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Satna News: आलोक ने कहा कि इंसान लगातार कुत्तों के क्षेत्रों पर कब्जा कर रहे हैं. वे उन्हें एक जगह से दूसरी जगह रिलोकेट कर देते हैं. नए माहौल में डॉग्स असहज होते हैं, जिससे आक्रामक व्यवहार की संभावना बढ़ जाती है. भूख और प्रताड़ना भी हमलों की वजह बनती है.
सतना. एक सड़क हादसा, कुछ पल की लापरवाही और उसके बाद शुरू हुई जीवनभर की जिम्मेदारी. मैहर और सतना में आज जिस शख्स को लोग घायल और अपाहिज कुत्तों का सहारा मानते हैं, उसने कभी सोचा भी नहीं था कि एक दुर्घटना उसकी पूरी जिंदगी की दिशा बदल देगी. एक फीमेल डॉग और उसके चार बच्चों की मौत ने आलोक को अंदर तक झकझोर दिया. उसी दिन उन्होंने ठान लिया कि अब किसी बेजुबान की जान यूं सड़क पर नहीं जाएगी. लोकल 18 से बातचीत में ज्योतिर्मय वेलफेयर सोसाइटी के आलोक बताते हैं कि साल 2018 में उनकी गाड़ी से एक फीमेल डॉग का एक्सीडेंट हो गया था. उसके साथ मौजूद चार पिल्ले भी हादसे की चपेट में आ गए. यह घटना उनके लिए सिर्फ एक दुर्घटना नहीं थी बल्कि उनकी गैर-जिम्मेदाराना हरकत का अहसास थी. इस घटना के बाद से ही उन्होंने घायल और अपाहिज कुत्तों की सेवा को अपना मिशन बना लिया.
जून 2025 में उनकी संस्था ज्योतिर्मय वेलफेयर सोसाइटी का रजिस्ट्रेशन हुआ. वर्तमान में यह सोसाइटी मैहर जिले में स्थापित है जबकि इसकी एक शाखा सतना में सेंट्रल जेल के पीछे हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी में संचालित हो रही है. हालांकि सेवा कार्य 2018 से लगातार जारी है. पिछले 9 महीनों में संस्था करीब 600 डॉग्स का रेस्क्यू कर चुकी है जबकि 2018 से अब तक लगभग 2000 कुत्तों को नई जिंदगी मिल चुकी है.
घर को बनाया शेल्टर
वर्तमान में लगभग 30 पैरालाइज्ड और गंभीर रूप से घायल कुत्ते आलोक के घर पर ही रहकर इलाज पा रहे हैं. संसाधनों की कमी के बावजूद वह इनकी देखभाल में कोई कमी नहीं छोड़ते. कई बार रेस्क्यू के लिए देसी तरीके अपनाने पड़ते हैं. सब्जी की डलिया तक का इस्तेमाल कर घायल कुत्तों को सुरक्षित निकाला गया है. इस कार्य में हर्षित निगम और आयुष ताम्रकार भी पूरा समय दे रहे हैं. इनके अलावा 4-5 सदस्यों की एक टीम निशुल्क सेवा में जुटी है. आलोक स्वीकार करते हैं कि इस सेवा के कारण उनकी निजी जिंदगी लगभग पीछे छूट चुकी है लेकिन उन्हें इसका कोई अफसोस नहीं है.
एंटी रेबीज कैंप और जागरूकता अभियान
संस्था हर महीने एंटी रेबीज कैंप आयोजित करती है. इन कैंपों में लोगों को समझाया जाता है कि कुत्ता खतरनाक नहीं होता बल्कि बीमारी खतरनाक होती है. समय पर वैक्सीनेशन से खतरे को रोका जा सकता है. आलोक का कहना है कि इंसान लगातार कुत्तों के क्षेत्रों पर कब्जा कर रहे हैं और उन्हें एक जगह से दूसरी जगह रिलोकेट कर देते हैं. कुत्ता नए माहौल में असहज होता है, जिससे आक्रामक व्यवहार की संभावना बढ़ जाती है. भूख और प्रताड़ना भी हमलों का कारण बनती है.
मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगों की भी मदद
यह संस्था सिर्फ स्ट्रीट एनिमल्स तक सीमित नहीं है. मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगों के लिए भी मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं. जरूरत पड़ने पर पशुओं का रेस्क्यू और उपचार पूरी तरह निशुल्क किया जाता है.
आलोक पेशे से शिक्षक हैं और रीवा में एजुकेशन हब नाम से कोचिंग क्लासेज भी चलाते हैं. आर्थिक चुनौतियां अक्सर सामने आती हैं, जिनमें उनके पिता उनका साथ देते हैं. आलोक का मानना है कि यह धरती जितनी इंसानों की है, उतनी ही पशुओं की भी. एक हादसे ने उन्हें संवेदनशील बनाया और आज वही संवेदना हजारों बेजुबानों की जिंदगी बचाने का कारण बन चुकी है.
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राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.