नहीं मिली सरकारी नौकरी तो बनीं कृषि सखी, अब सिखा रहीं जैविक खेती के गुर

नहीं मिली सरकारी नौकरी तो बनीं कृषि सखी, अब सिखा रहीं जैविक खेती के गुर


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Balaghat News: सीमा एड़े की कम उम्र में शादी हो गई थी. कभी वह चाहती थीं कि वह पढ़-लिखकर वकील बनें लेकिन किस्मत को यह मंजूर न था. शादी के बाद लगा कि पढ़ाई छूट जाएगी लेकिन पति और ससुर ने उनकी पढ़ाई फिर से शुरू कराई.

बालाघाट. जब कुछ करने की चाहत हो और अपनों का साथ हो, तो सपने पूरे हो ही जाते हैं. ऐसा ही कुछ कर दिखाया मध्य प्रदेश के बालाघाट के छोटे से गांव मगरदर्रा की रहने वाली सीमा एड़े ने. वह न सिर्फ अपने परिवार और बच्चों को संभालती हैं बल्कि गांव-गांव जाकर किसानों को जैविक खेती के गुर सिखा अपनी अलग पहचान भी बना रही हैं. लोकल 18 ने उनसे बातचीत की और उनकी कहानी जानने की कोशिश की. सीमा में हमेशा अपने लिए कुछ बड़ा करने का सपना था. आंखों में सपने बहुत थे लेकिन वह तो पूरे न हो सके मगर अपनी अलग पहचान बनाने के लिए सीमा ने संघर्ष किया और अब वह अपने सपने साकार कर रही हैं.

सीमा एड़े की जिंदगी आसान न थी. कम उम्र में हुई शादी और दूसरे परिवार की जिम्मेदारी. कभी वह चाहती थीं कि वह पढ़-लिखकर लॉयर बनें लेकिन किस्मत को यह मंजूर न था. शादी के बाद लगा था कि पढ़ाई छूट जाएगी लेकिन पति और ससुर अच्छे मिले, तो उन्होंने उनकी पढ़ाई शुरू कराई. पोस्ट ग्रेजुएशन और आईटीआई किया. इसके अलावा उन्होंने स्टेनो किया लेकिन उम्मीद के मुताबिक बेहतर नौकरी नहीं मिली. समय के साथ उन्होंने नौकरी की चाह भी छोड़ दी.

नौकरी की चाह छूटी, मिला नया सहारा
एक वक्त था, जब सीमा को उम्मीद थी कि उन्हें अच्छी नौकरी मिल जाएगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. समय के साथ परिवार आगे बढ़ा और जिम्मेदारियां भी. ऐसे में वह भी परिवार के साथ खेतीबाड़ी के काम में जुट गईं. ऐसे में वह घर परिवार की जिम्मेदारी में लग गईं. सीमा खेतों में काम करतीं और पूरे परिवार को संभालती लेकिन समय का फेर ऐसा बदला कि सरकारी योजना की मदद उनकी जिंदगी बदलने लगी और वह कृषि सखी बन गईं. सीमा के कृषि सखी बनने के साथ ही उनकी जिंदगी बदलने लगी. अब वह न सिर्फ अपने घर पर जैविक खेती करती हैं बल्कि दूसरे किसानों को इसके गुर सिखाती हैं. ऐसे में वह अब तक 125 से ज्यादा किसानों को जैविक खेती की ट्रेनिंग दे चुकी हैं. अब वह न सिर्फ अपनी पहचान बना रही हैं बल्कि परिवार को भी बेहतरी से संभाल रही हैं.

आत्मा प्रोजेक्ट से जुड़ीं और बदली किस्मत
आत्मा प्रोजेक्ट से जुड़ने के साथ ही उन्होंने अपने गांव की 14 महिलाओं के साथ मिलकर एक स्वयं सहायता समूह शुरू किया. महिलाओं ने जैविक खाद बनाना शुरू किया. फिर अब वह बायो रिसोर्स सेंटर लगाकर बड़े स्तर पर यह काम कर रही हैं. वह न सिर्फ गांव के किसानों को अपने प्रोडक्ट बेच रही हैं बल्कि दूरदराज के गांवों में भी अपने प्रोडक्ट बेच रही हैं.

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Rahul Singh

राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.



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