कूनो नेशनल पार्क: चीते ही नहीं घड़ियाल और कछुओं का घर भी, देखें फोटोज

कूनो नेशनल पार्क: चीते ही नहीं घड़ियाल और कछुओं का घर भी, देखें फोटोज


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वन विभाग ने यह स्पष्ट किया है कि कूनो नेशनल पार्क को चीतों के लिए पहचाना ज रहा है, लेकिन यहां अन्‍य वन्‍य जीवों को संरक्षित किया जा रहा है. यह सिर्फ किसी एक प्रजाति विशेष का निवास स्थान नहीं बल्कि एक जीवंत पारिस्थितिक अवास बनाना है. इसके लिए योजना बनाई जा रही है कि नदी और जंगल दोनों के बीच तालमेल स्थापित किया जाएगा. ताकि जीवों को अपने प्राकृतिक आवास में सुरक्षित जीवन सुनिश्चित हो सके. विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के कार्यक्रम से न केवल जीवों को संरक्षण मिलेगा, बल्कि स्थानीय लोगों में भी इससे जुड़ाव और जागरूकता बढ़ेगी. कूनो में आज घड़ियाल और कछुओं का घर भी है, यहां अन्‍य कई प्रकार के जीव जंतु रह रहे हैं. हालांकि शनिवार को केंद्रीय वन मंत्री ने चीतों को बाड़ों में रिलीज किया था.

कूनो नेशनल पार्क अब चीतों के पुनर्वास के लिए प्रमुख रूप से प्रसिद्ध है. 28 फरवरी को पार्क में बोत्सवाना से 9 नए चीते और पहुंच गए हैं. विशेष विमान से ग्वालियर लाकर हेलीकॉप्टर से कूनो भेजा गया. इन्‍हें केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने बाड़ों में रिलीज किया. इससे अब मध्‍य प्रदेश में चीतों की संख्‍या बढ़कर 47 हो गई. कूनो में पहले से मौजूद चीतों की सफल प्रजनन दर और शावकों का जन्म इस प्रोजेक्ट की मजबूती दिखाता है.

कूनो नेशनल पार्क में विशेष तैयारियां की गई हैं जहां चीतों को एक महीने तक क्वारंटाइन में रखकर स्वास्थ्य जांच और अनुकूलन प्रक्रिया पूरी की जाएगी. प्रोजेक्ट चीता 2022 में नामीबिया से शुरू हुआ था जब 8 चीते लाए गए. 2023 में दक्षिण अफ्रीका से 12 चीते आए. अब बोत्सवाना से तीसरी खेप के साथ आबादी तेजी से बढ़ रही है. कूनो नेशनल पार्क की उपयुक्त पारिस्थितिकी, शिकार की उपलब्धता और सुरक्षित क्षेत्र ने चीतों के प्रजनन को संभव बनाया है.

प्रोजेक्ट चीता के तहत 2022 में नामीबिया से 8 और 2023 में दक्षिण अफ्रीका से 12 चीते लाए गए. कूनो में अब 35 चीते हैं जबकि 3 गांधी सागर अभयारण्य में. कई मादाओं ने शावक दिए हैं जिससे भारतीय जन्मे शावकों की संख्या 27 तक पहुंची है. गामिनी ने हाल ही में तीन शावक दिए. बोत्सवाना के 9 चीतों के साथ कुल 47 हो जाएंगे. लक्ष्य 50 से अधिक चीतों की आबादी है.

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श्योपुर जिले में स्थित कूनो 748 वर्ग किमी क्षेत्र में फैला है. यहां पर्याप्त शिकार जैसे ब्लैकबक, चिंकारा उपलब्ध हैं. प्रोजेक्ट डायरेक्टर उत्तम शर्मा के अनुसार पार्क में कई क्वारंटाइन बाड़े तैयार हैं. भविष्य में चीतों को गांधी सागर और नौरादेही जैसे अन्य अभयारण्यों में शिफ्ट करने की योजना है ताकि आबादी फैले और जोखिम कम हो.

नए चीतों को कम से कम एक महीने तक विशेष क्वारंटाइन एनक्लोजर में रखा जाएगा. यहां उनके स्वास्थ्य, व्यवहार और पर्यावरण अनुकूलन की लगातार मॉनिटरिंग होगी. पशु चिकित्सक और वन अधिकारी 24×7 निगरानी करेंगे. यह प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि चीते जंगली जीवन के लिए पूरी तरह तैयार हों. क्वारंटाइन के बाद इन्हें बड़े क्षेत्रों में रिलीज किया जाएगा.

कूनो नेशनल पार्क से अब चीतों को लेकर खुशखबरी भी मिलती रही है. यहां मुखी नामक मादा चीता ने 5 शावकों को जन्‍म दिया. इसी तरह गामिनी ने 3 शावकों को जन्‍म दिया था. पार्क चीता को भारत में वापस लाने का सपना पूरा कर रहा है जो 1952 में विलुप्त हो गया था. बोत्सवाना, नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका के सहयोग से यह संभव हुआ. मध्य प्रदेश सरकार और केंद्र की टीम दिन-रात मेहनत कर रही है. यहां विदेशी विशेषज्ञों की टीम भी सलाह और मार्गदर्शन करती है. चीतों को लेकर खुशखबरी भी मिलती रही है.

कूनो में घड़ियाल भी पाले जा रहे हैं. दरअसल, राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल सेंचुली 1980 में शुरू हुई थी और ये 3350 वर्ग किमी क्षेत्र में फैली हुई है. चंबल नदी में बड़ी संख्या में घड़ियाल पाये जाने के कारण यहां सैंक्‍चुअरी शुरू की गयी थी. चंबल और यहां की आबोहवा इनके लिए अनुकूल है. लेकिन अब चंबल में चल रहा अवैध रेत खनन इन जलीय जंतुओं और इको सिस्टम के लिए बड़ा खतरा बना हुआ है. घड़ियाल विलुप्तप्राय है. इस समय सबसे ज्यादा पूरी दुनिया के 80 फीसदी घड़ियाल चंबल नदी में हैं. यहां करीब 2100 से ज्यादा घड़ियाल हैं. ये संख्या पूरी दुनिया में सबसे अधिक है. चंबल की सैंक्‍चुअरी से अब तक प्रदेश और प्रदेश के बाहर भी जगह जगह घड़ियाल भेजे जा चुके हैं. कूनो, सीधी और पंजाब यहां से घड़ियाल भेजे गए थे.

सीएम मोहन यादव कूनो नदी में कुल 10 घड़ियाल के साथ कछुओं को भी नदी में छोड़ेंगे. कूनो राष्ट्रीय उद्यान से होकर कूनो नदी गुजरती है. यह नदी दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है और पार्क को दो भागों में विभाजित करती है. यह चंबल नदी की एक प्रमुख सहायक नदी है.



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