हिंदी और मैथिली की विख्यात साहित्यकार पद्मश्री उषाकिरण खान की द्वितीय पुण्यतिथि पर हिंदी भवन में साहित्यिक संस्था आयाम साहित्य का स्त्री स्वर द्वारा कार्यक्रम आयोजित किया गया। “यादों के झरोखों में उषाकिरण खान: एक शाश्वत इंद्रधनुष” शीर्षक से हुए इस आयोजन में साहित्य जगत की कई प्रमुख हस्तियों ने उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को याद किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विख्यात आलोचक डॉ. विजय बहादुर सिंह ने कहा कि बहुत कम रचनाएं मन को छू पाती हैं, लेकिन उषाकिरण खान का साहित्य सीधे हृदय तक पहुंचता है। उन्होंने मिथिला की साहित्यिक परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि यह केवल ब्राह्मणों की नहीं बल्कि विद्वानों की भूमि है। विद्या उनके जीवन का मिशन थी भारत भवन के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी प्रेम शंकर शुक्ल ने कहा कि विद्या उनके जीवन का मिशन थी और महान कवि बाबा नागार्जुन उन्हें बेटी की तरह मानते थे। उन्होंने कहा कि उन पर मां सरस्वती की विशेष कृपा थी। प्रसिद्ध कथाकार डा. उर्मिला शिरीष ने उन्हें विलक्षण लेखिका बताते हुए कहा कि उनके पास ज्ञान का असीम भंडार था और उनका व्यक्तित्व भी उतना ही विराट था। सारस्वत अतिथि के रूप में वरिष्ठ कथाकार डा. संतोष श्रीवास्तव ने कहा कि उषाकिरण खान का साहित्य हिंदी-मैथिली से आगे बढ़कर पूरे देश की भाषाओं में पढ़ा जाता है। मैथिली दर्शन को समझने के लिए उनकी रचनाएं महत्वपूर्ण स्रोत कवि एवं शिक्षाविद् डॉ. अरुणाभ सौरभ ने कहा कि मैथिली दर्शन को समझने के लिए उनकी रचनाएं महत्वपूर्ण स्रोत हैं और उन्होंने आजादी से पहले मिथिला समाज का सजीव चित्रण किया। इस अवसर पर अभिनेत्री कनुप्रिया शंकर पंडित ने उनकी कहानी “एक है जानकी” पर भावपूर्ण नाट्य प्रस्तुति दी, जिसने उपस्थित दर्शकों को भावविभोर कर दिया। कार्यक्रम का संचालन साहित्यकार रानी सुष्मिता ने किया और आभार प्रदर्शन अक्षरा की संपादक जया केलकी ने किया। उल्लेखनीय है कि उषाकिरण खान ने मुख्यतः बिहार के कोसी क्षेत्र के वंचित और संघर्षशील लोगों के जीवन पर लेखन किया। हिंदी और मैथिली में 46 से अधिक पुस्तकों की रचयिता रहीं उषाकिरण खान अपने उत्कृष्ट लेखन के साथ-साथ अपने सरल और प्रेमिल स्वभाव के लिए भी साहित्य जगत में याद की जाती हैं।
Source link