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Holi Special: खरगोन के चोली गांव में होली का दिन खुशियों से ज्यादा भावनाओं से जुड़ा होता है. यहां बच्चे, युवा, बूढ़े, महिलाएं रंग खेलने के बजाय अनोखी परंपरा निभाते हैं. पर्व पर पूरे गांव में शांति देखने को मिलता है. हालांकि, यहां होली होती है, लेकिन उसका तरीका अलग है. जानें कहानी…
Khargone News: रंगों का त्योहार होली पूरे देश में खुशियों और उत्साह के साथ मनाया जाता है. इस दिन लोग पुराने गिले-शिकवे भूलकर एक-दूसरे को रंग लगाते हैं और रिश्तों में मिठास बढ़ाते हैं. लेकिन, मध्य प्रदेश के खरगोन में एक ऐसा गांव भी है, जहां होली के दिन रंग खेलना पूरी तरह मना है. यहां की परंपरा बाकी जगहों से बिल्कुल अलग है, जो लोगों को हैरान भी करती है. सोचने पर मजबूर करती है.
दरअसल, खरगोन के चोली गांव में होली का दिन खुशियों से ज्यादा भावनाओं से जुड़ा होता है. यहां लोग रंग खेलने के बजाय एक-दूसरे के दुख बांटते हैं. गांव के बच्चे हों या बुजुर्ग, कोई भी इस दिन रंग-गुलाल नहीं लगाता. पूरे गांव में शांति और अपनापन देखने को मिलता है. हालांकि, होली का उत्साह यहां भी होता है, लेकिन उसे मनाने का तरीका अलग है.
धुलंडी के अगले दिन रंग
चोली गांव में होली के दिन रंग नहीं खेला जाता, बल्कि धुलंडी के अगले दिन पूरे गांव में जमकर होली मनाई जाती है. इस दिन माहौल पूरी तरह बदल जाता है. लोग रंगों में सराबोर नजर आते हैं. खास बात ये कि यहां होली की शुरुआत मंदिर से होती है, जहां पहले भगवान के साथ रंग खेला जाता है. गांव के लोगों के मुताबिक, यह परंपरा कई सालों से चली आ रही है. आज भी उसी तरह निभाई जा रही है. 2026 में भी जब पूरे देश में होली खेली जाएगी, तब चोली गांव में लोग अपने इस खास रिवाज को निभाते नजर आएंगे.
700 परिवार निभा रहे परंपरा
ग्रामीण दर्शन सिंह ठाकुर बताते हैं कि चोली में सबसे ज्यादा करीब 700 परिवार यदुवंशी ठाकुर समाज के हैं. यहां की परंपराएं और रीति रिवाज बाकी गांवों से बिलकुल अलग है, जिन्हें पूरे समाज के लोग मिलकर निभाते हैं. होली के दिन कोई भी व्यक्ति रंग नहीं खेलता और सभी एक साथ गांव में घूमकर लोगों से मिलते हैं. हालांकि, यह परंपरा सिर्फ एक गांव तक सीमित नहीं है. आसपास के कई गांवों में भी इसी तरह का रिवाज देखने को मिलता है, जहां होली के दिन रंग खेलने से बचा जाता है.
दुख बांटने की परंपरा बनी पहचान
दर्शन बताते हैं कि चोली गांव में होली को “सुख-दुख की होली” माना जाता है. इस दिन गांव के लोग उन परिवारों के घर जाते हैं, जहां किसी तरह का दुख या गमी हुई होती है. गांव के पटेल के साथ पूरा समाज ऐसे परिवारों से मिलता है, उन्हें गुलाल लगाता है और सांत्वना देता है. इसका मकसद यह होता है कि जिन परिवारों में दुख है, वे अकेला महसूस न करें और समाज उनके साथ खड़ा रहे. इसके बाद ही उन परिवारों में धीरे-धीरे खुशियों की शुरुआत होती है और वे सामान्य जीवन में लौट पाते हैं.
मंदिर से शुरू होती है असली होली
लेकिन, ऐसा नहीं है कि इस गांव में होली नहीं खेलते है. होली के अगले दिन गांव का माहौल पूरी तरह बदल जाता है. चोली में मौजूद करीब साढ़े चार सौ साल पुराने ठाकुर श्री राधा विनोद बिहारी मंदिर में पूरा गांव एकत्र होता है. यहां सबसे पहले ठाकुरजी के साथ होली खेली जाती है. इसके बाद पूरे गांव में रंग-गुलाल उड़ता है और लोग एक-दूसरे को रंग लगाकर खुशियां मनाते हैं. यह नजारा मथुरा-वृंदावन जैसा होता.
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एक दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय. प्रिंट मीडिया से शुरुआत. साल 2023 से न्यूज 18 हिंदी के साथ डिजिटल सफर की शुरुआत. न्यूज 18 के पहले दैनिक जागरण, अमर उजाला में रिपोर्टिंग और डेस्क पर कार्य का अनुभव. म…और पढ़ें