आम आदमी जमीन का नामांतरण, रजिस्ट्री कराए बिना शहर में एक इंच जमीन का भी सौदा कर दे तो प्रशासन उस पर एफआईआर तक करा देता है। दूसरी ओर उद्योग विभाग ने दो कंपनियों को एक साल पहले जमीन अलॉट कर दी, लेकिन नामांतरण नहीं करवाया, जबकि एक कंपनी ने मौके पर काम भी शुरू कर दिया है। हाल ही में नामांतरण की प्रक्रिया कलेक्टोरेट से शुरू हुई तो सांवेर एसडीएम ने दावे-आपत्तियां बुलाईं। इस पर 708 आपत्तियां आई हैं। इस वजह से नामांतरण उलझ सकता है। सांवेर के ग्राम बरलई में मालवा सहकारी शकर कारखाना था। इसी की जमीन पर अब मप्र औद्योगिक विकास निगम (एमपीआईडीसी) ने नाइज जिंस और गुजरात की अरविंद मिल्स को 30 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन दी है। मिल के अंशधारक मोती सिंह पटेल के मुताबिक, हमने आपत्तियां लगाई हैं। यदि उनका उचित समाधान नहीं हुआ तो हम कोर्ट जाएंगे। उद्योग विभाग का दावा है कि जमीन हमें सहकारिता विभाग से अलॉट हो चुकी है। रजिस्ट्री भी हो चुकी है, बाधा नहीं आएगी। 99 एकड़ जमीन: शुगर मिल का पंजीयन 7 सितंबर 1974 को हुआ था। 1982 में 6436 सदस्य व उनकी अंशपूंजी 46 लाख 39 हजार थी। मिल के पास 99 एकड़ जमीन थी। जब कारखाना बंद हुआ तब 9 हजार अंशधारक सदस्य थे। मिल मजदूरों को पैसा मिला तो यहां क्यों नहीं?
अंशधारक जय हार्डिया के मुताबिक, मिल की जमीन संस्था की थी। मेरे परिवार के चार सदस्य उसमें शेयरहोल्डर थे। यह निजी जमीन नहीं है कि आपने रजिस्ट्री कर दी और डायवर्शन नहीं करवाया तो प्लॉट बेच दो। मिल बंद हुई और कंपनी-फर्म को घाटा हुआ तो जमीन बेचकर अंशधारकों को पैसा दिया जाना चाहिए। इंदौर की मिलों के मामले में भी मिल मजदूरों को पैसा सरकार ने दिया ही है। यदि आपत्तियों के निराकरण में अंशधारकों के पक्ष में फैसला नहीं होता तो हम कोर्ट जाएंगे। जमीन आपकी नहीं, तो आवंटन कैसे किया? एमपीआईडीसी में जमीन अधिग्रहण का काम देख चुके एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि मिल बंद होने के बाद यह जमीन जिला उद्योग केंद्र (डीआईसी) की थी। एमपीआईडीसी ने इसे अपना मानकर निवेशक कंपनियों को दे दी। पहले जमीन अपने नाम करवाना था, जो नहीं किया गया। जिन कंपनियों को जमीन का आवंटन किया गया है, वे करोड़ों का निवेश कर रही हैं। अब यदि मामला उलझा तो अधिकारी जवाब भी नहीं दे पाएंगे। जमीन हमारी थी, इसलिए दे दी
उद्योग विभाग को यह जमीन पहले ही मिल चुकी है। इसलिए हमने इसका आवंटन किया। काम भी शुरू कर दिया। नामांतरण की जरूरत अब नजर आई है, इसलिए जिला प्रशासन को प्रस्ताव भेज दिया है। अब निर्णय कलेक्टर करेंगे। यह हमारा मामला नहीं, राजस्व का है।
– हिमांशु प्रजापति, कार्यकारी संचालक,एमपीआईडीसी
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