दिन गुरुवार, शाम करीब 6 बजे। नर्मदा किनारे ग्वारीघाट पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ थी। लोग शाम की नर्मदा आरती देखने जुट रहे थे। घाट किनारे फूल-प्रसाद, खिलौने और छोटे-छोटे सामान की दुकानों पर बच्चे बैठे थे। कुछ बच्चे रिमोट वाली कार का रिमोट हाथ में लिए इंतजार कर रहे हैं कि कोई ग्राहक अपने बच्चे को कार में घुमाने आए। खास बात यह है कि इन बच्चों के कंधों पर स्कूल बैग भी टंगे हुए हैं। घाट किनारे क्लास देख लगती है लोगों की भीड़ शाम 7 बजे नर्मदा आरती शुरू होती है और साढ़े 7 बजे आरती खत्म होते ही घाट की सीढ़ियों से एक साथ आवाज गूंजती है। “भारत माता की जय।” देखते ही देखते करीब 300 बच्चे सीढ़ियों पर बैठ जाते हैं। यही बच्चे कुछ देर पहले दुकानों पर सामान बेच रहे थे। सामने एक डिजिटल बोर्ड लगा है, छोटा सा साउंड सिस्टम है और एक शिक्षक माइक से बच्चों को पढ़ा रहे हैं। माहौल ऐसा कि घाट पर मौजूद लोग भी रुककर इस अनोखी क्लास को देखने लगते हैं। छोटे-छोटे बच्चे मैथ्स के बड़े-बड़े सवाल हल करते नजर आते हैं। इन बच्चों को पढ़ाने वाले वही पराग भैया हैं, जिन्होंने हाल ही में अपनी कोचिंग में पढ़ने वाली आर्थिक रूप से कमजोर छात्रा को 10वीं की परीक्षा दिलाने के लिए स्कूल प्रशासन के खिलाफ आवाज उठाई थी। दैनिक भास्कर ने पराग दीवान से बात कर उनकी पूरी कहानी जानी। शाम के वक्त घाट किनारे उनकी क्लास भी देखी। साथ ही उस छात्रा से भी बात की जो अब 10वीं की परीक्षा दे पाएगी और उन बच्चों से भी मिले जो हर दिन घाट पर पढ़ने पहुंचते हैं। मां के निधन के बाद आया बच्चों को पढ़ाने का विचार पराग बच्चों के बीच बैठकर कहते हैं, “ये बच्चे ही मेरा परिवार हैं। 2016 में मेरी मां का निधन हुआ। उनकी अस्थियां मैंने नर्मदा में विसर्जित की थीं। उस समय लगा कि अब मेरा कोई नहीं रहा। तभी मन में आया कि इन बच्चों के साथ ही जिंदगी बिताऊंगा। आज यही बच्चे मेरा परिवार हैं।” उन्होंने बताया कि शुरुआत सिर्फ 5 बच्चों से हुई थी। धीरे-धीरे संख्या बढ़ती गई और आज 200 से ज्यादा बच्चे यहां पढ़ने आते हैं। पराग बताते हैं, “शुरुआत में बच्चों को पढ़ने लाने के लिए 10-20 रुपए तक देने पड़ते थे। अब हालत यह है कि मेरे आने से पहले ही बच्चे घाट पर इकट्ठे हो जाते हैं। पूरा सेटअप लगा देते हैं, डिजिटल बोर्ड भी।” प्रशासन ने भी की मदद, चीफ जस्टिस ने बांटे टैबलेट पराग के इस प्रयास में कई लोगों ने मदद की। लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह ने बच्चों के लिए डिजिटल बोर्ड उपलब्ध कराया। वहीं 26 जनवरी को हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा ने 60 बच्चों को टैबलेट दिए, ताकि उनकी पढ़ाई डिजिटल तरीके से हो सके। पराग कहते हैं, “हम प्रधानमंत्री के ‘पढ़ेगा इंडिया, बढ़ेगा इंडिया’ के लक्ष्य को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।” दिनभर दुकान, शाम को पढ़ाई पराग बताते हैं कि इन बच्चों के परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हैं। कई बच्चों के माता-पिता नाव चलाते हैं या फूल-प्रसाद और दिया-नारियल की दुकान लगाते हैं। कुछ बच्चे खुद भी दुकान चलाते हैं और दिनभर में 60-70 रुपए तक कमा लेते हैं। शाम को यही बच्चे पढ़ने के लिए घाट पर पहुंच जाते हैं। ‘पहले 20 रुपए देकर बुलाते थे, अब खुद आ जाती हूं’ 8वीं कक्षा की छात्रा परी यादव ने कहा,“मैं ग्वारीघाट पर नारियल-प्रसाद की दुकान लगाती हूं। शाम 6 बजे घर जाती हूं और तैयार होकर बैग लेकर पढ़ने आ जाती हूं। पराग भैया बहुत अच्छे से पढ़ाते हैं। 9 बजे के बाद वो 10वीं-12वीं वालों को पढ़ाते हैं।” परी मुस्कुराते हुए कहती है, “शुरुआत में भैया 20 रुपए देते थे और पढ़ाते थे। धीरे-धीरे पढ़ने की आदत लग गई। अब बिना पैसे लिए रोज पढ़ने आती हूं।” परी ने बातचीत के दौरान 625 का स्क्वायर और न्यूटन के लॉ भी समझाए। दुकान भी संभालती हूं, पढ़ाई भी करती हूं तीसरी कक्षा की छात्रा खुशी खिलौनों की दुकान संभालती है। वह बताती है, “पहले मेरी दीदी पढ़ने जाती थीं। फिर मैं भी उनके साथ जाने लगी। अब रोज खुद ही पढ़ने जाती हूं। कभी मम्मी दुकान चलाती हैं, कभी मैं।” घाट पर रिमोट कार चलाने वाली बच्ची भी पढ़ती है यहां चौथी कक्षा की आराधना घाट पर बच्चों की रिमोट कार चलवाती है। आराधना बताती है कि मैं शाम 5 बजे से गाड़ी चलाती हूं। फिर पराग सर से कोचिंग पढ़ती हूं। दिन में स्कूल भी जाती हूं। सर हमें मैथ्स और इंग्लिश पढ़ाते हैं। 10वीं की छात्रा को परीक्षा दिलाने के लिए लड़ी लड़ाई 13 फरवरी की शाम पराग दीवान को पता चला कि उनकी कोचिंग में पढ़ने वाली सान्या उईके को स्कूल ने फीस बकाया होने के कारण एडमिट कार्ड नहीं दिया है। अगले ही दिन परीक्षा शुरू होनी थी। पराग ने एक वीडियो बनाकर स्कूल के खिलाफ विरोध दर्ज कराया। वीडियो वायरल होते ही लोगों का समर्थन मिलने लगा। छात्र संगठन एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने स्कूल के सामने प्रदर्शन भी किया। पराग कहते हैं,“सान्या बेहद मेधावी छात्रा है। उसकी मां घर-घर काम करती है। फीस जमा नहीं हो पाने के कारण उसे परीक्षा से रोकना गलत था।” बाद में एक व्यक्ति ने आगे आकर छात्रा की पूरी फीस जमा कर दी। अब सान्या परीक्षा दे सकेगी। सान्या बताती है, “मम्मी घरों में काम करती हैं और पापा डेयरी में काम करते हैं। फीस नहीं जमा हो पाई थी। सर ने मदद की, अब मैं एग्जाम दे पाऊंगी।” आगे खोलना चाहता हूं ऐसा स्कूल जहां बच्चे ही टीचर होंगे पराग बताते हैं कि उनकी ‘पराग ट्यूटोरियल’ नाम से कोचिंग भी चलती है, जहां 9वीं से 12वीं तक के छात्रों को पढ़ाया जाता है और आईआईटी-नीट की तैयारी भी कराई जाती है। वे कहते हैं, “आगे मैं ऐसा स्कूल खोलना चाहता हूं जहां बच्चे ही टीचर बनें। 10वीं का बच्चा 8वीं वाले को पढ़ाएगा, 12वीं वाला 11वीं वाले को। इससे टीचर की सैलरी सीधे इन बच्चों के परिवारों तक पहुंचेगी।”
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