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Sidhi News: भैया लाल बंसल ने लोकल 18 से कहा कि पहले बांस के बर्तन बनाने वाले कारीगर बेहद सुंदर और कलात्मक डिजाइन तैयार करते थे. हालांकि आधुनिकता के चलते इनकी मांग कुछ कम हुई है, फिर भी ग्रामीण इलाकों में आज भी इनका इस्तेमाल खेती-किसानी और व्यापारिक कार्यों में किया जाता है. बांस के मजबूत बर्तन बड़े वजन को ढोने के लिए भी काम आते हैं.
सीधी. मध्य प्रदेश के सीधी जिले के बघवार में स्थित अल्ट्राटेक सीमेंट फैक्ट्री में स्थानीय लोगों को रोजगार नहीं मिलने के कारण ग्रामीण काफी नाराज हैं. इन्हीं में से एक हैं पटना गांव के भैया लाल बंसल. फैक्ट्री पास में होने के बावजूद जब उन्हें स्थानीय स्तर पर नौकरी नहीं मिली, तो उन्होंने निराश होने के बजाय अपने पुश्तैनी व्यवसाय को ही आगे बढ़ाने का फैसला किया. आज वही पारंपरिक हुनर उनके परिवार की पहचान और आय का मुख्य साधन बन चुका है. भैया लाल बंसल बांस के पारंपरिक बर्तन बनाने का काम करते हैं. जिस दौर में प्लास्टिक, स्टील और फाइबर के बर्तनों का चलन बढ़ गया है, उस समय भी उन्होंने बांस की कला को नहीं छोड़ा. लोकल 18 को जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि बांस के बर्तन पूरी तरह प्राकृतिक और शुद्ध माने जाते हैं, इसलिए शादी-विवाह, पूजा-पाठ और मांगलिक कार्यों में इनका विशेष महत्व होता है. छठ पूजा जैसे पर्वों में दौरा, सूपा और डलिया की खूब मांग रहती है.
स्थानीय बघेलखंड क्षेत्र में छिटवा, दऊरी और झांपी जैसे बांस उत्पाद आज भी लोकप्रिय हैं. भैया लाल और उनका परिवार 50 रुपये से लेकर 400 रुपये तक के बर्तन तैयार करते हैं. परिवार का हर सदस्य इस काम में हाथ बंटाता है. कोई डलिया बनाने में माहिर है, तो कोई सूप तैयार करने में. मात्र 8 से 10 घंटे में शादी-विवाह में उपयोग होने वाली झांपी तैयार हो जाती है. एक दिन में परिवार 4-5 दौरा बना लेता है, जिससे रोजाना करीब 400 से 500 रुपये तक की आमदनी हो जाती है.
आधुनिकता दौर में कम हुई मांग
भैया लाल ने बताया कि पहले बांस के बर्तन बनाने वाले कारीगर बेहद सुंदर और कलात्मक डिजाइन तैयार करते थे. हालांकि आधुनिकता के कारण इनकी मांग कुछ कम हुई है, फिर भी ग्रामीण इलाकों में आज भी इनका उपयोग खेती-किसानी और व्यापारिक कार्यों में किया जाता है. बड़े वजन को ढोने के लिए भी बांस के मजबूत बर्तन काम आते हैं.
हर महीने 10 से 15 हजार रुपये की कमाई
आज भैया लाल का परिवार हर महीने 10 से 15 हजार रुपये तक की कमाई कर रहा है. पहले जहां आय के सीमित साधन थे और रोजगार को लेकर असमंजस की स्थिति थी, वहीं अब यह पारंपरिक हुनर उन्हें नियमित आमदनी दे रहा है. मेहनत और लगन के दम पर उनका घर-परिवार अच्छी तरह चल रहा है.
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राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.