चीफ जस्टिस को कहना पड़ा… वकील बन जाओ, 19 साल के लड़के का जवाब- डॉक्टर ही बनूंगा, जानें खुद कैसे जीता केस

चीफ जस्टिस को कहना पड़ा… वकील बन जाओ, 19 साल के लड़के का जवाब- डॉक्टर ही बनूंगा, जानें खुद कैसे जीता केस


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Jabalpur Atharva Chaturvedi News: जबलपुर के मेडिकल स्टूडेंट ने ईडब्यूएस कोटे के तहत MBBS में एडमिशन पाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी. एक साल तक संघर्ष किया और जीत सुप्रीम कोर्ट से जीत हासिल की. उनकी शैली और समझ देखकर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को भी कहना पड़ा था कि वकील क्यों नहीं बन जाते…

Jabalpur News: 19 साल के लड़के ने इतिहास रच दिया. बिना वकालत किए उन्होंने कोर्ट में ऐसी बहस की कि चीफ जस्टिस को बोलना पड़ा, ‘तुम वकील बन जाओ’, तब छात्र ने कहा, ‘नहीं मैं डॉक्टर ही बनूंगा’. ये मामाला जबलपुर के होनहार अथर्व चतुर्वेदी का है. अथर्व इन दिनों खूब चर्चा में हैं. अथर्व ने EWS कोटे के तहत निजी मेडिकल कॉलेज में एडमिशन के लिए अपना केस खुद लड़ा. जबलपुर हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक गए और केस जीतकर एडमिशन लिया. अथर्व की कानून के प्रति समझ और बहस की शैली से प्रभावित होकर सुप्रीम कोर्ट की बेंच को उनका केस सुनना ही पड़ा.

दरअसल, डॉक्टर बनने का सपना लेकर निकले जबलपुर के अथर्व चतुर्वेदी को पहले वकील बनकर अपना केस लड़ना पड़ा. कोर्टरूम में खुद अपनी पैरवी की. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के आर्टिकल 142 की विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए अथर्व को MBBS में एडमिशन देने का आदेश जारी किया. यह मामला EWS कोटे के तहत निजी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश से जुड़ा था. इसके लिए मध्य प्रदेश के जबलपुर में रहने वाले महज 19 साल के अथर्व चतुर्वेदी ने 1 साल तक पिता की मदद से अकेले ही कानूनी लड़ाई लड़ी. लोकल 18 पर अथर्व ने अपनी संघर्ष की कहानी खुद बयां की…

चीफ जस्टिस ने कहां… ‘तुम्हें वकील बनना चाहिए’
दरअसल, अथर्व ने 2024 और 2025 में दो बार NEET परीक्षा क्वालीफाई की. पहली बार उन्हें 530 अंक मिले, लेकिन EWS कोटे के तहत निजी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश नहीं मिला. इसके बाद उन्होंने न्याय की लड़ाई शुरू की. साल 2024 और 10 जुलाई 2025 को स्वयं अपनी बात रखने हाईकोर्ट पहुंचे. अथर्व ने बताया, इसके लिए उन्होंने खुद तैयारी की थी. केस से जुड़े कोर्ट के दूसरे फैसले देखे थे. बताया, जबलपुर हाईकोर्ट में उनकी दलीलें सुनकर तत्कालीन चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत ने मुस्कुराते हुए कहा था “तुम्हें वकील बनना चाहिए”. लेकिन, हाईकोर्ट में बात नहीं बनी, तब अथर्व सुप्रीम कोर्ट पहुंचे. 2024 में जस्टिस गवई की बेंच ने उन्हें हाईकोर्ट में रिव्यू फाइल करने को कहा. लेकिन, 2025 में हाईकोर्ट ने रिव्यू भी खारिज कर दिया

जजों की बेंच ने जाते-जाते सुना दिया फैसला…
इसके बाद अथर्व ने दोबारा SLP दायर की, जिसे भी खारिज कर दिया गया. लेकिन, हिम्मत नहीं हारी. 24 नवंबर 2025 को तीसरी बार सुप्रीम कोर्ट पहुंचे और घर से वीडियो कॉल से जुड़े. इस बार उनकी करीब 4 मिनट की दलील ने कोर्ट को चौंका दिया. बेंच उठने ही वाली थी कि अथर्व ने खुद अपनी बात रखने की गुजारिश की. सुप्रीम कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए MBBS में प्रवेश का आदेश दिया. अथर्व की यह कहानी बताती है कि सपने अगर सच्चे हों तो उम्र मायने नहीं रखती. लिहाजा जजों ने भी उनके तर्कों को सराहा और एक छात्र का डॉक्टर बनने का सपना साकार हो गया.

चेस पसंद पर उससे भी रहे दूर
अथर्व के पिता मनोज चतुर्वेदी हाईकोर्ट में वकील हैं, जबकि मां गृहणी हैं. अथर्व को चेस खेलना काफी पसंद है. लेकिन, एक साल तक चेस से दूरी बनाई रखी. गूगल और पिता से मदद लेकर अपने केस को मजबूत किया और 1 साल की लड़ाई लड़कर जीत हासिल की. हालांकि, इस दौरान उन्होंने लाइब्रेरी जाना नहीं छोड़ा और आगे की पढ़ाई भी करते रहे.

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Rishi mishra

एक दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय. प्रिंट मीडिया से शुरुआत. साल 2023 से न्यूज 18 हिंदी के साथ डिजिटल सफर की शुरुआत. न्यूज 18 के पहले दैनिक जागरण, अमर उजाला में रिपोर्टिंग और डेस्क पर कार्य का अनुभव. म…और पढ़ें



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