फसल अवशेष से खेती में आएगी क्रांति, ऑर्गेनिक मल्चिंग से मिट्टी रहेगी सुरक्षित; कम लागत में होगा ज्यादा उत्पादन

फसल अवशेष से खेती में आएगी क्रांति, ऑर्गेनिक मल्चिंग से मिट्टी रहेगी सुरक्षित; कम लागत में होगा ज्यादा उत्पादन


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फसल अवशेष से खेती में आएगी क्रांति, ऑर्गेनिक मल्चिंग से मिट्टी रहेगी सुरक्षित

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Poly-mulching: सागर कृषि विज्ञान केंद्र में RAWE (Rural Agricultural Work Experience) की छात्राओं को इस तकनीक पर प्रशिक्षण दिया जा रहा है. बीएससी फाइनल ईयर की छात्रा शिवा द्विवेदी ने बताया कि पॉली मल्च की जगह स्ट्रा का उपयोग किया जा सकता है. जैसे गेहूं की फसल की नरवाई को जलाने की बजाय मल्च के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.

सागरः खेती को लाभकारी बनाने के लिए किसान नए-नए नवाचार अपना रहे है. जिनमें पॉली मल्चिंग का उपयोग बढ़ता जा रहा है. हालांकि, यह तकनीक मिट्टी को प्रदूषित कर सकती है और इसके दीर्घकालीन परिणाम बुरे हो सकते है. इस समस्या का समाधान करते हुए वैज्ञानिकों ने ऑर्गेनिक मल्चिंग का तरीका सुझाया है. यह तकनीक पुरानी है. लेकिन अब इसे अपडेटेड वर्जन में फिर से पेश किया जा रहा है और किसानों को इसके लिए प्रेरित किया जा रहा है.

सागर कृषि विज्ञान केंद्र में RAWE (Rural Agricultural Work Experience) की छात्राओं को इस तकनीक पर प्रशिक्षण दिया जा रहा है. बीएससी फाइनल ईयर की छात्रा शिवा द्विवेदी ने बताया कि पॉली मल्च की जगह स्ट्रा का उपयोग किया जा सकता है. जैसे गेहूं की फसल की नरवाई को जलाने की बजाय मल्च के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.

पॉली मल्चिंग का उपयोग मिट्टी और पानी को प्रदूषित करता है, जबकि स्ट्रा के उपयोग से वायु और मिट्टी प्रदूषण कम होता है. फसल की अवशिष्ट का उपयोग करने से पानी की बर्बादी नहीं होती और मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है. जिससे फर्टिलाइजर की जरूरत कम होती है और मिट्टी लंबे समय तक उपजाऊ रहती है.

ऑर्गेनिक मल्चिंग का सबसे बड़ा फायदा यह है कि फसल के वेस्टेज का सदुपयोग किया जा सकता है. इससे मिट्टी की उर्वर शक्ति और न्यूट्रिएंट्स बढ़ते है. जिससे बेहतर उत्पादन मिलता है. पॉली मल्चिंग की तुलना में ऑर्गेनिक मल्चिंग सस्ती होती है. जिससे पैसे की बचत होती है.

ऑर्गेनिक मल्चिंग का उपयोग करने के लिए गेहूं की फसल के सूखे डंठलों का उपयोग किया जा सकता है. इनकी लंबाई 5 से 8 सेंटीमीटर होनी चाहिए और बेड की दूरी कम से कम 5 सेंटीमीटर होनी चाहिए. इससे हर सीजन में कम से कम 15000 रुपये की बचत हो सकती है.



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