इलाज के दौरान ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को सामाजिक पूर्वाग्रह (धारणा), भेदभाव, संवाद की कमी और लिंग-संवेदनशील सेवाओं के अभाव जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। एम्स के हालिया अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है। शोध में स्पष्ट किया है कि केवल दवा और उपचार पर्याप्त नहीं, बल्कि स्वास्थ्यकर्मियों का व्यवहार, सांस्कृतिक समझ और सम्मानजनक दृष्टिकोण मरीज के अनुभव को पूरी तरह बदल सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक नीतिगत सुधार और विशेष प्रशिक्षण नहीं होगा, तब तक समावेशी स्वास्थ्य सेवा की परिकल्पना अधूरी रहेगी। राष्ट्रीय स्तर पर सामने आया अहम शोध यह निष्कर्ष एम्स भोपाल के कॉलेज ऑफ नर्सिंग की एमएससी नर्सिंग छात्रा के शोध में सामने आया। इस शोध को राष्ट्रीय वैज्ञानिक शोध प्रस्तुति 2026 में स्नातकोत्तर वर्ग में पहला स्थान मिला। सम्मेलन का आयोजन Symbiosis College of Nursing ने किया था। यह रिसर्च ट्रांसजेंडर समुदाय के स्वास्थ्य अधिकारों को मुख्यधारा में लाने की दिशा में एक ठोस कदम भी मानी जा रही है। इन चुनौतियों का करना पड़ता है सामना अध्ययन में पाया गया कि अस्पतालों में पंजीयन से लेकर परामर्श और उपचार तक कई स्तरों पर ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को असहज परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है। इन कारणों से कई लोग समय पर इलाज लेने से भी कतराते हैं, जिससे उनकी स्वास्थ्य स्थिति और गंभीर हो सकती है। प्रमुख चुनौतियां व्यवहार बदले तो बदलेगा अनुभव शोध में विशेष रूप से यह रेखांकित किया है कि स्वास्थ्यकर्मियों का संवेदनशील और सम्मानजनक व्यवहार मरीज के अनुभव को पूरी तरह सकारात्मक बना सकता है। यदि डॉक्टर, नर्स और अन्य स्टाफ सांस्कृतिक विविधता को समझें और संवाद में सावधानी बरतें, तो विश्वास का वातावरण बनता है। नीतिगत स्तर पर प्रशिक्षण कार्यक्रम, स्पष्ट दिशा-निर्देश और जवाबदेही की व्यवस्था जरूरी बताई गई है। बिना संरचनात्मक बदलाव के समावेशी स्वास्थ्य सेवा केवल एक विचार बनकर रह जाएगी। समावेशी स्वास्थ्य की ओर बढ़ते कदम एम्स भोपाल लंबे समय से समावेशी और संवेदनशील स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे शोध भविष्य की स्वास्थ्य नीतियों को दिशा देंगे। यह अध्ययन इस बात का संकेत है कि आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में तकनीक के साथ मानवीय संवेदनशीलता भी उतनी ही जरूरी है। यदि नीति, प्रशिक्षण और व्यवहार तीनों स्तर पर बदलाव हो, तभी ट्रांसजेंडर समुदाय को समान और सम्मानजनक स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित की जा सकती हैं। विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में हुआ शोध यह शोध कार्य डॉ. लिली पोद्दार, डॉ. गीता भारद्वाज और डॉ. नीतू मिश्रा के मार्गदर्शन में पूरा हुआ। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के अध्ययन स्वास्थ्य व्यवस्था को अधिक संवेदनशील और जवाबदेह बनाने में मदद करते हैं। एम्स भोपाल में जेंडर-अफर्मेटिव हेल्थकेयर की पहल एम्स भोपाल ने हाल ही में जेंडर-अफर्मेटिव हेल्थकेयर सेवाओं की शुरुआत कर ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए एक सुरक्षित और सम्मानजनक उपचार वातावरण उपलब्ध कराने की दिशा में भी कदम उठाया है। इस पहल के तहत मानसिक स्वास्थ्य मूल्यांकन, हार्मोन थेरेपी पर परामर्श, एंडोक्राइनोलॉजी, सर्जरी और काउंसलिंग जैसी सेवाएं एक समन्वित ढांचे में उपलब्ध कराई जा रही हैं। विशेष रूप से प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की टीम ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को बिना भेदभाव और गोपनीयता के साथ इलाज प्रदान करने पर जोर दे रही है। इससे पहले कई मरीजों को सामान्य ओपीडी में असहज अनुभव का सामना करना पड़ता था। विशेषज्ञों का मानना है कि जेंडर-अफर्मेटिव हेल्थकेयर केवल चिकित्सा प्रक्रिया नहीं, बल्कि गरिमा और अधिकार से जुड़ा विषय है।
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