मान
पद्मश्री अवार्ड 2026 के ऐलान के साथ ही यह साफ हो गया है कि बुंदेली युद्ध कला अब सिर्फ लोक परंपरा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय धरोहर के रूप में पहचानी जाने लगी है.



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