उल्टे हाथ का कमाल! 300 लोगों को दे रहे रोजगार, मेरठ, लखनऊ और बाराबंकी में भी नाम

उल्टे हाथ का कमाल! 300 लोगों को दे रहे रोजगार, मेरठ, लखनऊ और बाराबंकी में भी नाम


Struggle Story: जिंदगी की जंग में जीत उसी की होती है, जो हालात से डरकर रुकता नहीं. ऐसी ही एक जीती-जागती मिसाल हैं माधवेंद्र प्रताप सिंह. बचपन में एक सड़क हादसे ने उनसे दाहिना हाथ छीन लिया, लेकिन उनका हौसला नहीं छीन पाया. छोटी सी उम्र में हुआ यह हादसा किसी भी इंसान को तोड़ सकता था, मगर माधवेंद्र ने तय कर लिया था कि हालात चाहे जैसे हों, हार नहीं माननी है.

एक पल में बदल गई पूरी दुनिया
माधवेंद्र का बचपन बिल्कुल आम बच्चों जैसा था हंसमुख, शरारती और सपनों से भरा. एक दिन स्कूल से घर लौटते वक्त अचानक पास से गुजरे एक ट्रक ने उनकी जिंदगी पलट दी. एक सेकेंड में वह जमीन पर गिर पड़े और जब होश आया, तो उनका दाहिना हाथ हमेशा के लिए जा चुका था. डॉक्टरों को भी शुरुआत में यकीन नहीं था कि वह बच पाएंगे. लंबे इलाज के बाद जब घर लौटे, तो शरीर से ज्यादा मन जख्मी था.

दर्द, सवाल और ताने… लेकिन पिता बने ताकत
अगले छह महीने उनके लिए बेहद दर्दनाक रहे. ड्रेसिंग के वक्त इतना दर्द होता कि पूरा मोहल्ला उनकी चीखें सुन लेता. लेकिन असली लड़ाई शरीर से नहीं, समाज और हालात से थी. लोग सवाल करते “अब क्या करोगे? पूरी जिंदगी ऐसे ही रहोगे?” ऐसे वक्त में उनके पिता उनकी सबसे बड़ी ताकत बने. उन्होंने कहा “बायां हाथ है, कलम पकड़ो. पढ़ाई ही अब तुम्हारा हथियार है.”

उल्टे हाथ से लिखना, फिर किस्मत लिखना
माधवेंद्र ने बाएं हाथ से लिखने की प्रैक्टिस शुरू की. शुरुआत में पांच मिनट में हाथ थक जाता था, लेकिन धीरे-धीरे यही हाथ तीन-तीन घंटे तक लिखने लगा. आम लोग जिंदगी में एक बार लिखना सीखते हैं, माधवेंद्र ने दो बार. उन्होंने 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षाएं बिना किसी मदद के अच्छे अंकों से पास कीं यह उनके लिए सबसे बड़ी जीत थी.

पढ़ाई से बिजनेस तक का सफर
माधवेंद्र मूल रूप से नोएडा काउंटी 107 क्षेत्र से जुड़े रहे हैं. शुरुआती पढ़ाई ग्वालियर से पूरी की. बाद में दिल्ली यूनिवर्सिटी से B.Tech (कंप्यूटर साइंस) किया.
सरकारी नौकरी का सपना भी देखा, लेकिन बात नहीं बनी. इसके बाद उन्होंने प्राइवेट सेक्टर में काम किया, फिर आत्मनिर्भर बनने के लिए नौकरी छोड़ दी.

गिरा पैसा, टूटे वादे… फिर भी नहीं रुके
किसी पर निर्भर न रहना पड़े, इसलिए उन्होंने रियल एस्टेट बिजनेस शुरू किया. मेरठ, लखनऊ और बाराबंकी में काम किया. शुरुआत में कई लोगों ने धोखा दिया, पैसा भी डूबा, लेकिन कुछ अच्छे लोग भी मिले. धीरे-धीरे काम संभलता गया.

आज लाखों की कमाई, सैकड़ों को रोजगार
आज माधवेंद्र रीवा में रहते हैं और नए जिले मऊगंज में 400 एकड़ में बन रहे सौर ऊर्जा प्लांट प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं. वे सालाना लाखों की कमाई कर रहे हैं और करीब 300 लोगों को रोजगार दे रहे हैं. प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद रीवा संभाग के युवाओं को ही प्राथमिकता से रोजगार दिया जाएगा.

एक हाथ नहीं, हौसला पूरा
माधवेंद्र की कहानी बताती है कि कमी शरीर में नहीं, सोच में होती है. एक हाथ खोकर भी उन्होंने न सिर्फ अपनी जिंदगी बनाई, बल्कि सैकड़ों परिवारों की रोजी-रोटी का सहारा बने. यही असली जीत है हार न मानने की.



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