दक्षिण पन्ना वनमण्डल ने गिद्धों की घटती संख्या रोकने और जैव विविधता बनाए रखने के उद्देश्य से एक विशेष निगरानी अभियान चलाया है। इसी कड़ी में सोमवार को शाहनगर रेंज के अंतर्गत बीट बोरी में वन विभाग और पुलिस बल ने मेडिकल स्टोर्स का औचक निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने पाया कि कुछ पशुपालक अनजाने में डाइक्लोफेनेक, केटोप्रोफेन और ऐसिक्लोफेनाक जैसी दवाओं का उपयोग मवेशियों के इलाज में कर रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इन दवाओं से उपचारित मवेशियों के शवों को खाने से गिद्धों के गुर्दे फेल हो जाते हैं, जिससे उनकी तत्काल मृत्यु हो जाती है। मेडिकल स्टोर संचालकों को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि इन दवाओं का पशु उपचार के लिए बेचना पूरी तरह गैरकानूनी है। उन्हें दवा मांगने वाले व्यक्ति और उसे लिखने वाले पशु चिकित्सक की जानकारी तुरंत वन विभाग को देने को कहा गया। निमेसुलाइड के उपयोग पर भी पूर्णतः रोक लगाने की समझाइश दी गई। इन दवाओं पर दिया जोर वन विभाग ने पशुपालकों और चिकित्सकों से अपील की है कि वे घातक दवाओं के स्थान पर सुरक्षित विकल्पों का चयन करें। मवेशियों के दर्द निवारण के लिए मेलॉक्सिकैम और टॉल्फेनामिक एसिड जैसी दवाएं पूरी तरह सुरक्षित हैं और गिद्धों को कोई नुकसान नहीं पहुंचातीं। दक्षिण पन्ना वनमण्डल केवल कार्रवाई ही नहीं कर रहा, बल्कि जागरूकता पर भी जोर दे रहा है। दूरबीन के माध्यम से गिद्धों के बसेरों की लगातार निगरानी की जा रही है। साथ ही गौशाला प्रबंधकों और मवेशी पालकों के साथ बैठकें कर उन्हें गिद्धों के महत्व के बारे में बताया जा रहा है। सभी गौशालाओं को मृत पशुओं और उनके उपचार का अलग से रिकॉर्ड संधारित करने के निर्देश भी दिए गए हैं। इस कार्रवाई के दौरान पुलिस बल से प्रधान आरक्षक मनीष सिंह, ग्राम वन समिति सदस्य बालकिशन प्रजापति और वनरक्षक प्रेमनारायण वर्मा मुख्य रूप से उपस्थित रहे। वन विभाग का यह समन्वित प्रयास पन्ना की जैव विविधता को सुरक्षित रखने की दिशा में एक बड़ा और प्रभावी कदम माना जा रहा है।
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