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क्रिकेट आज भले ही आधुनिक हो चुका है, लेकिन 18वीं और 19वीं शताब्दी की शुरुआत में यह खेल आज जैसा बिल्कुल नहीं था. उस दौर में ‘अंडरऑर्म बॉलिंग’ का चलन था, यानी गेंद को ज़मीन के करीब से हाथ घुमाकर फेंका जाता था लेकिन किसे पता था कि खेल का सबसे बड़ा बदलाव किसी नियम पुस्तिका से नहीं, बल्कि एक महिला के कपड़ों की मज़बूरी से निकलेगा.
1864 में एक महिला क्रिकेटर की स्कर्ट ने किया MCC को गेंदबाजी के नियमों में बदलाव करने पर मजबूर
नई दिल्ली. क्रिकेट की दुनिया भी बड़ी अजीब है आज जिसे हम तेज़ रफ़्तार ‘रफ़्तार के सौदागरों’ का खेल कहते हैं, उसकी जड़ें दरअसल एक महिला की भारी स्कर्ट और उसके उलझते हाथों में छुपी हैं. चलिए, इस दिलचस्प कहानी के पन्ने पलटते हैं और जानते है कि जसप्रीत बुमराह, वसीम अकरम, कपिल देव शेन वॉर्न, जैसे और ना जाने कितने बड़े गेंदबाजों की रोमाचंक गेंदबाजी के पीछे की कहानी क्या है.
क्रिकेट आज भले ही आधुनिक हो चुका है, लेकिन 18वीं और 19वीं शताब्दी की शुरुआत में यह खेल आज जैसा बिल्कुल नहीं था. उस दौर में ‘अंडरऑर्म बॉलिंग’ का चलन था, यानी गेंद को ज़मीन के करीब से हाथ घुमाकर फेंका जाता था लेकिन किसे पता था कि खेल का सबसे बड़ा बदलाव किसी नियम पुस्तिका से नहीं, बल्कि एक महिला के कपड़ों की मज़बूरी से निकलेगा.
क्रिस्टीना विलिज: वह नाम जिसने इतिहास रचा
यह कहानी है जॉन विलिज और उनकी बहन क्रिस्टीना विलिज की. 18वीं सदी की शुरुआत में महिलाएं भी क्रिकेट का आनंद लेती थीं उस समय की महिलाएं आज की तरह स्पोर्ट्स वियर नहीं, बल्कि भारी-भरकम घेरे वाली लंबी स्कर्ट्स और पेटीकोट पहनकर मैदान पर उतरती थीं. जब क्रिस्टीना अपने भाई को गेंदबाजी करती थीं, तो अंडरऑर्म गेंद फेंकते समय उनका हाथ अक्सर उनकी चौड़ी और भारी स्कर्ट में फंस जाता था. इस उलझन से बचने के लिए क्रिस्टीना ने अपने हाथ को थोड़ा ऊपर उठाकर (Round-arm/Over-arm) गेंद फेंकना शुरू किया. उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि उनकी यह ‘जुगाड़’ तकनीक क्रिकेट की दुनिया में क्रांति लाने वाली है.
विरोध से स्वीकृति तक का सफर
जब क्रिस्टीना के भाई जॉन विलिज ने इस नई तकनीक को देखा, तो उन्हें इसमें अपार संभावनाएं नज़र आई. उन्होंने इसे पुरुषों के क्रिकेट में आज़माना शुरू किया लेकिन परंपरावादियों को यह ‘बदलाव’ रास नहीं आया कई सालों तक इसे ‘धोखेबाज़ी’ और नियमों के खिलाफ माना गया. लॉर्ड्स के मैदान पर कई विवाद हुए, अंपायरों ने नो-बॉल दी और खिलाड़ी मैदान छोड़कर बाहर तक चले गए. लेकिन जैसे-जैसे समय बदला, लोगों को समझ आया कि हाथ ऊपर करके गेंद फेंकने से गति और उछाल दोनों बेहतर मिलते हैं. अंततः, खेल की सर्वोच्च संस्था मेरिलबॉन क्रिकेट क्लब (MCC) ने हार मानी और साल 1864 में आधिकारिक तौर पर ‘ओवरआर्म बॉलिंग’ को कानूनी मान्यता दे दी.
आज जब हम जसप्रीत बुमराह या शोएब अख्तर की तेज़ गेंदों को देखते हैं, तो हमें उस महान महिला क्रिस्टीना विलिज का शुक्रिया अदा करना चाहिए. अगर उस दिन उनकी स्कर्ट आड़े न आती, तो शायद आज भी क्रिकेट में गेंदें लुढ़क रही होतीं. यह कहना गलत नहीं होगा कि क्रिकेट को ‘जेंटलमैन गेम’ बनाने के पीछे एक ‘लेडी’ का सबसे बड़ा हाथ है.