बेतवा फिर सूखी: कैचमेंट में 1000 एकड़ जंगल काटकर हो रही खेती, गोमुख आने वाला भूजल पंप लगाकर पहले ही निकाल रहे – Bhopal News

बेतवा फिर सूखी:  कैचमेंट में 1000 एकड़ जंगल काटकर हो रही खेती, गोमुख आने वाला भूजल पंप लगाकर पहले ही निकाल रहे – Bhopal News




मप्र की गंगा यानी बेतवा नदी। इसका उल्लेख पुराणों में भी मिलता है। इसका उद्गम गोमुखी दूसरी बार सूख गया है। भोपाल से करीब 25 किमी दूर, कोलार डेम की रोड पर रायसेन जिले के झिरी में स्थित यह उद्गम दो साल पहले तक सालभर बहने वाला प्राकृतिक भूजल स्रोत था। बारिश के बाद कुछ महीनों के लिए लौटी धारा फिर गायब हो गई है। साफ है कि हालात अब चेतावनी के स्तर से आगे निकल चुके हैं।
यहां मौके पर जाकर देखने पर पता लगता है कि झिरी और आसपास का इलाका, जहां कुछ साल पहले तक घना जंगल था, अब बड़े पैमाने पर खेती में बदल चुका है।
पिछले साल बेतवा के सूखने के बाद स्थानीय स्तर पर सबसे पहले पहल रिटायर्ड आयकर अधिकारी और गांधीवादी विचारक आरके पालीवाल के नेतृत्व में हुई। उन्होंने ग्रामीणों और संगठनों के साथ मिलकर ‘ऑपरेशन चेक डैम’ चलाया। पौधरोपण किया था। पालीवाल कहते हैं कि किसी नदी का उद्गम स्थल दूसरी बार सूखना संकेत है कि पूरा कैचमेंट सिस्टम फेल होने की कगार पर है। पुनरुद्धार की कोशिशें सिर्फ कागजों पर… वन विभाग और मनरेगा ने बनाए हैं अलग-अलग प्लान जमीनी हकीकत… ज्यादा पानी मांगने वाली धान की खेती और भूजल दोहन से बिगड़े हाल
झिरी और इससे लगे बेहड़ा गांव सहित आसपास के क्षेत्र में करीब 1000 एकड़ में गेहूं और धान की खेती हो रही है। खेती के लिए भूजल से सिंचाई की जा रही है और पेयजल की जरूरतें भी इसी भूजल पर निर्भर हैं। इस बदलाव ने उस प्राकृतिक जल प्रणाली को सीधे प्रभावित किया है, जिस पर बेतवा का उद्गम निर्भर था।
गोमुखी के आसपास छोटे-छोटे कई प्राकृतिक जलस्रोत मौजूद हैं। यही स्रोत और इस पूरे इलाके का भूजल गोमुखी तक पानी पहुंचाता था। स्थिति यह है कि इन स्रोतों को और गहरा कर उनमें मोटर पंप लगाए गए हैं। इनका उपयोग ट्यूबवेल की तरह हो रहा है। जो भूजल पहले रिसकर उद्गम स्थल तक पहुंचता था, रास्ते में ही निकाल लिया जा रहा है। एक्सपर्ट ने बताए कारण… इसके पीछे प्राकृतिक कारणों से ज्यादा मानवीय हस्तक्षेप जिम्मेदार
केंद्रीय भूजल बोर्ड के पूर्व क्षेत्रीय निदेशक डॉ. सुभाष सिंह का कहना है कि उद्गम के सूखने के पीछे प्राकृतिक कारणों से ज्यादा मानवीय हस्तक्षेप जिम्मेदार है।
{झिरी और आसपास कैचमेंट में जंगलों की जगह खेती होने से जमीन की जलधारण क्षमता कम हुई है।
{धान जैसी अधिक पानी खपत वाली फसलों के कारण भूजल का अत्यधिक दोहन हुआ है।
{प्राकृतिक स्रोतों को गहरा कर उनमें मोटर पंप लगाए जाने से भूजल का प्रवाह बाधित हुआ।
{लगातार दोहन व घटती रिचार्जिंग के चलते उद्गम तक पानी पहुंचाने वाली प्राकृतिक प्रणाली टूट गई है। इस दिशा में ḷसमाधान… वन विभाग की 11.22 करोड़ की योजना बनाई, पर अभी कागजों में
एनजीटी के निर्देशों के बाद वन मंडल औबेदुल्लागंज ने बेतवा के उद्गम स्थल और आसपास के क्षेत्र के लिए 11.22 करोड़ की डीपीआर तैयार की है। इसमें 2 हेक्टेयर में मियावाकी तकनीक से सघन पौधरोपण, 118 परकोलेशन टैंकों का निर्माण, बोल्डर चेक डैम, कंटूर ट्रेंच और कंटीन्यूअस कंटूर ट्रेंच शामिल हैं। ताकि कैचमेंट एरिया में पानी रुके, भूजल स्तर बढ़े और उद्गम स्थल तक प्राकृतिक प्रवाह बहाल हो। वन विभाग ने यह योजना एनजीटी में पेश की है और यह शासन स्तर पर विचाराधीन है। मनरेगा-आर्ट ऑफ लिविंग की बेसिन लेवल योजना… मनरेगा के सीईओ अवि प्रसाद के मुताबिक, आर्ट ऑफ लिविंग के साथ मिलकर पूरी नदी के पुनरुद्धार की योजना बनाई है। डीपीआर तैयार है। इस पर जल्द काम शुरू होगा।



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