शादी में पंडित से पहले अब वकील की जरूरत: पत्नी के फ्यूचर केस से बचने दूल्हे ले रहे लीगल सलाह, बदलते ट्रेंड ने चौंकाया – Madhya Pradesh News

शादी में पंडित से पहले अब वकील की जरूरत:  पत्नी के फ्यूचर केस से बचने दूल्हे ले रहे लीगल सलाह, बदलते ट्रेंड ने चौंकाया – Madhya Pradesh News




शादी से पहले पंडित के पास जाकर कुंडली मिलान करवाना, शुभ मुहूर्त निकलवाना और फिर बैठकर गहनों, कपड़ों और दावतों के खर्चों पर चर्चा करना एक आम प्रोसेस है। मगर, इंदौर जैसे आधुनिक शहरों में अब इस परंपरा में एक नया और चौंकाने वाला अध्याय जुड़ गया है। अब पंडित से पहले वकील से सलाह ली जा रही है। इस बदलाव के पीछे एक डर और अविश्वास है जो मॉडर्न रिलेशन में तेजी से बढ़ता जा रहा है। युवाओं, विशेषकर होने वाले दूल्हों और उनके परिवारों में यह आशंका घर कर गई है कि अगर भविष्य में रिश्ता नहीं चला, तो उन पर दहेज प्रताड़ना, घरेलू हिंसा और भरण-पोषण जैसे गंभीर कानूनी मामले दर्ज हो सकते हैं। इसी डर के चलते अब शादी की तैयारियों में ‘लीगल कंसलटेशन’ एक अनिवार्य हिस्सा बनता जा रहा है। पढ़िए रिपोर्ट… क्यों और कैसे बदल रहा है यह ट्रेंड?
इंदौर की जानी-मानी एडवोकेट प्रीति मेहना इस बदलाव की सबसे करीबी गवाहों में से एक हैं। वह बताती हैं कि पिछले कुछ सालों में उनके पास आने वाले क्लाइंट्स का प्रोफाइल और उनकी समस्याएं पूरी तरह से बदल गई हैं। वह कहती हैं कि पहले हमारे पास लोग तब आते थे जब शादी में कोई विवाद हो जाता था, जब रिश्ता टूटने की कगार पर होता था। लेकिन अब तस्वीर बिल्कुल अलग है। एडवोकेट मेहना के मुताबिक आज की युवा पीढ़ी, जो सूचना और प्रौद्योगिकी के युग में पली-बढ़ी है, कानून को लेकर असाधारण रूप से सजग है। वे शादी को सिर्फ एक भावनात्मक रिश्ते के तौर पर नहीं, बल्कि एक कानूनी एग्रीमेंट के रूप में भी देख रहे हैं। वे शादी से पहले ही यह जानना चाहते हैं कि एक पत्नी के कानूनी अधिकार क्या हैं, एक पति के क्या अधिकार हैं? भविष्य में कौन-कौन से केस उन पर और उनके परिवार पर लग सकते हैं, और सबसे महत्वपूर्ण, उनसे बचाव के क्या उपाय हैं। एडवोकेट मेहना के अनुसार, यह एक तरह का ‘लीगल सेफ्टी प्लान’ है, जिसे परिवार शादी से पहले ही तैयार कर लेना चाहता है। 498A और घरेलू हिंसा कानून का सबसे बड़ा डर
इस पूरे ट्रेंड के केंद्र में भारतीय दंड संहिता की धारा 498A (अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 85) का डर है। यह कानून मूल रूप से महिलाओं को दहेज के लिए होने वाली प्रताड़ना से बचाने के लिए बनाया गया था। निस्संदेह, इसने लाखों महिलाओं को सुरक्षा कवच प्रदान किया है, लेकिन इसके दुरुपयोग की कहानियों ने भी समाज में गहरी चिंता पैदा की है। एडवोकेट प्रीति मेहना बताती हैं कि लड़के और उनके माता-पिता का सबसे पहला और सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि हम यह कैसे सुनिश्चित करें कि भविष्य में पत्नी हमारे खिलाफ 498A या घरेलू हिंसा का झूठा केस न लगा दे? वे पूछते हैं कि शादी के दौरान जो उपहारों और नकदी का लेन-देन हो रहा है, क्या उसे बाद में दहेज बताकर हमारे खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है? यह डर सिर्फ दूल्हे तक सीमित नहीं है। परिवार इस बात को लेकर भी चिंतित रहते हैं कि ऐसे मामलों में अक्सर पति के साथ-साथ उसके माता-पिता, भाई-बहन, और यहां तक कि दूर के रिश्तेदारों को भी घसीट लिया जाता है। एक शादीशुदा बहन जो अपने घर में रह रही है, उसका नाम भी ऐसे केस में आ सकता है। जब आपसी सहमति भी बन जाती है विवाद की वजह
आजकल की शादियां ‘बिग फैट इंडियन वेडिंग’ का रूप ले चुकी हैं, जहां खर्च लाखों से शुरू होकर करोड़ों तक पहुंच रहा है। डेस्टिनेशन वेडिंग, थीम-बेस्ड डेकोरेशन, और महंगे कैटरिंग पर दोनों परिवार मिलकर खर्च करते हैं। लेकिन यही संयुक्त खर्च, विवाद की स्थिति में लड़के वालों के लिए एक बड़ी मुसीबत बन सकता है। इसे दो केस से समझिए केस स्टडी 1: नागपुर की शादी, इंदौर में केस
एडवोकेट मेहना एक हालिया मामले का उदाहरण देती हैं। लड़का नागपुर का था और लड़की इंदौर की। दोनों परिवारों ने आपसी सहमति से नागपुर में डेस्टिनेशन वेडिंग करने का फैसला किया। लड़की पक्ष ने यह कहते हुए कि वे नागपुर में व्यवस्थाओं से परिचित नहीं हैं, रहने-खाने और अन्य खर्चों के लिए एकमुश्त रकम लड़के के बैंक खाते में ट्रांसफर कर दी। शादी के कुछ ही महीनों बाद पति-पत्नी में अनबन हुई और मामला पुलिस तक पहुंच गया। लड़की पक्ष ने उसी रकम को आधार बनाकर 498A और घरेलू हिंसा का केस दर्ज करा दिया, यह आरोप लगाते हुए कि यह पैसा दहेज के रूप में मांगा गया था। केस स्टडी 2: होटल की बुकिंग बनी दहेज का सबूत
इंदौर के विजय नगर क्षेत्र के एक मामले में, दोनों परिवार स्थानीय थे। एक बड़े होटल में शादी तय हुई। यह तय हुआ कि होटल और कैटरिंग का भुगतान पहले लड़की पक्ष करेगा और बाद में लड़का पक्ष अपनी हिस्सेदारी चुका देगा। लड़की पक्ष ने लगभग 6 लाख रुपए खर्च किए। शादी के बाद जब विवाद हुआ, तो इसी 6 लाख रुपए के बैंक ट्रांसफर को यह कहकर 498A के मामले में शामिल कर दिया गया कि यह रकम शादी के लिए दबाव बनाकर ली गई थी। हालांकि, बैंक स्टेटमेंट और कुछ वॉट्सएप चैट्स ने लड़के वालों को राहत दिलाई, लेकिन उन्हें महीनों तक मानसिक और कानूनी पीड़ा से गुजरना पड़ा। वकील क्या दे रहे हैं सलाह?
इस तरह के मामलों से बचने के लिए वकील अब बेहद व्यावहारिक और डिजिटल-युग के समाधान सुझा रहे हैं। एडवोकेट मेहना कहती हैं, हम दोनों पक्षों को सलाह देते हैं कि हर लेन-देन का डिजिटल रिकॉर्ड रखें। नकद लेन-देन से बचें। अगर शादी का खर्च संयुक्त रूप से हो रहा है, तो बैंक ट्रांसफर करते समय विवरण में स्पष्ट रूप से ‘शादी का संयुक्त खर्च’ लिखें। वॉट्सएप पर भी अगर खर्चों की बात हो रही है, तो यह स्पष्ट रूप से लिखा होना चाहिए कि यह दोनों परिवारों की आपसी सहमति से हो रहा है। यह डिजिटल सबूत भविष्य में दोनों पक्षों के लिए एक सुरक्षा कवच का काम कर सकता है। लड़कियां क्यों नहीं ले रहीं कानूनी सलाह?
जब यह सवाल पूछा गया कि क्या लड़कियां भी शादी से पहले कानूनी सलाह ले रही हैं, तो जवाब काफी असंतुलित था। एडवोकेट मेहना के अनुसार, उनके पास आने वाले 10 मामलों में से 9 लड़के वालों के होते हैं। लड़कियों का अनुपात न के बराबर है। विशेषज्ञ इसका कारण यह मानते हैं कि समाज में यह धारणा गहरी है कि कानून, विशेषकर वैवाहिक विवादों से जुड़े कानून, महिलाओं के पक्ष में हैं। समाजशास्त्रियों की नजर में यह बदलाव
समाजशास्त्री इस ट्रेंड को बदलते सामाजिक ताने-बाने का एक महत्वपूर्ण संकेतक मानते हैं। संयुक्त परिवारों का टूटना, महिलाओं का आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना, और रिश्तों में सहनशीलता का स्तर कम होना, ये सभी कारक मिलकर इस स्थिति को जन्म दे रहे हैं। समाजशास्त्रियों के मुताबिक पहले परिवार और समाज के दबाव में रिश्ते निभाए जाते थे, लेकिन अब व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अधिकारों को अधिक महत्व दिया जा रहा है। नतीजा यह है कि शादी को लेकर भरोसे की जगह अब कानूनी सुरक्षा ने ले ली है। क्या भारत में प्री-नप्चुअल एग्रीमेंट का दौर आएगा?
पश्चिमी देशों में शादी से पहले ‘प्री-नप्चुअल एग्रीमेंट’ एक आम बात है। यह एक कानूनी एग्रीमेंट होता है जिसमें तलाक की स्थिति में संपत्ति, गुजारा भत्ता और अन्य जिम्मेदारियों का बंटवारा पहले से ही तय कर लिया जाता है। भारत में अभी इसका कोई स्पष्ट कानूनी ढांचा नहीं है और इसे सामाजिक रूप से भी स्वीकार्यता नहीं मिली है। जिस तरह से शादी से पहले कानूनी सलाह का चलन बढ़ रहा है, विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले दशक में भारत में भी प्री-नप्चुअल एग्रीमेंट की मांग जोर पकड़ सकती है। रिश्तों के भविष्य पर सवाल
इस नए ट्रेंड का सबसे बड़ा और संवेदनशील सवाल यह है कि इसका रिश्तों की पवित्रता और विश्वास पर क्या असर पड़ेगा? एक पक्ष का मानना है कि शादी की शुरुआत ही अगर कानूनी दांव-पेंच की आशंका से हो, तो उसमें प्यार और विश्वास कैसे पनपेगा? यह शादी के पवित्र भाव को खत्म कर देगा। वहीं, दूसरा पक्ष इसे एक व्यावहारिक कदम मानता है। उनका तर्क है कि जैसे स्वास्थ्य बीमा किसी बीमारी की आशंका में नहीं, बल्कि सुरक्षा के लिए लिया जाता है, वैसे ही कानूनी सलाह मानसिक सुरक्षा देती है, ताकि दोनों पक्ष बिना किसी डर के अपने रिश्ते को आगे बढ़ा सकें।



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