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Jabalpur LPG Cylinder Crisis: जबलपुर में एलपीजी सिलेंडर की किल्लत का असर प्राइवेट हॉस्टल पर भी पड़ रहा है. हॉस्टलों में रहने वाले स्टूडेंट्स की रसोई ठंडी हो गई है. खाने के लिए रेस्टोरेंट जा रहे हैं लेकिन वहां भी कई रेस्टोरेंट बंद होने की कगार पर हैं तो कुछ ने रेट बढ़ा दिए. घर जा नहीं सकते, जानें क्या बोल रहे स्टूडेंट्स….
Jabalpur News. जबलपुर में एलपीजी सिलेंडर की किल्लत का असर प्राइवेट हॉस्टल में पढ़ रहे स्टूडेंट्स पर भी सताने लगा है. हॉस्टलों में रहने वाले स्टूडेंट्स की रसोई ठंडी हो गई है और खाने का संकट गहराता जा रहा है. कमर्शियल सिलेंडर खत्म हो चुके हैं, जबकि नया सिलेंडर लेने के लिए लंबी वेटिंग के बाद भी नंबर नहीं आ रहा.
मजबूरी में छात्र-छात्राएं रेस्टोरेंट का सहारा ले रहे हैं, लेकिन वहां भी कमर्शियल सिलेंडर की कमी के चलते ताले लगने लगे हैं. एग्जाम सिर पर हैं. ऐसे में हॉस्टल के छात्र समझ नहीं पा रहे कि आखिर इस गैस संकट में पढ़ाई के साथ पेट की आग कैसे बुझाएं? आइए जानते हैं जबलपुर में पढ़ने वाले प्राइवेट हॉस्टल्स के स्टूडेंट्स क्या बोले…
घर भी नहीं जा सकते, वहां भी यही हाल
हॉस्टल की छात्रा करिश्मा ठाकुर ने बताया, हॉस्टल में 5 किलो के सिलेंडर का इस्तेमाल करती थी. लेकिन, अब सिलेंडर भी खत्म हो गया है. नंबर लगाने पर भी सिलेंडर नहीं मिल रहा है. मजबूरी में रेस्टोरेंट में जाकर स्नेक्स खाना पड़ रहा है. लेकिन अब धीरे-धीरे रेस्टोरेंट भी बंद हो रहे हैं. इससे काफी दिक्कतें हो रही है. घर में भी फोन लगाया, लेकिन घर में भी यही स्थिति है. एग्जाम भी नजदीक है. समझ से परे है, आखिर क्या करें? सिलेंडर की काफी मारामारी देखने को मिल रही है. एक ऑप्शन इंडक्शन का है. लेकिन हॉस्टल में इंडक्शन के लिए मनाही है.
अब गैस के लिए लंबी लाइन भी देख ली
स्टूडेंट विद्या खटीक ने बताया, पहली बार ऐसी सिचुएशन देखी है. इसके पहले नोटबंदी और कोरोना में ऐसा देखने को मिला था. जहां लंबी-लंबी लाइन बैंकों के बाहर और खाने के लिए लगती थी. लेकिन आज खाना तो है, पर सिलेंडर नहीं है. हॉस्टल का सिलेंडर खत्म हो चुका है. एक सहारा रेस्टोरेंट है, लेकिन कमर्शियल सिलेंडर में रोग के बाद रेस्टोरेंट में भी बुरे हालत हैं. जिस रेस्टोरेंट में हम खाना खा रहे हैं, वहां इंडक्शन का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसमें सिर्फ स्नेक्स ही मिल रहे हैं. घर से भी फोन आ रहा है, लेकिन घर में भी यही स्थिति है जो हॉस्टल में है.
कुछ समझ में नहीं आ रहा, कैसे काम चलेगा?
स्टूडेंट सृष्टि पांडे ने बताया, जो बची गैस थी, उसे बचा कर चल रहे थे. लेकिन, अब वो भी खत्म हो चुकी है. काफी क्रिटिकल कंडीशन है. हमें घर से लिमिट के पैसे ही मिलते हैं. ऐसे में रेस्टोरेंट अफोर्ड करना काफी महंगा हो रहा है और रेस्टोरेंट में भी धीरे-धीरे ताले लग रहे हैं. जो रेस्टोरेंट चल रहे हैं, उनके दाम धीरे-धीरे हाई हो रहे हैं. पैरेंट्स भी काफी चिंतित हैं. रोज कॉल आते हैं. घर बुला रहे हैं, लेकिन ये समय एग्जाम का है. कुछ कर नहीं सकते. मजबूरी में कैसे न कैसे काम चला रहे हैं. यह हालात सिर्फ हमारे नहीं कई हॉस्टल में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स के हैं.
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एक दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय. प्रिंट मीडिया से शुरुआत. साल 2023 से न्यूज 18 हिंदी के साथ डिजिटल सफर की शुरुआत. न्यूज 18 के पहले दैनिक जागरण, अमर उजाला में रिपोर्टिंग और डेस्क पर कार्य का अनुभव. म…और पढ़ें