बिहार क्रिकेट टीम का एलीट कप्तान, कमान संभालते ही टीम को बनाया चैंपियन

बिहार क्रिकेट टीम का एलीट कप्तान, कमान संभालते ही टीम को बनाया चैंपियन


पटना:  बिहार क्रिकेट के इतिहास में सीजन 2025-26 सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया है. इस पूरे सफर में टीम के कप्तान साकिबुल गनी हर मायने में लकी साबित हुए. पिछले सीजन में ही कप्तानी की जिम्मेदारी संभालने वाले साकिबुल गनी के नेतृत्व में बिहार ने इस बार विजय हजारे ट्रॉफी और रणजी ट्रॉफी के प्लेट ग्रुप में शानदार प्रदर्शन करते हुए खिताब अपने नाम किया और सीधे एलीट ग्रुप में जगह बना ली है.

साकिबुल गनी ने खेली थी विस्फोटक कप्तानी पारी

इन दोनों टूर्नामेंटों में कप्तान साकिबुल गनी का प्रदर्शन भी उतना ही यादगार रहा है. विजय हजारे ट्रॉफी में उन्होंने अपनी विस्फोटक बल्लेबाजी का परिचय देते हुए टूर्नामेंट की सबसे तेज शतकीय पारी खेली. वहीं, रणजी ट्रॉफी के निर्णायक मुकाबले में दबाव की स्थिति में शतक जड़कर टीम को मजबूत स्थिति में पहुंचाया. उनकी कप्तानी और व्यक्तिगत प्रदर्शन ने बिहार टीम को नई पहचान दिलाई है.

कप्तान साकिबुल लोकल 18 से बोले

वहीं, चैंपियन बनने के बाद बिहार क्रिकेट में जश्न का माहौल है. इसी खास मौके पर लोकल 18 ने बिहार टीम के कप्तान साकिबुल गनी से खास बातचीत की. उन्होंने टीम की मेहनत, रणनीति और इस ऐतिहासिक सफलता के सफर पर खुलकर बातचीत की.

बीसीए ने जताया भरोसा,तो दिया रिजल्ट 

कप्तान साकिबुल गनी ने बताया कि सबसे पहले बीसीए को बहुत-बहुत धन्यवाद देना चाहता हूं. क्योंकि उन्होंने मुझ पर भरोसा जताया और मुझे टीम की कमान सौंपी. उसका रिजल्ट भी मैंने दिया. टीम को एलीट ग्रुप में पहुंचाया. दो-दो खास टूर्नामेंट हम लोग चैंपियन बने हैं. पूरी टीम जोश में है और काफी अच्छी फीलिंग है. अगले साल हम लोग एलीट ग्रुप में खेलेंगे तो पूरी कोशिश रहेगी कि उसमें भी चैंपियन बने और बिहार का नाम रोशन करें.

डेब्यू करते ही जड़ दिया था तिहरा शतक

कप्तान साकिबुल गनी की काबिलियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने रणजी ट्रॉफी में डेब्यू करते ही इतिहास रच दिया था. अपने पहले ही फर्स्ट क्लास मुकाबले में साकिबुल गनी ने 341 रनों की ऐतिहासिक पारी खेली और ऐसा करने वाले वे दुनिया के पहले क्रिकेटर बने.

यही नहीं, मौजूदा सीजन की विजय हजारे ट्रॉफी में अरुणाचल प्रदेश के खिलाफ उन्होंने महज 32 गेंदों में शतक लगाकर सबसे तेज सेंचुरी का रिकॉर्ड भी अपने नाम कर लिया. इन रिकॉर्डतोड़ पारियों को लेकर साकिबुल गनी कहते हैं कि मैदान पर उतरते वक्त उनका पूरा ध्यान टीम को मजबूत स्थिति में पहुंचाने पर रहता है. उनका मानना है कि जब लक्ष्य टीम की जीत होता है तो रिकॉर्ड अपने आप बनते चले जाते हैं.

भाई ने सिखाया क्रिकेट

अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए साकिबुल गनी बताते हैं कि क्रिकेट के प्रति लगाव उन्हें बचपन से ही था, लेकिन करीब 10 से 12 साल की उम्र में उन्होंने पहली बार बल्ला थामा. क्रिकेट की बारीकियां उन्होंने अपने बड़े भाई फैसल गनी से ही सीखी. शुरुआती दौर में न सिर्फ खेल के नियम समझाए. बल्कि एक खिलाड़ी के तौर पर सोचने का तरीका भी सिखाया. भाई खुद क्रिकेटर रहे हैं, इसलिए वही उनके पहले कोच, मेंटर और सबसे बड़े मार्गदर्शक बने.

साकिबुल बताते हैं कि साल 2020 में उन्होंने रणजी ट्रॉफी के जरिए फर्स्ट क्लास क्रिकेट में डेब्यू किया और इसके बाद से लगातार स्टेट टीम के लिए खेल रहे हैं. वे भारतीय क्रिकेट के दिग्गज बल्लेबाज वीरेंद्र सहवाग को अपना आदर्श मानते हैं और उन्हीं की तरह बेखौफ और आक्रामक अंदाज में बल्लेबाजी करने की कोशिश करते हैं.

पिता हैं किसान, गरीबी के बीच जिंदा रखा सपना 

साकिबुल गनी का बिहार टीम के कप्तान तक पहुंचने का रास्ता बिल्कुल भी आसान नहीं रहा है. 2 सितंबर 1999 को बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के मोतिहारी शहर के अगरवा मोहल्ले में जन्मे साकिबुल ऐसे इलाके से आते हैं. जहां सुविधाओं का घोर अभाव था. उस समय न तो ढंग के क्रिकेट मैदान थे और न ही आधुनिक संसाधन. साकिबुल ने खेतों में, गांधी मैदान में और कई बार बल्ब की रोशनी में क्रिकेट खेलकर अपने हुनर को तराशा.

उनके पिता मोहम्मद मन्नान गनी पेशे से किसान हैं. परिवार की आर्थिक स्थिति शुरू से ही कमजोर रही. क्रिकेट के प्रति साकिबुल के जुनून को जिंदा रखने के लिए परिवार ने कई मुश्किल फैसले लिए. कई बार जमीन गिरवी रखनी पड़ी तो मां को अपने गहने तक बेचने पड़े. पिता चाहते थे कि बेटा पढ़ाई पर ध्यान दे, लेकिन साकिबुल की लगन और मेहनत को देखकर बाद में उन्होंने भी उसका साथ देना शुरू कर दिया. इस संघर्ष भरे सफर में साकिबुल के बड़े भाई फैसल गनी उनकी सबसे बड़ी ताकत बने.

अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए साकिबुल गनी कहते हैं कि उनका पूरा सफर संघर्षों से भरा रहा है. घर की आर्थिक हालत बेहद कमजोर थी. इसके बावजूद पिता ने हमेशा हौसला बढ़ाया. पैसे की तंगी के बीच भी किसी तरह महंगे क्रिकेट किट का इंतजाम किया गया. साकिबुल मानते हैं कि हालात अब पहले से कुछ बेहतर जरूर हुए हैं, लेकिन गरीबी आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. उनका कहना है कि वे लगातार अच्छा प्रदर्शन कर अपने खेल के दम पर परिवार को एक बेहतर जीवन देना चाहते हैं, ताकि उन्हें कभी किसी कमी का एहसास न हो.



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