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Flower Farming: मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में अब किसान पारंपरिक गेहूं-सोयाबीन की खेती से आगे बढ़कर फूलों की खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं. खासतौर पर गुलाब और गेंदे की खेती किसानों के लिए कम लागत में ज्यादा मुनाफे का सौदा साबित हो रही है. जिले के कई किसानों ने अपनी जमीन के कुछ हिस्से में फूलों की खेती शुरू की और आज वही खेती उनकी आय का बड़ा जरिया बन गई है. (सावन पाटिल/खंडवा)
फूलों की खेती अब खंडवा के किसानों के लिए कम लागत में फायदे का सौदा साबित हो रही है. कम समय में तैयार होने वाली यह फसल किसानों को नियमित आय दे रही है. इसी वजह से जिले के कई किसान अब पारंपरिक खेती के साथ-साथ फूलों की खेती भी कर रहे हैं.
खंडवा में पास्ता गुलाब, कश्मीरी गुलाब, पूसा दीप (फ्रेंच गेंदा) और पूसा बहार (अफ्रीकी गेंदा) जैसी नई वैरायटी की खेती की जा रही है. इन फूलों की डिमांड स्थानीय बाजार के साथ-साथ इंदौर, भोपाल और अन्य बड़े शहरों में भी है. इनका उपयोग शादी-समारोह, सजावट और उपहार के रूप में बड़े पैमाने पर होता है, जिससे किसानों को अच्छा दाम मिल रहा है.
जिले के किसान विकी गंगराड़े, त्रिलोक पटेल, राजू पटेल और केशव पटेल जैसे कई किसानों ने परंपरागत खेती से हटकर फूलों की खेती शुरू की है. विकी गंगराड़े के खेतों में उगाए गए गुलाब भोपाल और इंदौर तक भेजे जा रहे हैं, जबकि अन्य किसानों के फूल खंडवा के स्थानीय बाजार में बिक रहे हैं. गुलाब का थोक भाव करीब 30 से 35 पैसे प्रति फूल मिल रहा है, जिससे किसानों को अच्छी आय हो रही है. कुछ किसानों ने इस खेती से अब तक लाखों रुपए की कमाई भी कर ली है.
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गेंदा और गुलाब की खेती में लागत कम और मुनाफा ज्यादा होता है. गेंदा की फसल कम समय में तैयार हो जाती है और सालभर इसकी मांग बनी रहती है. एक हेक्टेयर में खेती करने पर किसान 100 से 150 क्विंटल तक फूल प्राप्त कर सकते हैं. सही समय पर बाजार में बेचने से किसानों को बेहतर दाम मिलता है.
विशेषज्ञों के अनुसार फूलों की खेती के लिए दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है और खेत में अच्छी तरह गोबर की खाद मिलाने से उत्पादन बेहतर होता है. समय-समय पर सिंचाई, खाद और उर्वरक देने से फूलों की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों बढ़ते हैं. फूलों की तुड़ाई सुबह के समय करने से उनकी ताजगी बनी रहती है और बाजार में अच्छा भाव मिलता है.
फूलों की खेती अब खंडवा के किसानों के लिए नकदी फसल का रूप ले रही है. कम समय में तैयार होने वाली यह फसल किसानों को नियमित आय दे रही है. यही वजह है कि अब जिले के कई किसान पारंपरिक खेती के साथ-साथ फूलों की खेती को अपनाकर अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर रहे हैं.