रिपोर्टर- आशीष पांडे शिवपुरी
Narwar Fort History: मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले में स्थित नरवर किला इतिहास, संस्कृति और प्राकृतिक सुंदरता का अनोखा संगम है. शिवपुरी से करीब 42 किलोमीटर और ग्वालियर से लगभग 82 किलोमीटर दूर काली सिंध नदी के पूर्व में 500 फीट ऊंची पहाड़ी पर बना यह किला लगभग 7 किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ है. चारों तरफ फैली हरियाली और पहाड़ियों के बीच स्थित यह किला मध्यभारत की ऐतिहासिक धरोहरों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है. कभी यह दिल्ली-पूना मार्ग का प्रमुख नगर माना जाता था. आज भी यह किला अपनी भव्य संरचना, प्राचीन इतिहास और पौराणिक प्रेम कथा के कारण इतिहास प्रेमियों और पर्यटकों को आकर्षित करता है.
महाभारत काल से जुड़ा नरवर का इतिहास
नरवर का इतिहास पौराणिक और ऐतिहासिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण माना जाता है. मान्यता है कि महाभारत काल में यह राजा नल की राजधानी थी, जिसे उस समय नलपुर या नलपुल कहा जाता था. बाद के समय में यह क्षेत्र कई राजवंशों के अधीन रहा. 12वीं शताब्दी में कछवाहा, परिहार और तोमर शासकों ने यहां शासन किया. इसके बाद मुगलों का अधिकार रहा और बाद में यह मराठा सिंधिया शासकों के अधीन आ गया. किले का निर्माण कछवाहा शासकों द्वारा कराया गया था और इसकी वास्तुकला में राजपूताना शैली की झलक दिखाई देती है, जो उस समय की स्थापत्य कला को दर्शाती है.
नल-दमयंती की अमर प्रेम कहानी
नरवर किला पौराणिक प्रेम कहानी नल और दमयंती से भी जुड़ा हुआ है. कथा के अनुसार दमयंती विदर्भ देश के राजा भीम की पुत्री थीं, जबकि नल निषध के राजा वीरसेन के पुत्र थे. दोनों एक-दूसरे की सुंदरता की चर्चा सुनकर ही बिना देखे प्रेम करने लगे थे. जब दमयंती का स्वयंवर आयोजित हुआ तो उसमें कई राजा और देवता भी पहुंचे. कहा जाता है कि इंद्र, वरुण, अग्नि और यम देवता ने नल का रूप धारण कर लिया था. लेकिन दमयंती ने अपने सच्चे प्रेम को पहचानते हुए नल को ही अपना पति चुना और दोनों का विवाह हुआ.
जुए की हार और बिछड़ने की कहानी
कथा के अनुसार राजा नल अपने भाई पुष्कर के साथ जुए में सब कुछ हार गए और उन्हें अपना राज्य छोड़ना पड़ा. इस कठिन समय में नल और दमयंती एक-दूसरे से अलग हो गए. भटकते हुए नल को कर्कोटक नाम के सांप ने काट लिया, जिससे उनका रंग बदल गया और कोई उन्हें पहचान नहीं सकता था. इसके बाद नल बाहुक नाम से एक सारथी बनकर जीवन बिताने लगे. दूसरी ओर दमयंती भी कठिन परिस्थितियों में अपने जीवन को आगे बढ़ाती रहीं. यह दौर उनकी प्रेम कहानी का सबसे कठिन समय माना जाता है.
सच्चे प्रेम की हुई जीत
कठिन परिस्थितियों और लंबे समय तक अलग रहने के बाद भी नल और दमयंती का प्रेम कमजोर नहीं पड़ा. दमयंती ने अपने धैर्य और बुद्धिमानी से नल को पहचान लिया, भले ही उनका रूप बदल चुका था. बाद में नल ने अपने भाई पुष्कर को दोबारा जुए में चुनौती दी और इस बार जीत हासिल कर अपना राज्य और सम्मान वापस प्राप्त किया. इस तरह नल-दमयंती की प्रेम कहानी का सुखद अंत हुआ. इसी कारण यह कथा भारतीय परंपरा में सच्चे प्रेम, विश्वास और धैर्य का प्रतीक मानी जाती है और नरवर किला इस कहानी से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है.
किले की खूबसूरती और संरचना
नरवर किला अपनी भव्य संरचना और प्राकृतिक सुंदरता के लिए भी प्रसिद्ध है. किले तक पहुंचने के लिए कई सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, लेकिन ऊपर पहुंचने के बाद चारों ओर फैली हरियाली और पहाड़ियों का मनमोहक दृश्य दिखाई देता है. किले का क्षेत्र चार भागों में विभाजित है- मचलोक, मदार, गजूर और ढोल अहाता. यहां तालकटोरा, चंदनखेड़ महल और कचहरी महल जैसे कई ऐतिहासिक भवन मौजूद हैं. किले के अंदर एक अखाड़ा भी है, जहां प्राचीन समय में कुश्ती और मल्लयुद्ध आयोजित होते थे. यह स्थान उस समय की राजसी जीवनशैली और स्थापत्य कला को दर्शाता है.
जल प्रबंधन और प्राचीन नगर
नरवर किले में प्राचीन जल प्रबंधन व्यवस्था भी देखने लायक है. किले के अंदर एक ही स्थान पर 8 कुएं और 16 बावड़ियां बनी हुई हैं, जो उस समय की उन्नत जल व्यवस्था को दर्शाती हैं. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यहां एक साथ लगभग 1600 पनिहारिन पानी भरती थीं. इतिहासकारों का मानना है कि कभी इस किले के अंदर पूरा एक नगर बसा हुआ था. यहां मीणा बाजार प्रमुख व्यापारिक केंद्र हुआ करता था, जहां लोग अपनी जरूरत की वस्तुएं खरीदा करते थे. यह व्यवस्था दर्शाती है कि नरवर किला केवल सैन्य दृष्टि से ही नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण था.
कैसे पहुंचे नरवर किला
नरवर किला मध्यप्रदेश के प्रमुख ऐतिहासिक पर्यटन स्थलों में से एक है और यहां पहुंचना काफी आसान है. किले के सबसे नजदीक शिवपुरी रेलवे स्टेशन है, जो लगभग 42 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. हवाई यात्रा करने वाले पर्यटक ग्वालियर एयरपोर्ट तक पहुंच सकते हैं, जो नरवर से करीब 82 किलोमीटर दूर है. इसके बाद सड़क मार्ग से आसानी से किले तक पहुंचा जा सकता है. यहां आने वाले पर्यटकों के लिए आसपास ठहरने और खाने-पीने की सुविधाएं भी उपलब्ध हैं. पहाड़ों और हरियाली के बीच स्थित यह किला इतिहास और प्रकृति प्रेमियों के लिए एक खास अनुभव प्रदान करता है.
इतिहासकार प्रमोद भार्गव ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि शिवपुरी जिले में स्थित नरवर का किला अत्यंत प्राचीन माना जाता है. इसे प्रागैतिहासिक किला भी कहा जाता है, क्योंकि इसकी सटीक काल-गणना निर्धारित नहीं हो सकी है. हालांकि, इसका उल्लेख महाभारत में मिलता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा नल, जिनकी पत्नी दमयंती थीं, एक समय इस क्षेत्र पर शासन करते थे. भारतीय कालक्रम के अनुसार यह काल सतयुग से जुड़ा माना जाता है.
कहा जाता है कि राजा नल को जुए की आदत थी. नरवर के पास ही डबरा के निकट एक प्राचीन किला स्थित है, जिसे पवाया के नाम से जाना जाता है. वहां नागवंशी राजाओं का शासन था और राजा नल के चचेरे भाई वहां राज करते थे. कथा के अनुसार दोनों के बीच जुआ खेला गया, जिसमें राजा नल अपना पूरा राजपाट हार गए. सब कुछ हार जाने के बाद राजा नल अपनी पत्नी दमयंती को लेकर नरवर से निकल पड़े.
नरवर किले के परिसर में माता पशर देवी का एक प्राचीन मंदिर भी स्थित है. मान्यता है कि जब राजा नल वहां से जाने लगे तो देवी ने उन्हें रुकने का संकेत दिया, लेकिन राजा नल अपने वचन के पक्के थे, इसलिए वे रुके नहीं और वहां से आगे बढ़ गए.
इसके बाद राजा नल और दमयंती चलते-चलते वर्तमान अशोकनगर जिले के ईसागढ़ क्षेत्र के पास पहुंचे. वहां एक प्राचीन तालाब है, जिसका अस्तित्व आज भी बताया जाता है. उसी स्थान पर रात में दोनों विश्राम के लिए रुके. जब दमयंती सो गईं तो राजा नल को यह सोचकर बहुत दुख हुआ कि उनकी वजह से उनकी पत्नी को कष्ट सहना पड़ रहा है. उन्होंने स्वयं को अभागा मानते हुए यह निर्णय लिया कि दमयंती का आगे का जीवन सुख से बीते, इसलिए वे चुपचाप उन्हें छोड़कर वहां से चले गए.
सुबह जब दमयंती जागीं तो उन्होंने देखा कि राजा नल वहां नहीं हैं. इससे वे अत्यंत दुखी हो गईं. उसी समय वहां से साधुओं का एक दल गुजर रहा था, जो विदर्भ की ओर जा रहा था, जिसे आज के समय में चंदेरी क्षेत्र से जोड़ा जाता है. दमयंती ने उन्हें अपनी पूरी कहानी बताई और कहा कि वह राजा नल की पत्नी हैं और जुए में सब कुछ हार जाने के बाद वे यहां आ गई हैं. साधुओं ने उनकी स्थिति समझी और उन्हें चंदेरी में उनके मायके, विदर्भ के राजा के पास पहुंचा दिया. बाद में परिस्थितियां बदलीं और समय के साथ राजा नल को अपना खोया हुआ राजपाट फिर से प्राप्त हो गया.