Last Updated:
राई नृत्य, बुंदेलखंड का एक अद्भुत पारंपरिक लोक नृत्य है, जो शौर्य और श्रृंगार को सुंदरता से प्रस्तुत करता है. इस नृत्य में शारीरिक चपलता, वेग और विभिन्न अंग मुद्राओं के माध्यम से नृत्यांगनाये श्रृंगारी भावनाओं को जीवंत करते हैं.
सागर. बुंदेलखंड में शादी विवाह जन्मोत्सव सामाजिक कार्यक्रम या अन्य खुशी के अवसर पर राई करने की परंपरा है, राई नृत्य न केवल सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखता है, बल्कि इसमें छिपी लोक कला और परंपराओं को भी प्रकट करता है, जो बुंदेलखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की प्रतीक है. बुंदेलखंड के लोकप्रिय लोक नृत्य राई विश्व भर में ख्याति दिलाने वाले और इसके लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले पद्मश्री राम सहाय पांडे अब इस दुनिया में नहीं है. लेकिन उनके बेटे संतोष अब अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं.
राई नृत्य को लेकर संतोष पांडे कहते हैं कि जिस तरह से इंद्र की सभा में अप्सराय नृत्य करती थी और जिनको गंधर्व कहा जाता है वैसे ही आज पृथ्वी लोक पर भी नचनारियों के रूप में यह नृत्यांगनाएं होती हैं जो सर से लेकर पांव तक 16 गज (1 गज = 3 फीट) घाघरा पहनकर नृत्य करती हैं, यह नृत्य करने वाली महिलाएं बेड़ियां समाज से आती हैं.
रातभर होता है लोकनृत्य
बुंदेलखंड का यह रात में होने वाला विश्व का एक मात्र लोकनृत्य है. जो एक बार शुरू होने के बाद 8 से 10 घंटे तक लगातार चलता है ना तो नृत्य करने वाली महिलाएं रुकती हैं और ना ही इस नृत्य को देखने वाले बोर होते हैं एक जगह पर बैठकर घंटों तक देखते रहते हैं. दुनिया में ऐसा कोई नृत्य नहीं है जो इतने घंटे तक होता हो. इसमें नृत्य करने वाली महिलाएं सिर पर बेंदा से लेकर पांव में घुंघरू तक पहने रखती हैं और ओढ़नी से घूंघट गर्दन तक होता है. रात भर नृत्य देखने के बाद भी लोग उनका चेहरा नहीं देख पाते थे.
फाग, स्वांग, ग्याल खासियत
संतोष पांडे बताते हैं कि जब कहीं पर भी राई नृत्य की शुरुआत होती है तो सबसे पहले देवी देवताओं के सुमिरन आवाहन के लिए सुमरनी गाई जाती है. इसके बाद गीत शुरू होते हैं जिसमें फाग, स्वांग, ग्याल के साथ चलती रहती है. इनके जिस तरह के गीत होते हैं इस तरह की मृदंग टिमटी नगरिया और अन्य साज बाज बजते रहते हैं. इन्हीं की थाप पर ताल मिलाकर नृत्य की घेरदार नृत्य करती रहती हैं. यह लोकप्रिय नृत्य राई सूर्य अस्त होने के बाद शाम को शुरू होकर सुबह सूर्योदय होने से पहले तक चलता है.
कृष्ण से जुड़े मंदिरों में यह परंपरा के रूप में शामिल
संतोष पांडे बताते हैं कि पहले की नृत्यांगनाएं 16 गज का सूती का लहंगा पहनकर नृत्य करती थी. लेकिन समय के साथ-साथ पहले यह 12 गज का हुआ, फिर 11 गज फिर 9 गज और अब 8 गज का सिल्क वाला लहंगा पहनने लगी है. और इस नृत्य में इनका घूमर ही आकर्षित करने वाला होता है. होली के समय भी इस नृत्य का का बड़ा महत्व होता है जो रंग पंचमी तक प्रसिद्ध और ऐतिहासिक मंदिरों में देखने को मिलता है खासकर कृष्ण भगवान से जुड़े मंदिरों में यह परंपरा के रूप में शामिल है. रंग पंचमी पर गांव-गांव में फाग मंडली के साथ यह नृत्य करते हुए भ्रमण करती हैं.
About the Author
Dallu Slathia is a seasoned digital journalist with over 7 years of experience, currently leading editorial efforts across Madhya Pradesh and Chhattisgarh. She specializes in crafting compelling stories across …और पढ़ें