मुझे भगवान ने टीचर बनाया, एडमिशन, किताबें, किराया कुछ नहीं था, वही आए! गरीब बेटी की कहानी

मुझे भगवान ने टीचर बनाया, एडमिशन, किताबें, किराया कुछ नहीं था, वही आए! गरीब बेटी की कहानी


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Success Story: मध्य प्रदेश में सागर के गांव से सफलता की अनोखी कहानी सामने आई है. गरीब किसान की एक बेटी सरकारी टीचर बन गई. लेकिन, एक वक्त था जब उसके पास एडमिशन और किताबें खरीदने के पैसे नहीं थे. बस का किराया नहीं था. ऐसे में भगवान ही मदद करने आए. जानें कहानी…

Sagar News: कहते हैं संघर्ष जितना अधिक होता है, सफलता उतनी बड़ी होती है. सागर की एक बिटिया ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया. उमा राजपूत छह भाई-बहने हैं. उमा बड़ी हैं. पिता किसान हैं. दो एकड़ की खेती से पूरा परिवार चलाते हैं. जाहिर है, इस महंगाई में इतने में गुजर-बसर मुश्किल है. आर्थिक तंगी के बीच उमा ने पढ़ाई जारी रखी. बीमार भी पड़ी लेकिन हार नहीं मानी. उसके सपने को तब पंख लगे, जब वह प्राथमिक शिक्षक बन गई.

उमा ने बचपन से केवल गरीबी, आर्थिक तंगी, पिता की बेबसी, छोटे-भाई बहनों के कुचलते सपने ही देखे थे. उसने मेहनत के साथ धैर्य बनाए रखा. अब उसी संघर्ष का परिणाम है कि उमा वर्ग 3 में शिक्षक के पद पर चयनित हो गई. परिवार में खुशी का माहौल है. एक समय था जब उमा के पास किताबें खरीदने के लिए पैसे नहीं थे. उसे लग रहा था कि 12वीं के बाद कॉलेज में पढ़ने का सपना भी टूट जाएगा. लेकिन, उमा का कहना है कि अगर कोई संकल्प लेकर भगवान पर भरोसा रखकर मेहनत करे तो ईश्वर न जाने किस रूप में मदद कर देता है.

घरवालों ने बोल दिया था छोड़ दो पढ़ाई…
सागर के आदिवासी अंचल देवरी के विचुआ भवतरा की उमा राजपूत अपने भाई-बहनों के साथ पिता का हाथ बंटाने के लिए खेतों में कटाई और निंदाई करवाने के लिए भी जाती थी. इसके बाद जब वह 12वीं में थी तब स्वास्थ्य बिगड़ गया था. 2 महीने बिस्तर पर रहना पड़ा. तब परिवार ने उनसे पढ़ाई छोड़ने तक को कह दिया था, लेकिन उमा ने हिम्मत नहीं हारी. लगातार पढ़ाई करती रही.

भगवान ही तरह-तरह के रूप में मदद कर गए!
उमा ने बताया, कहावत है कि भगवान न जाने किस रूप में आकर मदद कर जाते हैं. वही उनके साथ हुआ. होनहार होने की वजह से क्षेत्र के समाजसेवियों ने भी उनकी मदद की. किसी ने आने जाने का किराया बस में फ्री कर दिया तो किसी ने फ्री में कॉलेज में एडमिशन दिलाया और फीस माफ करा दी. कोई शिक्षण सामग्री देता रहा. अब उमा ने पहले ही प्रयास में सफलता हासिल कर पिता के सपनों को तो पूरा किया ही साथ ही जिन लोगों ने भरोसा देख कर मदद की थी, उनकी उम्मीदों को भी पूरा किया.

संस्था के लोग आगे आए
उमा कहती हैं कि अगर मेहनत पूरी ईमानदारी और लगन से की जाए तो भगवान भी हमारी मदद करते हैं. हमारे साथ भी ऐसा ही हुआ. हमारे पास न तो कॉलेज में एडमिशन लेने के लिए पैसे थे, न आने-जाने के लिए किराए की व्यवस्था. यहां तक की आर्थिक स्थिति इतनी गड़बड़ थी कि किताबें खरीदने तक में सक्षम नहीं थे. लेकिन, हमारे क्षेत्र में ‘उम्मीद’ नाम की संस्था ऐसे ही गरीब बच्चों की मदद करती है. उन्होंने हमारी मदद करने में कोई कमी नहीं रखी. मैं उन सभी लोगों का आज धन्यवाद देती हूं, ईश्वर का धन्यवाद देती हूं.

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Rishi mishra

एक दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय. प्रिंट मीडिया से शुरुआत. साल 2023 से न्यूज 18 हिंदी के साथ डिजिटल सफर की शुरुआत. न्यूज 18 के पहले दैनिक जागरण, अमर उजाला में रिपोर्टिंग और डेस्क पर कार्य का अनुभव. म…और पढ़ें



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