Last Updated:
संजय जैन 37 सालों से फुल्की, भेल, कचौड़ी खिला-खिलाकर ग्राहकों पर एक अलग ही जादू चला रहे हैं. वह सारे सामान का मसाला घर पर ही तैयार करते हैं और 37 साल से उनकी फुल्की का स्वाद बरकरार है.
सागर की गली मोहल्लों में खाने-पीने की एक से एक चीजों की खुशबू महकती है और लोग उनके दीवाने होते हैं. आज हम मनमौजी पानीपुरी वाले की कहानी आपको बताते हैं जो पिछले 37 सालों से फुल्की, भेल, कचौड़ी को परोस कर ग्राहकों पर एक अलग ही जादू चला रहे हैं, उन्होंने एक बच्चे की उम्र से शुरुआत की थी और आज बाल पकने तक की उम्र में फुलकी बेच रहे हैं लेकिन जो स्वाद वह बचपन में देते थे वह आज भी बरकरार है इनकी फुल्की खाने के लिए लोग दूर-दूर से चले आते हैं.
37 साल से संजय जैन राजस्थानी कचौड़ी बेचने का कर रहे काम
विजय टॉकीज निवासी संजय जैन बताते हैं कि वह 37 साल से फुलकी और राजस्थानी कचौड़ी बेचने का काम कर रहे हैं. पहले उन्होंने विजय टॉकीज के पास से इसकी शुरुआत की थी, फिर कटरा परकोटा में दुकान लगाई. लेकिन पिछले 26 साल से सिंधी बाजार में अपना ठेला लगाते हैं. उन्होंने कहा कि शाम को केवल 3 घंटे के लिए मार्केट में आता हूं. हमारे बरसों पुराने ग्राहक हैं, जो कभी बच्चा थे आज भाई खुद बच्चे वाले हो गए, लेकिन हमारी फुलकी का स्वाद नहीं भूले हैं. जो लोग दूसरी जगह शिफ्ट हो गए हैं. वह भी 10-10 किलोमीटर दूर से गोलगप्पे खाने के लिए आता है जो ग्राहक यहां खरीदी करने के लिए आते हैं वह फुल्की खाकर जरूर जाते हैं.
संजय जैन रोजाना शाम 6:30 बजे से 9:30 बजे तक ही अपना सामान बेचते हैं. और उनके गोलगप्पे का दीवाने हर ग्राहक को उनकी टाइमिंग पता है, तो तलाश करते हुए सिंधी मार्केट की गली में पहुंच जाते हैं. जहां पर संजय मजेदार बातचीत के साथ लोगों को गोलगप्पे खिलाते हैं. जैसे ही शाम को यह अपना फुलकी का थैला लेकर मार्केट में पहुंचते हैं तो देखते ही ग्राहकों की भीड़ आने लगती है और जब तक यह खड़े रहते हैं तब तक 1 मिनट के लिए भी इनका हाथ रुकता नहीं है.
रोज बेच देते हैं 1000 फुल्की
संजय बताते हैं कि वह केवल गोलगप्पे खरीदते हैं जहां से आर्डर पर बनवाते वहां पर कह कर रखा है कि सभी फुल्की बड़ी और बराबर मात्रा में होनी चाहिए, वह 10 रुपए में 5 गोलगप्पे खिलाते हैं और सुखी फुल्की किसी को देते नहीं है. संजय कहते हैं कि उन्होंने जब इसकी शुरुआत की थी तब एक रुपया में आठ गोलगप्पे बेचते थे अब महंगाई के साथ इनकी कीमत भी बढ़ानी पड़ी. रोजाना 1000 फुल्की, डेढ़ सौ कचौड़ी और डेढ़ सौ, भेल बेचते हैं. जिस तरह आने का शेड्यूल फिक्स किए हुए हैं कि इस तरह सामान बेचने का भी सब कुछ तय है.
खुद तैयार करते हैं मसाले
जिस ठेला से यह गोलगप्पे बेचते हैं वह हमेशा चमचमाता हुआ रहता है साथ ही खटाई से लेकर मसाले तक सब स्टील के बर्तन में रखते हैं. वह भी नए जैसे चमचमाते है. साफ सफाई और व्यवहार के साथ यह स्वाद को एक नंबर देते ही हैं, लेकिन इनमें जिन मसाले और अन्य चीजों का उपयोग किया जाता है वह अपने हाथों से तैयार करते हैं ताकि किसी भी ग्राहक के स्वास्थ्य से खिलवाड़ ना हो.
संजय कहते हैं कि जिस तरह हमारे दो बेटे हैं ऐसे हर कोई किसी न किसी का बेटा है शुरू से ही हमने कभी ऐसी चीज का उपयोग नहीं किया है कि जो किसी के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो नमक से लेकर अमचूर तक हम घर पर ही बनाते हैं और जो सामान तीन घंटे में बेचकर जाते हैं उसकी तैयारी घर पर दिनभर करते हैं तब जाकर हम इधर आते हैं. वह रोजाना 5000 का सामान बेचते हैं.