Balaghat News: मध्य प्रदेश के बालाघाट में 35 साल के लाल आतंक के कलंक को सुरक्षाबलों ने केंद्र सरकार की तय डेडलाइन के पहले ही खत्म कर दिया. नक्सलवाद को खत्म करने की डेडलाइन करने के बाद सुरक्षाबलों के ऑपरेशन तेज हुए और नक्सली या तो मारे गए या फिर उन्हें सरेंडर होने पर मजबूर होना पड़ा. नतीजतन दिसंबर 2025 में ही करीब चार महीने पहले ही बालाघाट से नक्सलियों का सफाया हुआ. सुरक्षाबलों को इसका इनाम भी मिला. बालाघाट में 9 फरवरी को मुख्यमंत्री मोहन यादव आए और पचामा दादर एनकाउंटर में शामिल रहे हॉक फोर्स के 60 जवानों को आउट ऑफ टर्म प्रमोशन दिया. जानें वो कौन सी घटना थी, जिसके लिए जवानों को सीएम ने सम्मानित किया.
सुरक्षाबलों ने चार नक्सलियों को किया था ढेर
14 जून 2025 को सुरक्षाबलों को पचामा दादर की पहाड़ियों पर नक्सलियों के डेरे की जानकारी मिली थी. ऐसे में हॉक फोर्स, कोबरा और सीआरपीएफ के जवानों ने घेराबंदी की और चार नक्सलियों को मार गिराया. सभी मलाजखंड दलम के नक्सली एरिया कमेटी मेंबर थे. इसमें नक्सली ईमला, रीता उर्फ तुब्बी, तुलसी उर्फ सुमन और रवि शामिल था. इसमें रवि ग्रेनेड लांचर चलाने में एक्सपर्ट था. तब घटना स्थल से रॉकेट लॉन्चर, हैंड ग्रेनेड, राइफल और बड़ी मात्रा कारतूस भी बरामद किए गए.
जानें कैसे तैयार हुई रणनीति
नक्सलवाद को खत्म करने के लिए डेडलाइन तय की गई थी. ऐसे में सुरक्षाबलों के सर्चिंग ऑपरेशन तेज थे. जवानों ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि नक्सलियों के डेरे की जानकारी मिलने पर एसपी आदित्य मिश्रा के नेतृत्व में मेगा कासों ऑपरेशन लॉन्च किया गया था. जानकारी की थी दर्जनभर से ज्यादा में माओवादी पचामा दादर कटेझिरिया के जंगल में मौजूद हैं. तब मेगा कासों ऑपरेशन चलाया गया. इस ऑपरेशन 600 जवान जंगलों में मौजूद थे.
तीन दिन चला ऑपरेशन, 4 नक्सली ढेर
सुरक्षा बलों के मेगा कासों ऑपरेशन में हॉक फोर्स सहित, कोबरा, जिला पुलिस बल और सीआरपीएफ के जवान मौजूद थे. मेगा ऑपरेशन तीन दिन तक चला. इसमें जवानों को 8-10 km तक पैदल चलना पड़ा. कई उतार चढ़ाव पार कर उतरना पड़ा. फिर सुरक्षा बलों ने सही मौका देख फायरिंग की. ऑपरेशन के पहले दिन ही तीन महिला नक्सली और एक पूरुष नक्सली को ढेर करने में सुरक्षा बलों को सफलाती मिली. इसके बाद तीन दिन तक सर्चिंग चलती रही लेकिन नक्सली घने जंगलों फायदा उठाकर भाग निकले. लेकिन ऑपरेशन चलता रहा. इधर सुरक्षा बलों के जवान गोली चलाते तो उधर नक्सली भी. ऐसे में तीन दिन तक ऐसा ही चलता रहा. फिर जब सर्चिंग शुरू हुई तो चार लाशें मिलीं.
कई संघर्ष और फिर मिली सफलता
जवानों ने लोकल 18 को बताया कि जंगल में हर वक्त चौकन्ना रहना पड़ता है. वहीं, कभी बासी रोटी और आचार खान पड़ता है, तो कभी नाले का पानी पीना पड़ता है. गर्मियों के दिन थे ऐसे में नाले भी सुख गए थे. इसके अलावा कई जंगली जानवरों से भी सामना करना पड़ता है. इतने कठिन संघर्ष के बाद सुरक्षाबलों को सफलता मिलती थी. जवानों ने बताया कि पहले जब नक्सलवाद को खत्म करने के डेडलाइन नजदीक आ रही थी. तब 7-7 दिन के सर्चिंग ऑपरेशन चलते थे, लेकिन अब थोड़ी राहत है. ऐसे में अब भी सर्चिंग ऑपरेशन चल रहे हैं, लेकिन पहले जैसी मशक्कत नहीं रही.
अब जवानों को मिला रिवार्ड
अब मेगा कांसों ऑपरेशन में शामिल जवानों को आउट ऑफ टर्न प्रमोशन मिला है. इसमें जो आरक्षक थे, उन्हें प्रधान आरक्षक बनाया गया. वहीं प्रधान आरक्षक एएसआई बने. इसी तरह सभी जवानों का समय से पहले ही प्रमोशन हुआ है.