सागर. मध्य प्रदेश के सागर जिले के बंडा एसडीपीओ प्रदीप वाल्मीकि जज बनने के लिए पढ़ाई कर रहे थे लेकिन दोस्त के कहने पर उन्होंने पुलिस की तैयारी की और पहले ही अटेम्प्ट में उनका सलेक्शन भी हो गया. इस नौकरी के दौरान उन्होंने समाज के प्रति जो किया, उसके लिए उन्हें अब तक 100 से अधिक अवॉर्ड मिल चुके हैं. इतना ही नहीं, अपने दोस्त के निधन के बाद उसके नाम पर एनजीओ बनाकर सामाजिक गतिविधियां शुरू कीं और इस तरह वह दोस्त को हर समय यादों में संजोकर रखते हैं. उन्होंने अपने इसी दोस्त के नाम पर एक ऐसी प्रतियोगिता कराई, जो वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज हो गई.
प्रदीप वाल्मीकि लोकल 18 को बताते हैं कि उनके पिता स्वर्गीय चंदन लाल महरोलिया वाल्मीकि कोर्ट में रीडर थे. उनकी जिंदगी कोर्ट रूम में ही बीत रही थी, इसलिए वह प्रदीप को जज बनाना चाहते थे. मामूली सी सैलरी में परिवार चलाने के साथ-साथ चंदन लाल बच्चों की पढ़ाई का भी पूरा जिम्मा उठा रहे थे. प्रदीप पिता के सपने को पूरा करने के लिए आगे बढ़ रहे थे और वह एलएलबी की पढ़ाई भी करने लगे थे लेकिन उनके दोस्त नरेंद्र बैस के कहने पर उन्होंने पुलिस सब-इंस्पेक्टर की तैयारी शुरू कर दी. पहले ही अटेम्प्ट में दोनों दोस्तों का सलेक्शन हो गया. उन्होंने जब पिता को पुलिस में नौकरी लगने की सूचना दी, तो वह गुस्सा हुए कि वह तो जज बनाना चाहते हैं लेकिन वह कहां पुलिस में फंस रहे हैं. तब प्रदीप ने पिता को खूब मनाया-समझाया और बताया कि जब अपराधी अपराध करता है, तो पुलिस के पास पहुंचता है. पुलिस समाज के बीच रहती है. अपराधी अपराध करने के बाद सबसे आखिरी में न्यायालय तक पहुंचता है. तब जज उसका फैसला कर पाता है लेकिन पुलिस में रहते हुए वह समाज को अपराध के प्रति जागरूक कर सुधार की दिशा में काम करेंगे.
कम्युनिटी पुलिस का नायाब उदाहरण
वह कम्युनिटी पुलिस का एक नायाब उदाहरण हैं. वह अभी नौकरी के दौरान जहां भी जाते हैं, वहां स्कूल-कॉलेज और समाज जनों के बीच पहुंचकर इस तरह के कार्य करते हैं ताकि लोग अपराध न करने के प्रति जागरूक हो सकें. वह कहते हैं कि अपराध करने से केवल एक व्यक्ति परेशान नहीं होता है, उसके पीछे पूरा परिवार परेशान होता है.
नरेंद्र बैस के नाम पर प्रतियोगिता
प्रदीप मुख्य रूप से युवाओं को फिटनेस की तरफ आकर्षित करते हैं और अधिक से अधिक बच्चों को पढ़ाई के प्रति जोड़ने को लेकर लगे रहते हैं. आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों की वह मदद करते हैं. युवाओं को फिटनेस के प्रति जागरूक करने के लिए उन्होंने अपने स्वर्गीय दोस्त नरेंद्र बैस के नाम पर साल 2017 में बास्केटबॉल प्रतियोगिता भी शुरू की थी, जिसे वह हर रविवार को आयोजित करते हैं. लोग उन्हें ‘सिंघम’ भी कहते हैं, इसलिए उन्होंने ‘संडे सिंघम’ के नाम से लगातार 220 हफ्ते तक यह प्रतियोगिता करवाई थी. वह जहां भी जाते थे, वहां हर रविवार को बास्केटबॉल का मैच होता था. लगातार 100 संडे बास्केटबॉल प्रतियोगिता होने से यह वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज है.
प्रदीप वाल्मीकि ने छिंदवाड़ा से इसकी शुरुआत की थी. वह बैतूल, भोपाल, नागपुर में भी टूर्नामेंट खिलाने ले गए. पुलिस की नौकरी और सामाजिक गतिविधियों को लेकर प्रदीप कहते हैं कि स्कूल के समय में ही वह एनसीसी से जुड़ गए थे, जहां पर बचपन में ही समाज के प्रति जिम्मेदारियां सिखा दी गई थीं और इस प्रेरणा की वजह सेवा है. वह आज तक इस काम को कर पा रहे हैं और इतने सालों की नौकरी के बाद भी अपने आप को वह एनसीसी का छात्र ही मानते हैं.
डीएसपी रैंक के अधिकारी प्रदीप वाल्मीकि वर्तमान में सागर जिले के बंडा में तैनात हैं. वह ‘एक कक्षा साहस की’, ‘निर्भय अवतार’, ‘अभिमन्यु’ जैसे अभियान चला रहे हैं. बालाघाट में पोस्टिंग के दौरान भी उस क्षेत्र में बच्चों को पढ़ाई से जोड़ने के लिए खूब काम किया था. इसपर उन्होंने कुछ रिसर्च पेपर भी लिखे थे, जो पब्लिश हो चुके हैं.