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Sagar Abhishek Rajak Struggle Story: सागर के 30 वर्षीय अभिषेक रजक ने बड़ा अफसर बनने का सपना देखा और 7 साल तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की, लेकिन सफलता नहीं मिली. बीए, आईटीआई, पीजीडीसीए और एमएसडब्ल्यू जैसी डिग्रियां होने के बावजूद उन्हें नौकरी नहीं मिली. आर्थिक हालात बिगड़ने पर उन्होंने पिता की मदद से इलेक्ट्रिक ऑटो खरीदा और अब परिवार की जिम्मेदारी उठा रहे हैं. दिनभर की कमाई में ट्रैफिक, चालान और गाड़ी की दिक्कतें भी शामिल हैं. यह सिर्फ एक युवक की कहानी नहीं, बल्कि उन सैकड़ों युवाओं की हकीकत है जो मेहनत के बाद भी सिस्टम में जगह नहीं बना पाए.
Sagar News: मध्यप्रदेश के सागर का 30 वर्षीय अभिषेक रजक बचपन से ही बड़ा सरकारी अफसर बनना चाहता था. 12वीं के बाद ही उसने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू कर दी थी. पूरे 6-7 साल तक लगातार पढ़ाई की, 8 से ज्यादा परीक्षाएं दीं. कभी डेढ़ नंबर से पीछे रह गए, कभी पांच नंबर कम पड़ गए. हर बार बस थोड़ा सा फासला उन्हें मंजिल से दूर कर देता.
चार डिग्री, फिर भी खाली हाथ
अभिषेक ने बीए किया, आईटीआई की, साथ ही पीजीडीसीए, एमएसडब्ल्यू और टाइपिंग का कोर्स भी किया. पढ़ाई में कोई कमी नहीं छोड़ी. लेकिन जब नौकरी हाथ नहीं लगी और उम्र बढ़ती गई तो घर की जिम्मेदारियां भी बढ़ गईं. पिता ने शादी कर दी, फिर एक नन्ही बेटी भी हो गई. जब परिवार तीन लोगों का हुआ तो अभिषेक को एहसास हुआ कि अब सिर्फ सपना नहीं, जिम्मेदारी भी निभानी है.
अब ई-ऑटो ही सहारा
आर्थिक हालात बिगड़ने लगे तो पिता की मदद से इलेक्ट्रिक ऑटो खरीदा. दिलचस्प बात ये है कि जब ऑटो खरीदा तब उन्हें चलाना भी नहीं आता था. लेकिन वक्त ने सब सिखा दिया. पिछले करीब 5-6 महीनों से वे शहर में ऑटो चला रहे हैं. दिनभर में 10-20 चक्कर लगाते हैं. हर सवारी से 5-10 रुपये बचते हैं, उसी से घर का खर्च चलता है.
सड़क की भी अपनी परीक्षा
अभिषेक कहते हैं कि सिर्फ ऑटो लेकर निकल जाने से काम नहीं चलता. ट्रैफिक का दबाव, अलग-अलग तरह की सवारियां, ज्यादा सवारी बैठाने पर चालान, और कभी गाड़ी खराब हो जाए तो दिनभर की कमाई उसी में चली जाती है. ऑटो चलाना भी किसी परीक्षा से कम नहीं है बस यहां सवाल कागज पर नहीं, सड़क पर मिलते हैं.
जिम्मेदारियों के बीच जिद जिंदा है
अभिषेक चंद्रशेखर वार्ड के इतवारी टोरी इलाके में अपने माता-पिता, पत्नी और दो साल की बेटी के साथ रहते हैं. पूरे परिवार की जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर है. वे कहते हैं कि जब हालात अपने हिसाब से नहीं चलते, तो जिंदगी वही करवाती है जो हम करना नहीं चाहते. लेकिन मेहनत छोड़नी नहीं चाहिए. अभिषेक की कहानी अकेली नहीं है. ऐसे सैकड़ों युवा हैं जिन्होंने सालों तक तैयारी की, लेकिन सिस्टम की दौड़ में पीछे रह गए. फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी बस रास्ता बदल लिया.
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Shweta Singh, currently working with News18MPCG (Digital), has been crafting impactful stories in digital journalism for more than two years. From hyperlocal issues to politics, crime, astrology, and lifestyle,…और पढ़ें