ाभोपाल से एक ऐसी खबर आई है जिसने मेडिकल दुनिया को चौंका दिया है। एम्स भोपाल के डॉक्टरों ने दावा किया है कि उन्होंने मानव शरीर में एक नई लार ग्रंथि की पुष्टि की है। यह ग्रंथि नाक के पीछे, गले के ऊपरी हिस्से यानी नैसोफैरिंक्स में पाई गई है। करीब तीन साल तक चले अध्ययन और 150 संरक्षित शवों की जांच के बाद एम्स ने इसे स्पष्ट रूप से पहचाना है। इस ग्रंथि को “ट्यूबारियल ग्लैंड” नाम दिया है। अगर यह खोज पूरी तरह स्वीकार होती है, तो शरीर रचना की किताबों में बड़ा बदलाव तय है। इसलिए खास है ट्यूबारियल ग्लैंड एम्स भोपाल के मैक्सिलोफेशियल सर्जन डॉ. अंशुल राय और उनकी टीम ने बताया कि यह ग्रंथि नाक और गले के जोड़ के पास एक तय जगह पर मौजूद रहती है। इसका आकार लंबा और हल्का त्रिकोण जैसा है। सबसे अहम बात यह है कि इसमें एक साफ नलिका (डक्ट) पाई गई, जिससे यह अपना स्राव बाहर निकालती है। माइक्रोस्कोप से जांच करने पर इसकी बनावट सामान्य लार ग्रंथियों जैसी ही मिली। यानी यह सिर्फ ऊतक (टिश्यू) का गुच्छा नहीं, बल्कि एक स्पष्ट और सक्रिय संरचना है। नीदरलैंड के वैज्ञानिकों ने जताई की ग्रंथि की आशंका कुछ साल पहले नीदरलैंड के वैज्ञानिकों ने इस तरह की ग्रंथि होने की आशंका जताई थी। इसके बाद दुनिया भर में शोध शुरू हुए, लेकिन ठोस प्रमाण नहीं मिल पाए थे। एम्स भोपाल ने इस दिशा में व्यवस्थित और लंबा अध्ययन किया। 150 संरक्षित शवों का सीधे डिसेक्शन किया गया। 10 नमूनों की माइक्रोस्कोप से पुष्टि की गई। जांचों में पाया कि यह ग्रंथि हर नमूने में एक निश्चित स्थान पर मौजूद थी। यही बात इसके अस्तित्व की सबसे बड़ी पुष्टि मानी जा रही है। रिसर्च कर खोजी नई ग्रंथी इस महत्वपूर्ण शोध में प्रो. सुनीता अरविंद अठावले, प्रो. शीतल कोटगिरवार, प्रो. मनाल एम. खान, प्रो. अंशुल राय, प्रो. दीप्ति जोशी और प्रो. डॉ. रेखा लालवानी शामिल रहीं। टीम का कहना है कि यह खोज आने वाले समय में शरीर रचना विज्ञान (एनाटॉमी) की पढ़ाई में बदलाव ला सकती है। दुनिया की किताबों में होगा बदलाव डॉ. राय के अनुसार, अब तक इस ग्रंथि का उल्लेख किसी प्रमुख मेडिकल किताब या जर्नल में नहीं मिलता था। एम्स का यह शोध दुनिया के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित एनाटॉमी जर्नल Gray’s Anatomy में शामिल किया जाएगा। एमबीबीएस और पीजी स्तर पर शरीर रचना पढ़ाने के लिए दुनियाभर में ग्रेज़ एनॉटमी को मानक किताब माना जाता है। अगर यह शोध वहां दर्ज होता है, तो मेडिकल शिक्षा में बड़ा अपडेट माना जाएगा। लोगों के लिए लाभकारी होगी यह खोज विशेषज्ञों का कहना है कि इस खोज का सबसे बड़ा फायदा कैंसर के इलाज में हो सकता है। सिर और गर्दन के कैंसर में रेडियोथेरेपी के दौरान कई बार आसपास की लार ग्रंथियां प्रभावित हो जाती हैं। इससे मरीज को मुंह और गले में अत्यधिक सूखापन हो जाता है, जिससे निगलने और बोलने में दिक्कत होती है। अगर डॉक्टरों को इस नई ग्रंथि की सही जानकारी होगी, तो वे रेडियोथेरेपी के दौरान इसे बचाने की कोशिश कर सकेंगे। इससे साइड इफेक्ट कम हो सकते हैं। सर्जरी और भविष्य के इलाज में भी मिलेगी मदद नाक और गले की सर्जरी करते समय यदि सर्जन को इस ग्रंथि की सटीक स्थिति पता होगी, तो ऑपरेशन ज्यादा सुरक्षित हो सकता है। इसके अलावा भविष्य में यदि इस ग्रंथि के काम को पूरी तरह समझ लिया गया, तो गले की सूखापन, निगलने में दिक्कत और ऊपरी श्वसन मार्ग की कुछ बीमारियों के इलाज में भी नई दिशा मिल सकती है।
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