500 भेड़ों को चराने के लिए पैदल यात्रा, 6 महीने बाद पहुंचते घर; जानें इस शख्स की कहानी

500 भेड़ों को चराने के लिए पैदल यात्रा, 6 महीने बाद पहुंचते घर; जानें इस शख्स की कहानी


आज हम आपको एक ऐसे शख्स की कहानी बताने जा रहे हैं, जो हर साल 6 महीने तक घर से बाहर निकलकर यात्रा करते हैं. दरअसल यूपी के रहने वाले बाबूलाल पाल जो बचपन से भेड़ पालने का काम करते आए हैं. हालांकि, इन्हें साल के 6 महीने तक यूपी से एमपी तक की यात्रा करनी पड़ती है, क्योंकि यूपी में जंगल पहाड़ न होने की वजह से उन्हें एमपी के जंगल और पहाड़ों में आकर अपनी सैकड़ों भेड़ों को चराना होता है. आइए जानते हैं इनकी यात्रा की कहानी.

उत्तरप्रदेश के फतेहपुर के रहने वाले 60 वर्षीय बाबूलाल पाल लोकल 18 से बातचीत में बताते हैं कि हम यमुना पार से फतेहपुर जिला आते हैं. बाबू बताते हैं कि छतरपुर जिले में जंगल पहाड़ बीहड़ बहुत हैं. इसलिए अपनी 500 भेड़ चराने अपने घर से निकल आते हैं.

ठंड भर करते हैं यात्रा
बाबू बताते हैं कि वह पेट पालने के लिए सर्दी के मौसम में भेड़ों के अपने घर फतेहपुर से निकल आते हैं. जहां-जहां जंगल, पहाड़ नजर आते हैं वहीं भेड़ों को चराने निकल पड़ते हैं. जब समय पूरा हो जाता है तो वापस घर भेड़ों को ले आते हैं.

बाबूलाल कहते हैं कि हम सैकड़ों भेड़ों को अपने साथ लिए ठंड में हर साल झांसी, टीकमगढ़, सागर और छतरपुर जैसी जगहों में महीनों घूमते हैं. क्योंकि हमारे यहां समतल जमीन है. भेड़ों को चराने के लिए पहाड़, बीहड़ और जंगल नहीं है. ठंड में खेती की पूरी जमीन में बुवाई हो जाती है. भेड़ों को खड़े होने की जगह तक नहीं रहती है. चरने का तो सवाल ही नहीं है. इसलिए मजबूरन महीनों ऐसे ही घूमते रहते हैं.

होली तक घर पहुंचने का होता है टारगेट
बाबूलाल बताते हैं कि घर से नवरात्रि यानि अक्टूबर-नवंबर में भेड़ों को लेकर निकले थे. कोशिश करते हैं कि होली त्योहार मनाने के लिए घर तक पहुंच जाएं. क्योंकि इस समय तक खेतों की कटाई होने लगती है. इसके बाद गर्मी और बरसात में भेड़ों को चराने के लिए खेत खाली हो जाते हैं.

घोड़ों पर रखते हैं खाने-पीने का सामान
बाबू बताते हैं 5 से 6 महीनों के लिए घर से बाहर रहना पड़ता है. इस दौरान जहां रुकते हैं वही आसपास के लोगों से आटा पानी चावल ले लेते हैं. अपना खाने-पीने के सामान से लेकर भेड़ों की दवा, कपड़े ये सब घोड़ों पर रखते हैं. हम जहां भी डेरा डाल लेते हैं. वहीं थोड़ा-बहुत व्यवस्था हो जाती है.

पीढ़ियों से कर रहे भेड़ चराने का काम
बाबूलाल पाल कहते हैं कि भेड़ों का मैनेजमेंट हम सालों से कुछ ऐसे ही करते आए हैं. हम ये काम पहली बार नहीं कर रहे हैं. ये हमारा पीढ़ियों का काम है. हम 500 भेड़ों को लेकर 6 महीनों में सैकड़ों किलोमीटर तक चलते हैं. हालांकि, हम 5 आदमी रहते हैं. क्योंकि घर से बाहर परदेश में निकले हैं तो एक आदमी 500 भेड़ नहीं संभाल पाएगा. अगर कोई भेड़ बीमार हो जाती है, तो हमारे पास दवाएं भी उपलब्ध होती हैं. सरकार फ्री में दवाएं भी उपलब्ध कराती है.



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