इंदौर के युगपुरुष आश्रम को बंद कर उज्जैन के सेवाधाम आश्रम पहुंचाए गए 86 बच्चों में से 17 की मौत एक साल में होने से कई सवाल खड़े हो रहे हैं। आखिर इन बच्चों की मौत का राज क्या है? मामले में उज्जैन के आश्रम और इंदौर की बाल कल्याण समित पर सवाल उठ रहे हैं। दूसरी ओर, अब भी 25 बच्चों की हालत नाजुक बनी हुई है। हाईकोर्ट ने मामले में संज्ञान लेते हुए इससे जुड़े सभी पक्षों से जवाब मांगा है। दो हफ्ते की मोहलत दी गई है। निरीक्षण की रिपोर्ट भी मांगी गई है। यानी लापरवाह अफसरों पर भी कार्रवाई हो सकती है।
17 बच्चों की अचानक मौत कैसे हो गई, 25 बच्चों की हालत अब भी नाजुक क्यों है? और सबसे बड़ा सवाल-इस पूरे मामले के लिए जिम्मेदार कौन है? इन सवालों के जवाब तलाशने भास्कर की टीम उज्जैन सेवाधाम आश्रम पहुंची। पढ़िए रिपोर्ट… 5 ब्लॉकों में 1200 से अधिक लोग रहते हैं जिला मुख्यालय से 15 किमी दूर अंबोदिया गांव में स्थित है सेवाधाम आश्रम। यहां 5 ब्लॉकों में 1200 से अधिक लोग रहते हैं। नवंबर 2024 में इंदौर के युगपुरुष आश्रम के बंद होने पर 86 बच्चों को उज्जैन के इसी आश्रम में रातोंरात शिफ्ट किया गया, जहां 14 माह में 17 बच्चों की मौत हो चुकी है। बाकी बच्चों को मल्टी-ऑर्गन फेलियर, टीबी, लिवर डैमेज, पूर्ण विकलांगता, मिर्गी जैसे रोग हैं।
यूं तो आश्रम में बाहरी व्यक्तियों का प्रवेश वर्जित है, लेकिन संचालक सुधीर भाई गोयल ने हमें अनुमति दी कि हम रिपोर्ट कर सकें। उन्होंने सबसे पहले इनडोर गेम्स वाले ब्लॉक में ले जाकर योगा रूम, कैरम रूम, म्यूजिक रूम दिखाया। फिर क्लासरूम दिखाया, जहां 15-20 बच्चे पढ़ रहे थे।
बच्चों से पूछा- आज क्या खाया? जवाब मिला-नाश्ते में दलिया और केला। क्या पढ़ाया जाता है? प्रार्थना गाकर सुनाई। सुधीर भाई ने बताया, इनमें इंदौर से आए कुछ बच्चे भी हैं। कुछ ठीक हैं, लेकिन ज्यादातर बेड से उठ नहीं पाते। 14 माह से बच्ची बेड पर, लास्ट स्टेज टीबी से पीड़ित बच्चे जहां आराम करते हैं, वहां गए तो देखा, 14 माह से बच्ची बेड पर है। उसके दोनों पैर टेढ़े हो चुके हैं, चलने की हालत में नहीं हैं। हाथों की भी यही हालत है, जो किसी चीज को पकड़ भी नहीं सकते। हाथों पर फफोले के निशान हो रहे हैं, जो ठीक नहीं हो रहे। वार्ड के कोने में पलंग लगाकर उसे लिटाया गया है, ताकि खिड़कियों से आने वाली हवा से उसके मन को थोड़ी शांति मिले। बच्ची एकटक देखती रहती है। कुछ बोलें तो हां-ना में जवाब दे मुस्करा देती है, मानो दर्द का इलाज मिल गया हो। हकीकत यह है कि लास्ट स्टेज टीबी से सही होना लगभग असंभव सा है। फिर भी सुधीर भाई गोयल चेहरे पर हाथ फेरते आगे बढ़ जाते हैं। उनकी आंखों में नमी भी दिखती है। हेल्थ चेक अप के लिए टीम पहुंची हमारे पहुंचते ही स्वास्थ्य विभाग की टीम भी मौके पर पहुंच गई और एक-एक बच्चे की स्क्रीनिंग शुरू कर दी। डॉक्टरों की टीम ने बच्चों की मेडिकल कंडीशन के बारे में बताया कि वे हर शनिवार को यहां आते हैं। अधिकांश बच्चे मानसिक और शारीरिक रूप से दिव्यांग हैं। ऐसे बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) सामान्य से कम होती है। यदि कोई बच्चा गंभीर हालत में होता है, तो उसे तुरंत जिला अस्पताल रेफर करते हैं। फिलहाल एक बच्चा जिला अस्पताल में ही भर्ती है। ज्यादातर बच्चे बेड पर, उठने की हालत में नहीं हमने बच्चों से बात करने की कोशिश की, लेकिन वे हमारी बात समझ ही नहीं पा रहे थे। इनमें कमर से नीचे का हिस्सा पूरी तरह दिव्यांग है और मस्तिष्क का शरीर पर नियंत्रण भी बहुत कम। स्टाफ बताता है कि इनकी देखभाल बेड पर ही करनी पड़ती है।
अचानक मिर्गी का दौरा पड़ जाए तो नियंत्रण करना मुश्किल हो जाता है। इसलिए डॉक्टर हमेशा संपर्क में रहते हैं। जरूरत पड़ने पर तुरंत बुला लेते हैं। आश्रम के पास दो एंबुलेंस भी हैं, जिनसे जिला अस्पताल में शिफ्ट कर देते हैं। 86 में से दो मिसिंग, एक को परिजन ले गए विधिक सेवा इंदौर से आए अफसरों ने सेवाश्रम को पत्र दिया कि दो बच्चे मिसिंग हैं। सेवाश्रम के लोगों ने बताया कि एक को परिजन ले गए हैं, जबकि रोशन नाम का बच्चा वाकई गुम है-उसकी गुमशुदगी थाने में दर्ज है। सुधीरभाई के अनुसार, एक साल में 86 बच्चों में से 17 की मौत हुई, जिनमें 11 बच्चे और 6 वयस्क थे। फिलहाल 41 बालिकाएं और 26 बालक हैं। ज्यादातर बालिकाएं हैं, जिनकी हालत गंभीर है। हाथ-पैर मुड़े हुए हैं, गंभीर बीमारियाें ने घेर रखा है और रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कम है। बड़ी चूक: बिना मेडिकल जांच के इंदौर से बच्चों को भेजा इंदौर से इन 86 बच्चों को भेजते समय बाल कल्याण समिति की गंभीर लापरवाही सामने आई है। युगपुरुष आश्रम बंद कर रातोंरात बच्चों को यहां शिफ्ट किया गया, लेकिन मेडिकल जांच नहीं कराई गई। आश्रम में प्रवेश के समय भी जांच न होने से बच्चों की परेशानियां पता नहीं चलीं। नियमित चेकअप होते रहे, फिर भी टीबी और अन्य विकृतियों का पता नहीं चला, जिससे हालत बिगड़ती गई। बाद में आश्रम ने टेस्ट कराए, तब बीमारी पकड़ में आई और इलाज शुरू हुआ। टीम के साथ जांच के लिए पहुंचे एसडीएम बच्चों की मौतों से प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया। कलेक्टर ने पांच सदस्यीय टीम गठित की है , जो सेवा आश्रम पहुंची। डॉक्टर्स ने हर बच्चे की बारीकी से स्क्रीनिंग की। एसडीएम पवन वारिया ने महिला बाल विकास अधिकारी , जिला पंचायत और अन्य अधिकारियों के साथ व्यवस्था का जायजा लिया। एसडीएम ने बताया- भोजन, प्रबंध और सुविधाओं की रिपोर्ट तैयार कर सौंपी जाएगी। पीएम रिपोर्ट के कारण पर पूछने पर उन्होंने कहा- यह जांच का हिस्सा है, परीक्षण जारी है। बच्चे पूर्व से ही बीमार थे, इलाज कर रहे थे सीएमएचओ डॉ. अशोक कुमार पटेल बच्चों की मौत का कारण मल्टी ऑर्गन फेल होना बताते हैं। उनका कहना है कि पीएम रिपोर्ट की ऑनलाइन मॉनीटरिंग होती है। मौत का कारण यही सामने आया है।
सभी बच्चों का पर्याप्त इलाज जिला अस्पताल में किया जा रहा था। ज्यादातर बच्चे पूर्व में ही बीमार थे। उन्हें कई तरह की परेशानी थी। प्रति शनिवार यहां कैंप लगता है। जिला अस्पताल में ले जाने की आवश्यकता महसूस होती है तो वहां भेज देते हैं। अभी कितने बच्चे क्रिटिकल हैं? इस सवाल पर सीएमएचओ कहते हैं, स्क्रीनिंग चल रही है। फिर भी बच्चों की हालत ज्यादा बेहतर नहीं है। हमारी सेवा से कई बच्चे जीवित बच गए- सुधीरभाई
आश्रम के संचालक सुधीरभाई गोयल कहते हैं कि जब बच्चे यहां पर आए तो उनकी हालत काफी खराब थी। अगर ध्यान नहीं दिया जाता तो 50 से अधिक बच्चे आहत होते। हमारी सेवा की वजह से काफी बच्चे जीवित हैं।
आप देख ही रहे हैं कि कैसे इन बच्चों की सेवा की जा रही है। कुछ लोगों ने संस्था को बदनाम करने के लिए षड्यंत्र रचा। वह कामयाब नहीं होंगे। हमारे यहां 1200 लोगों का परिवार है। सभी की सेवा करते हैं। कई लोग हैं, जिन्हें हम सेवावीर कहते हैं। वह उन्हीं लोगों में से हैं जो यहां लंबे समय से रह रहे हैं। कोई गाड़ी चला रहा है, कोई चौकीदारी कर रहा है तो कोई अकाउंट का काम देख रहा है। बच्चों के बारे में इतना ही कहूंगा कि उनकी हालत काफी खराब है। कई तो अपने बेड से भी नहीं उठ पाते। आप भी समझ सकते हैं कि कोई बेड पर ही सालों से है तो उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कैसी होगी। मैं चाहता हूं कि बच्चों की केयर और अच्छे से हो। मैं प्रशासन से कहना चाहता हूं कि मैं यहां बिल्डिंग उपलब्ध करा दूंगा। आप डॉक्टरों की टीम यहां 24 घंटे बैठा दीजिए। ताकि सभी को मेडिकल सुविधा मिल सके।
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