चैत्र नवरात्रि पर बीस भुजा देवी धाम में उमड़ा भक्तों का सैलाब, यहां कर्ण ने की थी तपस्या

चैत्र नवरात्रि पर बीस भुजा देवी धाम में उमड़ा भक्तों का सैलाब, यहां कर्ण ने की थी तपस्या


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गुना में चैत्र नवरात्रि के पहले दिन सिद्ध शक्तिपीठ मां बीस भुजा देवी मंदिर में भक्तों का सैलाब उमड़ा है, यहां पर कर्ण ने भी 9 साल तक तपस्या की थी और इसका इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है. यहां पर दर्शन करने से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं.

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बीस भुजा देवी धाम में उमड़ा भक्तों का सैलाब

गुना में चैत्र नवरात्रि के पावन पर्व के पहले दिन जिला मुख्यालय से करीब 10 किलोमीटर दूर स्थित सिद्ध शक्तिपीठ मां बीस भुजा देवी मंदिर में श्रद्धा और भक्ति का अनूठा संगम देखने को मिला. अलसुबह 4 बजे से ही मंदिर के पट खुलते ही भक्तों का तांता लग गया, जो देर रात तक अनवरत जारी रहा. पांडव कालीन इतिहास समेटे इस मंदिर की महिमा दूर-दूर तक फैली है, जहां भक्त अपनी अलग-अलग मन्नतें और अटूट विश्वास लेकर माथा टेकने पहुंच रहे हैं.

दानवीर कर्ण की तपस्थली और 5500 साल पुराना इतिहास
मंदिर के पुजारी ने पौराणिक संदर्भों का हवाला देते हुए बताया कि इस स्थान का संबंध महाभारत काल से है. गणना के अनुसार महाभारत युद्ध को 5500 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन उससे भी पूर्व दानवीर महाराज कर्ण यहां आए थे. गुरु से किए गए असत्य संभाषण के पाप से मुक्ति पाने के लिए कर्ण ने इसी निर्जन वन में लगातार 9 सालों तक कठिन तपस्या की थी. उनकी अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर मां भगवती ने यहां दर्शन दिए. भविष्य पुराण और देवी भागवत पुराण में भी इस स्थल का उल्लेख मिलता है. यह कर्ण ही थे, जिन्होंने सर्वप्रथम देवी को बीस भुजा देवी कहकर संबोधित किया था.

दिन में तीन बार स्वरूप बदलती हैं माता
बीस भुजा देवी मंदिर का सबसे बड़ा चमत्कार माता का स्वरूप परिवर्तन है. पुजारी के अनुसार, मां भगवती दिन भर में तीन अलग-अलग स्वरूपों में दर्शन देती हैं. प्रात: काल में वे ‘बाल्यावस्था’ में नजर आती हैं. दोपहर होते-होते किशोरावस्था और युवावस्था का तेज झलकता है, जबकि सायंकाल के समय माता प्रौढ़ावस्था एवं वृद्धावस्था के स्वरूप में दिखाई देती हैं, जो भक्त दिन में दो बार माता के दर्शन करते हैं, वे इस सूक्ष्म परिवर्तन को स्पष्ट रूप से महसूस कर सकते हैं.

फसलों का अंश चढ़ाते हैं किसान
मान्यता है कि मां बीस भुजा देवी साक्षात लक्ष्मी का स्वरूप हैं. यहां विशेष रूप से वे माताएं-बहनें अरदास लगाने आती हैं, जिनकी गोद सूनी है. कहा जाता है कि मां किसी को खाली हाथ नहीं भेजतीं. इसके अलावा आर्थिक तंगी से जूझ रहे लोग भी यहां धन-धान्य की कामना लेकर आते हैं. चूंकि गुना एक कृषि प्रधान जिला है, इसलिए स्थानीय किसान अपनी फसल कटने के बाद उसका कुछ अंश माता के चरणों में अर्पित करते हैं. ताकि साल भर उनके भंडार भरे रहें. प्राचीन समय में जब बजरंग गढ़ जिला हुआ करता था, तब मां बीस भुजा देवी को वहां की अधिष्ठात्री देवी माना जाता था.

झंडे और चुनरी की लंबी कतारें
नवरात्रि के पहले दिन जिले भर से श्रद्धालु पैदल, पेंढ भरकर (लेटकर) और हाथों में केसरिया झंडे व चुनरी लेकर मां के दरबार पहुंचे. मां के अनन्य भक्त हरिशंकर शिवहरे ने बताया कि वे बचपन से यहां आ रहे हैं और माता के दरबार की सुंदरता अनुपम है. वहीं श्रद्धालु रजनी ओझा ने कहा कि नवरात्रि में यहां का वातावरण पूरी तरह शक्तिमय हो जाता है. पुलिस और प्रशासन द्वारा भी भीड़ को देखते हुए सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं.



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