Jabalpur News: जबलपुर में नर्मदा किनारे एक अनोखा स्कूल चलता है. इसमें कोई फीस नहीं, कोई क्लास नहीं, लेकिन पढ़ाई एवन. रोज इस स्कूल के शुरू होने से खत्म होने तक की प्रक्रिया घाट पर घूमने आए लोगों के लिए एक कौतुक होता है. यहां स्कूल शुरू करने के लिए कोई घंटा नहीं बजा, ‘भारत माता की जय’ बोली जाती है. इस अनोखे स्कूल की कहानी उस शख्स की पहल का नतीजा है, जिसकी जिंदगी मां-पिता के जाने के बाद से सन्नाटे में थी. इस गम को भुलाने के लिए पराग दीवान ने सैकड़ों बच्चों की जिंदगी बदलने का फैसला किया.
अब हर शाम जबलपुर में नर्मदा नदी किनारे बने ग्वारीघाट की सीढ़ियां एक अनोखी पाठशाला में बदल जाती हैं. यहां दिनभर मजदूरी या छोटी-मोटी दुकान चलाने वाले गरीब परिवारों के बच्चे स्कूल बैग लेकर पढ़ने बैठते हैं. पराग दीवान उनके बीच बैठकर उन्हें सिर्फ किताबों का ज्ञान ही नहीं, बल्कि जिंदगी में आगे बढ़ने का हौसला भी देते हैं. दरअसल, शाम करीब 6 बजे से नर्मदा किनारे श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने लगती है. लोग नर्मदा आरती देखने घाट पर जुटते हैं. इसी दौरान घाट किनारे फूल-प्रसाद, खिलौने और सामान की दुकानों पर बच्चे बैठे रहते हैं.
हर शाम एक आवाज गूंजी और….
शाम 7 बजे नर्मदा आरती शुरू होती है. करीब साढ़े 7 बजे जैसे ही आरती खत्म होती है, घाट की सीढ़ियों से एक साथ आवाज गूंजती है ‘भारत माता की जय’. इसके बाद देखते ही देखते करीब 200 बच्चे घाट की सीढ़ियों पर बैठ जाते हैं. क्लास शुरू हो जाती है. सामने एक डिजिटल बोर्ड लगाया जाता है. छोटा सा साउंड सिस्टम चलता है. माइक के जरिए पराग दीवान बच्चों को पढ़ाते हैं. घाट पर मौजूद लोग भी इस अनोखी क्लास को देखकर रुक जाते हैं. छोटे-छोटे बच्चे मैथ्स के सवाल हल करते नजर आते हैं. तमाम लोग इस क्लास का वीडियो भी बनाते हैं.
मां के निधन के बाद आया पढ़ाने का विचार
पराग दीवान ने लोकल 18 को बताया, 2016 में उनकी मां का निधन हो गया था. इससे पहले उनके पिता भी दुनिया छोड़ चुके थे. मां की अस्थियां नर्मदा नदी में विसर्जित करने के बाद उनके मन में इन बच्चों के लिए कुछ करने का विचार आया. पराग कहते हैं, ‘उस समय लगा कि अब मेरा कोई नहीं है. तभी तय किया कि इन बच्चों के साथ ही जिंदगी बिताऊंगा. आज यही बच्चे मेरा परिवार हैं’. पराग ने बताया, मेरी मां भी चाहती थी कि ऐसा स्कूल खुले, जिसमें ये फरिश्ते (गरीब बच्चे) पढ़ सकें.
5 बच्चों से शुरू हुई थी क्लास, कैबिनेट मंत्री ने की मदद
पराग बताते हैं कि शुरुआत में सिर्फ 5 बच्चे पढ़ने आते थे. धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ती गई और अब 200 से ज्यादा बच्चे रोज घाट पर पढ़ने पहुंचते हैं. शुरुआत में बच्चों को पढ़ाई के लिए बुलाने के लिए 10-20 रुपए तक देने पड़ते थे, लेकिन अब हालात यह हैं कि पराग के आने से पहले ही बच्चे घाट पर पहुंचकर पूरा सेटअप लगा देते हैं और डिजिटल बोर्ड भी तैयार कर देते हैं. इस दौरान प्रशासन से भी सहयोग मिला. पराग के इस प्रयास में कई लोगों ने मदद की. कैबिनेट मंत्री राकेश सिंह ने बच्चों के लिए डिजिटल बोर्ड उपलब्ध कराया. वहीं, जस्टिस संजीव सचदेवा ने 60 बच्चों को टैबलेट दिए, ताकि वे डिजिटल तरीके से पढ़ाई कर सकें.
दिनभर काम, शाम को पढ़ाई
घाट पर पढ़ने वाले कई बच्चों के परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हैं. किसी के माता-पिता नाव चलाते हैं तो कोई फूल-प्रसाद की दुकान लगाता है. कुछ बच्चे खुद भी दिनभर काम करके 60-70 रुपए तक कमा लेते हैं और शाम को पढ़ने पहुंच जाते हैं. 8वीं की छात्रा परी यादव बताती हैं कि वह ग्वारीघाट पर नारियल-प्रसाद की दुकान लगाती हैं. शाम को घर जाकर तैयार होती हैं और बैग लेकर पढ़ने आती हैं.
ऐसा स्कूल खोलेंगे, जहां बच्चे होंगे टीचर
पराग दीवान का सपना है कि आगे चलकर ऐसा स्कूल खोला जाए, जहां बच्चे ही बच्चों को पढ़ाएं. उनके मुताबिक, 10वीं का छात्र 8वीं के बच्चों को और 12वीं का छात्र 11वीं के छात्रों को पढ़ाएगा. इससे पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों के परिवारों की आर्थिक मदद भी हो सकेगी.