गणगौर में ‘ज्वारों की बाड़ी’ बोने की परंपरा, इसके पीछे धार्मिक-वैज्ञानिक रहस्य

गणगौर में ‘ज्वारों की बाड़ी’ बोने की परंपरा, इसके पीछे धार्मिक-वैज्ञानिक रहस्य


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Khandwa News: महिलाएं इस बाड़ी को अपने परिवार की सुख-समृद्धि और पति की लंबी आयु के लिए बोती हैं. ज्वारों को माता पार्वती का रूप मानकर पूजा जाता है. निमाड़ क्षेत्र में गणगौर पर्व की यह परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत है. यह परंपरा दर्शाती है कि हमारी संस्कृति में आस्था के साथ-साथ विज्ञान और प्रकृति का गहरा संबंध रहा है.

खंडवा. मध्य प्रदेश के निमाड़-मालवा क्षेत्र में मनाया जाने वाला गणगौर पर्व सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि परंपरा, संस्कृति और लोक विज्ञान का अद्भुत संगम है. खंडवा सहित पूरे निमाड़ में इस पर्व की शुरुआत बाड़ी में ज्वारे बोने यानी माथा की मूठ की स्थापना के साथ होती है. इसके बाद कई दिनों तक देवी की पूजा और अनुष्ठान चलते हैं. लोकल 18 से बातचीत में साधना उपाध्याय बताती हैं कि ज्वारे बोने की परंपरा बेहद खास होती है. इसके लिए खास मिट्टी, अनाज और बांस की छोटी-छोटी टोकरियों का उपयोग किया जाता है. इन टोकरियों में जौ, गेहूं या ज्वार बोए जाते हैं. पहले जौ का अधिक उपयोग होता था, इसलिए इसे ज्वारा कहा जाता है लेकिन अब गेहूं और ज्वार भी बोए जाते हैं.

उन्होंने कहा कि बाड़ी में बोए गए ज्वारों को लगातार 9 दिनों तक पानी से सींचा जाता है. इस दौरान महिलाएं और श्रद्धालु पूरे श्रद्धा भाव से देवी की पूजा करते हैं. बाद में अक्षय तृतीया के दिन बाड़ी को दर्शन के लिए खोला जाता है और ज्वारों की टोकरियों को सुसज्जित कर घरों में लाया जाता है, जहां तीन दिन तक उनकी पूजा की जाती है. अंत में इनका विसर्जन कर दिया जाता है.

प्रकृति पूजा का प्रतीक
निमाड़ में गणगौर को प्रकृति की पूजा का प्रतीक माना जाता है. ज्वारे बोना इस बात को दर्शाता है कि मनुष्य अपनी आजीविका के लिए धरती और प्रकृति पर निर्भर है. यह पूरी प्रक्रिया प्रकृति के सृजन, पालन और विसर्जन के चक्र को दर्शाती है.

कृषि से जुड़ा वैज्ञानिक पहलू
इस परंपरा के पीछे एक वैज्ञानिक कारण भी छिपा है. पुराने समय में किसान अगली फसल के लिए बीजों की जांच करने के लिए बाड़ी में बीज बोते थे. जो बीज अच्छे से अंकुरित होते थे, उन्हें उपजाऊ मानकर अगली बुवाई के लिए सुरक्षित रखा जाता था. इस तरह यह परंपरा एक पारंपरिक बीज परीक्षण पद्धति भी थी.

गोबर खाद का उपयोग
बाड़ी की मिट्टी में विशेष रूप से गोबर की खाद मिलाई जाती है, जिससे ज्वारों का अंकुरण बेहतर होता है. यह भी किसानों के लिए एक संकेत होता था कि मिट्टी कितनी उपजाऊ है.

महिलाओं की आस्था से जुड़ी परंपरा
महिलाएं इस बाड़ी को अपने परिवार की सुख-समृद्धि और पति की लंबी उम्र के लिए बोती हैं. ज्वारों को माता पार्वती (गौरी) का रूप मानकर पूजा जाता है. निमाड़ क्षेत्र में गणगौर पर्व की यह परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत है, जो यह दर्शाती है कि हमारी संस्कृति में आस्था के साथ-साथ विज्ञान और प्रकृति का गहरा संबंध रहा है.

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Rahul Singh

राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.



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