रीमा कैसे बन गया रीवा, जानें इसके नाम के पीछे की अनकही कहानी

रीमा कैसे बन गया रीवा, जानें इसके नाम के पीछे की अनकही कहानी


Rewa History: रीवा, जिसे कभी बघेल वंश की राजधानी माना जाता था, मध्य भारत की एक महत्वपूर्ण रियासत थी. रीवा राज्य का विस्तार मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ के कई हिस्सों तक फैला हुआ था. झांसी, टीकमगढ़, सतना, चित्रकूट, प्रयागराज, मिर्जापुर और शहडोल जैसे जिले भी कभी रीवा रियासत का हिस्सा हुआ करते थे. इस विशाल राज्य में कई छोटे-छोटे राजा शासन करते थे, जो रीवा राज्य के अधीन होते थे. मध्य प्रदेश का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध शहर, जिसे बघेल वंश के गौरवशाली इतिहास और अद्वितीय प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जाना जाता है. यह जिला न केवल अपने समृद्ध इतिहास के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इसके नामकरण का संबंध भी स्थानीय भौगोलिक विशेषताओं और पवित्र नदियों से है. माना जाता है कि रीवा का नाम नर्मदा नदी से लिया गया है, जो इस क्षेत्र के पर्वत मालाओं को खंड में विभाजित करती है.

रीवा के गांव के लोग आज भी यही मानते हैं कि विद्यालयों में पढाया जाता है कि रीवा नाम , रेवा (नर्मदा ) नदी के नाम पर पड़ा जबकि रीवा शहर एवं जिला , नर्मदा नदी से बहुत दूर है. यह तर्क मन में कई बार उठा , किन्तु इतिहास में लिखा सत्य मानकर , इसे जस का तस मान लिया. हालांकि महाराजा मार्तंड सिंह ,महारानी प्रवीनकुमारी एवं युवराज पुष्पराजसिंह को अपने भाषणों में रीवा जिले में निवास करने वालों को “रिमहा” कहते सुना था !वे कभी भी “रिवहा” नहीं कहते थे. निम्नलिखित लेख में उद्धृत तथ्य, स्पष्ट इशारा करते हैं कि रीवा का प्राचीन नाम “रीमां ” है ,जो क्रमशः “रीवां ” में परिवर्तित होते हुए ,अंग्रेजों के शासनकाल में रीमा

रीवा मध्यप्रदेश का एक जिला है रीवा का नामकरण नर्मदा के एक नाम रेवा से हुआ है. मूल नाम, “रीमां ” बदल कर स्थापित हुआ है ‘रीवा’ यहाँ के गाँवों मे आज भी जीवित है ‘रीमाँ’. लोक गीतों में भरा पड़ा है रीमाँ. यथा, दादर गीत में -रीमाँ के गोरी गहोरा केर झुलनी, रीमां सहर गुलजार. डग्गा फगुआ में-गढ़ रीमां केर बांका बघेला और नैकहाई युद्ध संबधी बिरहा गीत में-रीमाँ रायपुर सुन्दर लागइ, मोर मन रीमाँ काहीं लाग, रीमाँ सहर सहजय न मान्या, पिया तूँ रीमाँ न जाब, तूँ अउबइ माथ रघुराज सिंह से शासनाधिकार ले लिया अपने हाथ हटा दिया दफ्तरी काम से राजभाषा रिमँही और बैठा दिया फारसी को. फारसी भाषा में मकार बदल जाता है बकार में. फलस्वरूप लिखा जाने लगा रीवाँ, जो बीसवीं सदी के मध्य काल राज्यविलीनीकरण तक हिन्दी में प्रयोग होता रहा आया. ईस्वी सन 1919 में जीतन सिंह की ‘रीवां राज्य दर्पण’ नाम की पोथी छप कर आयी. जिसमे उक्त काल अनरूप रीवाँ का ही प्रयोग हुआ है.

रीवा न केवल अपने ऐतिहासिक महत्व और सांस्कृतिक धरोहर के लिए जाना जाता है, बल्कि इसकी प्राकृतिक सुंदरता और नदियों के कारण भी यह एक महत्वपूर्ण स्थान है. बिछिया नदी से प्रेरित इसका नाम और बघेल वंश के गौरवशाली इतिहास ने इस क्षेत्र को एक विशिष्ट पहचान दी है. आज रीवा, अपनी सांस्कृतिक धरोहर, पर्यटन स्थलों और ऐतिहासिक स्थलों के साथ, मध्य प्रदेश का एक महत्वपूर्ण शहर है. अगर आप इतिहास, कला और प्राकृतिक सौंदर्य के प्रेमी हैं, तो रीवा आपकी यात्रा सूची में अवश्य होना चाहिए.

तीन सौ साल का रीवा का इतिहास
रीवा का इतिहास लगभग तीन सौ साल पहले से जुड़ा है, जब बघेल वंश के राजाओं ने यहाँ अपनी सत्ता स्थापित की. बघेल वंश, जो गुजरात के सोलंकी राजपूतों से निकला था, रीवा को अपनी राजधानी बनाया और यहीं से उन्होंने अपने विशाल राज्य का संचालन किया. रीवा रियासत का क्षेत्र वर्तमान मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, और छत्तीसगढ़ के बड़े हिस्सों में फैला हुआ था. बघेल वंश के शासन के दौरान यह क्षेत्र न केवल राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था, बल्कि कला, संस्कृति और साहित्य का केंद्र भी बना रहा. रीवा के इतिहास में कई महान शासकों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया. विक्रमादित्य के बाद भाव सिंह रीवा के महाराज बने और उन्होंने अपने शासनकाल में कई सांस्कृतिक और धार्मिक स्थलों का निर्माण करवाया. इनमें महामृत्युंजय मंदिर प्रमुख है, जो रीवा के किले के भीतर स्थित है. इसके बाद रघुराज सिंह, गुलाब सिंह, मार्तंड सिंह और पुष्पराज सिंह जैसे शासक रीवा के इतिहास में अपनी छाप छोड़ गए. वर्तमान में पुष्पराज सिंह रीवा के महाराज हैं.

रीवा अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए भी प्रसिद्ध है. यह क्षेत्र कई झरनों, पहाड़ियों और नदियों से घिरा हुआ है. चचाई और बहुती जलप्रपात जैसे झरने इस क्षेत्र की प्राकृतिक धरोहर का एक हिस्सा हैं, जो इसे एक आदर्श पिकनिक स्थल बनाते हैं. रीवा के किले और बाघेल संग्रहालय जैसे ऐतिहासिक स्थल इस शहर के समृद्ध इतिहास को दर्शाते हैं.

गोविंदगढ़, जो रीवा के राजा की ग्रीष्मकालीन राजधानी थी, रीवा शहर से लगभग 13 किलोमीटर दूर स्थित है. यहां के शांत वातावरण और प्राकृतिक सुंदरता ने इसे एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल बना दिया है. इसके अलावा रानी तालाब, बाघेल संग्रहालय और रीवा का किला जैसे स्थल रीवा की सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत बनाए रखते हैं. रीवा जिले की भौगोलिक स्थिति इसे कई नदियों का घर बनाती है. जिले की प्रमुख नदियाँ टोंस या तमसा और सोन नदी हैं, जो गंगा की सहायक नदियाँ हैं. इन नदियों के जल से जिले का वर्षा जल बहता है. इन नदियों के अलावा बिछिया नदी भी प्रमुख रूप से महत्वपूर्ण है, जो रीवा शहर के बीचों-बीच बहती है. बिछिया नदी को ही रीवा के नामकरण का आधार माना जाता है.



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