Rewa News: समूचे भारत में राजा-महाराजाओं की अनेकों गाथाएं हैं. इन राजाओं ने अपने साम्राज्य में कुछ ऐसे निर्माण कार्य भी करवाए थे, जो किसी अजूबे से कम नहीं. आज हम आपको एक ऐसे ही खूबसूरत और भव्य भवन के निर्माण का किस्सा बताने जा रहे हैं, जो अपने आप में किसी अजूबे से कम नहीं है. आज के आधुनिक दौर से सैकड़ों वर्ष पहले रीवा रियासत के महाराजा वेंकेट रमण सिंह जू देव ने एक ऐसे महल की कल्पना की जो अपने आप में अकल्पनीय है. महल का डिजाइन ऐसा है जो आज के दौर के इंजीनियरों को भी सोच में डाल दे.
इतिहास के जानकार डाॅ. मुकेश एंगल के अनुसार, साल 1895-96 में रीवा राज्य में भयंकर अकाल पड़ा था. यहां के लोगों को भूखे मरने की नौबत आ गई थी. बेबस और बेहाल जनता रोजी-रोटी की तलाश में पलायन करने लगी थी. तत्कालीन रीवा रियासत के महाराजा वेंकेट रमण सिंह जूदेव अपनी प्रजा के इस तरह पलायन को देख व्यथित हो गए. तब उन्होंने प्रजा का पलायन रोकने और उन्हें रोजगार देने के लिए एक महत्वपूर्ण फैसला लिया. वेंकेट रमण सिंह ने राज्य में एक राजमहल निर्माण करने की घोषणा की और उसी में राज्यवासियों को रोजगार देने का ऐलान किया.
वेंकेट रमण सिंह ने ऐसे महल की कल्पना की, जिसको शायद उस समय मूर्त रूप देना आसान नहीं था. उन्होंने एक ऐसा महल बनाने का सोचा जिससे आकाश, पाताल और भूलोक के दर्शन हों. उन्होंने इंग्लैंड से हैरिशन नामक एक इंजीनियर को रीवा बुलाया. तीनों लोकों की परिकल्पना के आधार पर उस विलायती इंजीनियर को नक्शा बनाने का काम सौंप दिया. इंजीनियर ने नक्शा बनाया और 4742 स्क्वायर फीट के भू-भाग में महल के निर्माण का कार्य शुरू हो गया. इसके निर्माण में करीब 1 हजार मजदूर लगे थे. इतिहासकार असद खान के दादा मो. खान को मुख्य शिल्पकार नियुक्त किया गया.
स्नानागार जो बन जाता था सभाकक्ष
तीन लोक वाले भवन को गोल आकार देने के लिए पाताल लोक पर बीचोबीच एक विशाल होज गोलाकार टैंक नुमा स्ट्रक्चर का निर्माण किया गया. होज तक जाने के लिए एक ब्रिज बनाया गया. इसी से जोड़कर सुरक्षा की दृष्टि से दो सुरंग बनाई गई, जिसका इस्तेमाल संकट के समय किया जा सके. इसके साथ ही इसी भाग के मध्य में एक भव्य स्नानागार भी बनाया गया, जिसे आपातकाल की स्थिति में या फिर यूं कहें कि हमले की स्थिति में एक सभाकक्ष के रूप में बदला जा सकता था, जहां बैठकर गुप्त मंत्रणाएं भी की जा सकती थीं.
12 दरवाजे वाले कमरे में आकाश
पाताल लोक के ठीक ऊपरी भाग में भू-लोक का निर्माण हुआ. इसमें दाखिल होने के लिए भवन के बाहरी भाग में सीढ़ियां बनाई गईं. भू-लोक के अंदर दाखिल होते ही आपको अद्भुत कारीगरी देखने को मिलेगी. यहां 12 दरवाजों वाले गोलकार हाल में बैठकर रियासत के काम-काज करने की व्यवस्था बनाई गई थी. इसी हॉल के ऊपरी भाग यानी की छत पर बेहतर कारीगरी करके आकाश मंडल का डिजाइन तैयार किया गया था, जिसकी तरफ निहारते ही आपको टिमटिमाते हजारों तारों के साथ ही आकाश लोक की अनुभूति होगी. इस भवन के बाहरी हिस्सों पर खूबसूरत नक्काशी की गई है, जो यहां आने वाले पर्यटकों को हैरान कर देती है.
ढाका से मंगाया खास कपड़ा
वैसे तो रीवा राज्य में काफी कुशल नक्काश थे, लेकिन भवन की सुंदरता को और निखारने के लिए महाराजा वेंकेट रमण सिंह ने जोधपुर, आगरा और जयपुर के शिल्पकारों को नक्काशी के लिए बुलाया था. इसके बाद दीवारों को शीशे की तरह चमकाने के लिए ढ़ाका (वर्तमान में बांग्लादेश की राजधानी) से मंगवाए गए एक खास किस्म के मखमली कपड़े का इस्तेमाल किया गया. शाही भवन के दूसरी मंजिल पर बाहरी हिस्से के अलावा बालकनी और खिड़कियों पर लगाए गए स्टील फ्रेम वर्क को महाराजा वेंकेट रमण सिंह जू देव ने इंग्लैंड से मंगवाया था.
सीमेंट से नहीं, इस चीज से जुड़ाई
इस महल के निर्माण में गुड़, बेल, कत्था सुर्खी, चूना और उड़द का इस्तेमाल किया गया है. इस मटेरियल को कई दिनों तक मिलाकर सड़ाया जाता था. इसके बाद उस जमाने के कोल्हू मशीन में पेरकर इसका मिश्रण तैयार किया जाता था. फिर इससे जोड़ाई का कार्य किया जाता था. भवन की दीवारों पर सीप और संगमरमर के पेस्ट से छपाई की गई. फिर इन दीवारों को नारियल के जूट से घिसाई की गई.
भवन बनाने में आया इतना खर्च
भवन की कई दीवारों और पिलरों में मीना से जड़कर फूल पत्तियों का बेजोड़ नमूना कारीगरों के द्वारा पेश किया गया. 1907 में यह खूबसूरत भवन पूरी तरह से बनकर तैयार हुआ. इसका नाम महाराजा वेंकेट रमण सिंह जूदेव के नाम पर ही ‘वेंकेट भवन’ रखा गया. 130 साल पहले इस भवन के निर्माण में तकरीबन 12 साल का समय लगा. इसे बनाने में 3 लाख का खर्च आया. कारीगर और मजदूरों की कड़ी मेहनत के साथ एक महान राजा की अपने प्रजा के प्रति सच्ची सोच का प्रतीक वेंकेट भवन आज भी मजबूती के साथ खड़ा हुआ है.
वर्तमान में इसके अंदर संग्रहालय
समूचे भारत में ऐसा कोई भवन नहीं है, जिसका निर्माण तीनों लोकों की परिकल्पना के आधार पर कराया गया हो. यह शाही भवन मध्य भारत के प्रमुख भवनों में से एक है.” डाॅ.मुकेश एंगल का मानना है की ऐसे नायाब धरोहर को संजोने की आवश्यकता है. वर्तमान समय में इस भवन के अंदर जिला संग्रहालय स्थापित है. भवन के प्रवेश द्वार में 10वीं और 11वीं सताब्दी के कर्चुली कालीन की सैकड़ों दुर्लभ प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं. दूर-दराज से आने वाले पर्यटक इस महल के दीदार करने जरूर आते हैं और इस महल का इतिहास जानकर हैरत में पड़ जाते हैं.