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Balaghat flower king mahesh : उद्यानिकी विभाग की मैडम की मदद से फूलों की खेती शुरू की और अब वह बड़े पैमाने पर फूलों की खेती कर रहे हैं. इससे उन्होंने आमदनी को लगभग दोगुना किया है. पहले वह धान की खेती से जिस खेत से महज 70 हजार रुपए कमा रहे थे. अब वह उसी खेत से फूलों की खेती से करीब डेढ़ लाख रुपए का शुद्ध मुनाफा कमा रहे हैं. ऐसे में लोकल 18 बालाघाट के फ्लावर किंग महेश पांचे से मु
Agri News : भारतीय कृषि अब बदल रही है. किसान अब सरकारी योजनाओं से लाभ लेते हैं और अपनी तकदीर बदल रहे हैं. दरअसल, एक ऐसे ही किसान बालाघाट जिले के हीरापुर से है. उन्होंने उद्यानिकी विभाग की मैडम की मदद से फूलों की खेती शुरू की और अब वह बड़े पैमाने पर फूलों की खेती कर रहे हैं. इससे उन्होंने आमदनी को लगभग दोगुना किया है. पहले वह धान की खेती से जिस खेत से महज 70 हजार रुपए कमा रहे थे. अब वह उसी खेत से फूलों की खेती से करीब डेढ़ लाख रुपए का शुद्ध मुनाफा कमा रहे हैं. ऐसे में लोकल 18 बालाघाट के फ्लावर किंग महेश पांचे से मुलाकात की और उनकी खेती को समझने की कोशिश की, जानिए उनकी पूरी कहानी….
शुरुआत सिर्फ आधा एकड़ से
बालाघाट से महज पांच किलोमीटर दूर हीरापुर गांव के रहने वाले महेश पांचे का भरा पूरा परिवार है. वह शुरुआत से ही खेती किया करते है. पहले वह धान के अलावा सब्जियों की खेती करते थे. इसकी मदद से महज वह सिर्फ अपनी जीविका चला रहे थे. लेकिन उनके संपर्क में उद्यानिकी विभाग की ग्रामीण उद्यान विस्तार अधिकारी रानी अमूले आई और उन्होंने गेंदे के बीज के पैकेट दिए. इससे उन्होंने महज आधा एकड़ में फूलों की खेती शुरू कर दी. पहली बार की फसल में ही उन्हें मुनाफा होने लगा. फिर उन्होंने तीनों सालों से फूलों की खेती का रकबा ढाई एकड़ तक पहुंचा दिया है.
अब कर रहे तीन तरह के फूलों की खेती
महेश ने शुरुआत में सिर्फ गेंदे की फूल से ही शुरुआत की थी. लेकिन समय के साथ उन्होंने न सिर्फ खेती का रकबा बढ़ाया बल्कि अलग-अलग प्रजाति के फूलों की खेती भी शुरू कर दी है. अब वह अपने खेत में गेंदे के अलावा गुलाब, जरबेरा और डेजी के फूलों की खेती कर रहे है. इसमें वह स्मार्ट तरीके से काम करते हैं. पहले एक खेत को तैयार करते है, तब तक दूसरे खेत से उत्पादन लेते हैं.
पूरी तरह जैविक होती है फूलों की खेती
महेश का कहना है कि रासायनिक उर्वरकों से फसल पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. ऐसे में चार महीने चलने वाले पौधे सिर्फ दो महीने में नष्ट हो जाते हैं. ऐसे में न उत्पादन होता है और न ही मुनाफा. ऐसे में वह अपने खेत में पूरी तरह से ही जैविक खादों का इस्तेमाल करते हैं. इससे पौधों को सही ढंग से उचित पोषक तत्व प्राप्त होते हैं और रोग कीट कम लगते हैं.
जिले में ही हो जाता है पूरा बिजनेस
महेश फूलों को बेचने के लिए स्थानीय फूल व्यापारियों से संपर्क करते हैं. और उन्हें साल भर फूल सप्लाई करते हैं. ऐसे में उन्हें निश्चित आय हो रही है. वहीं, दूसरी तरफ अपने खाली समय में इन्हीं फूलों से वह डेकोरेटिंग का काम करते हैं. ऐसे में अब शादी ब्याह सहित दूसरे कार्यक्रम से उनकी आय हो जाती है.
लेकिन अब आ रही है एक समस्या
महेश का कहना है कि अब फूलों की खेती करने वाले किसानों की संख्या में इजाफा हो रहा है. ऐसे में स्थानीय व्यापारी फूलों के दाम कम कर रहे है. इससे लाभ पहले से कम हुआ है. वहीं, नागपुर जैसे शहर में ले जाने पर ट्रांसपोर्टिंग का खर्च कई गुना बढ़ जाएगा. वहीं, स्थानीय स्तर पर परफ्यूम की फैक्ट्री भी नहीं है. ऐसे में किसानों को समस्या आ रही है.
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7 वर्षों से पत्रकारिता में अग्रसर. इलाहबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स इन जर्नालिस्म की पढ़ाई. अमर उजाला, दैनिक जागरण और सहारा समय संस्थान में बतौर रिपोर्टर, उपसंपादक औऱ ब्यूरो चीफ दायित्व का अनुभव. खेल, कला-साह…और पढ़ें
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