3 राज्यों के नक्सल कमांडरों का इंटरव्यू: प्यार, शादी से लेकर नेताओं के मर्डर पर खुलकर बातचीत– कहा हालातों से हारकर बंदूक उठाई – Madhya Pradesh News

3 राज्यों के नक्सल कमांडरों का इंटरव्यू:  प्यार, शादी से लेकर नेताओं के मर्डर पर खुलकर बातचीत– कहा हालातों से हारकर बंदूक उठाई – Madhya Pradesh News




बड़े लोग जंगल काट दें तो कोई बात नहीं, और हम एक सूखी लकड़ी भी ले आएं तो पुलिस उठाकर ले जाती थी। मजदूरों को जानवरों से बदतर समझा जाता था। यह सब देखकर ही हमने बंदूक उठाने का फैसला किया। राकेश होड़ी ये बात कहते हुए अपने पास बैठे सुरेंद्र और दीपक की तरफ देखते हैं। दोनों ही उनकी बात पर सहमति जताते हैं। इस बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए दीपक कहते हैं हम भी आपकी तरह पढ़-लिखकर एक अच्छी नौकरी करना चाहते थे। अपने बूढ़े मां-बाप का सहारा बनना चाहते थे। इसके बाद दीपक सुरेंद्र की तरफ देखते हैं और फिर बात आगे बढ़ाते हुए सुरेंद्र कहते हैं कि हम जिन हालातों में पले-बढ़े, वहां अमीरों और गरीबों के लिए नियम-कायदे अलग थे। दरअसल, राकेश, सुरेंद्र और दीपक तीनों मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ (एमएमसी जोन) के खूंखार नक्सल कमांडर रहे हैं। राकेश ने महाराष्ट्र जोन की कमान संभाली है तो सुरेंद्र ने छत्तीसगढ़ और दीपक ने मध्य प्रदेश की। दो दशकों से ज्यादा वक्त तक जंगलों की खाक छानने, पुलिस की गोलियों से बचने और एक समानांतर सत्ता चलाने के बाद आज ये पुलिस की गिरफ्त में हैं। इन्होंने सरेंडर जरूर कर दिया है, लेकिन इनकी बातों में आज भी वो टीस, वो गुस्सा और वो दर्द साफ झलकता है, जिसने इन्हें घर-परिवार से दूर, दशकों तक जंगलों में एक अघोषित युद्ध लड़ने को मजबूर कर दिया। दैनिक भास्कर ने पुलिस अभिरक्षा में इन तीनों से करीब 2 घंटे तक लंबी बातचीत की। इस एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में इन्होंने अपनी जवानी के दिनों से लेकर जंगल की जिंदगी, प्यार, शादी, बच्चे, टेक्नोलॉजी और दुनियादारी से जुड़े हर सवाल पर बेबाकी से अपनी बात रखी। तीनों नक्सल कमांडर से सिलसिलेवार बातचीत आम दुनिया से दूर, जहां हर पल मौत का साया मंडराता हो, वहां क्या प्यार और परिवार के लिए कोई जगह होती है? इस सवाल पर तीनों कमांडरों ने जो बताया, वह नक्सली जीवन के एक अनछुए मानवीय पहलू को सामने लाता है। दलम में शादी कैसे होती है?
दीपक बताते हैं, पार्टी में शादी की इजाजत है। लीडर साल में एक बार निजी मीटिंग करते हैं। इसमें हर सदस्य से पूछा जाता है कि क्या आप शादी करना चाहते हैं? यह भी पूछा जाता है कि दलम की किस लड़की से आप शादी करना चाहते हैं। फिर लीडर उस लड़की से बात करते हैं। अगर लड़की की भी रजामंदी होती है, तो ही शादी होती है। किसी पर कोई दबाव नहीं होता। शादी का समारोह कैसा होता था? इस पर राकेश होड़ी कहते हैं, यह हालातों पर निर्भर करता है। अगर पुलिस का मूवमेंट कम होता और माहौल शांत होता, तो कभी-कभी पास के किसी गांव में जाकर दावत भी होती थी। वरना दलम के सदस्यों के बीच ही शादी संपन्न हो जाती थी। क्या महिला-पुरुष के बीच भेदभाव होता है?
नक्सली संगठनों पर अक्सर महिलाओं के शोषण के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन ये कमांडर इसे सिरे से खारिज करते हैं। सुरेंद्र कहते हैं, पार्टी में लैंगिक भेदभाव बिल्कुल नहीं है। यहां स्त्री-पुरुष को बराबरी का दर्जा दिया जाता है। खाना बनाने की ड्यूटी रोटेशन में लगती है। अगर 10 लोगों का दलम है, तो 3 लोगों की ड्यूटी खाना बनाने की होगी, बाकी लोग पानी और लकड़ी लाने में मदद करेंगे। यहां पुरुष भी खाना बनाते हैं और बर्तन भी मांजते हैं। नक्सली बच्चे पैदा क्यों नहीं करते?
यह एक ऐसा सवाल है जो हमेशा कौतूहल पैदा करता है। क्या पार्टी इसकी इजाजत नहीं देती? दीपक इस पर कहते हैं, ऐसा बिल्कुल नहीं है। कोई रोक-टोक नहीं है। लेकिन आप खुद सोचिए, जब आपकी अपनी जिंदगी हर पल दांव पर लगी हो, आप एक जगह टिककर नहीं रह सकते, तो आप एक नन्ही सी जान को इस मुश्किल में क्यों डालेंगे? पति-पत्नी की अलग-अलग मुलाकात होती थी
जंगल की जिंदगी में पति-पत्नी का साथ भी आम लोगों जैसा नहीं होता था। राकेश बताते हैं, कई बार हमारी तैनाती अलग-अलग एरिया कमेटी में होती थी। महीने-दो महीने में जब कोई मीटिंग होती, तभी कैंप में मुलाकात हो पाती थी। रोज-रोज मिलना संभव ही नहीं था। जब मिलते भी थे, तो पत्नी के लिए कोई तोहफा तक नहीं ले जा सकते थे, क्योंकि हम जहां रहते थे, वहां बाजार नहीं थे और शहर जाने का मतलब था पकड़े जाने का खतरा। गुटखे के पाउच से मिलता था पुलिस का सुराग
जंगलों में पुलिस के आने का पता कैसे चलता था? इस पर सुरेंद्र कहते हैं, हमारा सबसे बड़ा नेटवर्क गांव के लोग थे। वे हमें किसी न किसी तरह इशारा कर देते थे। कई बार कोई बच्चा या बुजुर्ग खबर देने आ जाता था। इसके अलावा हम खुद भी सतर्क रहते थे। जंगलों में पुलिस के जूतों के निशान हमें उनके मूवमेंट की जानकारी दे देते थे। कई बार तो सुरक्षाबलों के फेंके हुए गुटखे के पाउच और पीक से भी हमें पता चल जाता था, क्योंकि उन खास ब्रांड के गुटखे हमारे इलाके में नहीं मिलते थे। जंगल में सांप-बिच्छू का डर नहीं लगता था? राकेश हंसते हुए कहते हैं, हम 120 जीएसएम की मोटी तिरपाल का तंबू लगाते थे, उसमें कोई दिक्कत नहीं होती थी। सांप-बिच्छू का डर कभी नहीं रहा, लेकिन मच्छरों का रहा है। 2019 में पहली बार हाथ में आया टैबलेट
आज जब दुनिया 5G की बात कर रही है, तब इन कमांडरों ने 2019 से पहले कभी मोबाइल फोन तक नहीं चलाया था। दीपक बताते हैं, जब मैं 2019 में डिवीजनल कमेटी में कमांडर बना, तब मुझे एक टैबलेट मिला। उसे चलाना सिखाया गया। उसमें हम पार्टी की किताबें, साहित्य और कुछ अखबार पढ़ते थे, जैसे दैनिक भास्कर और हरिभूमि। संगठन को चलाने और दुनिया में क्या चल रहा है, यह जानने के लिए यह जरूरी था। क्या जबरन वसूली करते हैं नक्सली?
इस आरोप पर दीपक कहते हैं, यह गलत है। पार्टी अपील करती थी कि तेंदूपत्ता सीजन में हर आदमी अपनी एक दिन की मजदूरी पार्टी को दान दे। यह स्वैच्छिक होता था। जनयुद्ध के लिए जनता का सहयोग जरूरी है। पैसों के बंटवारे पर वे बताते हैं, हमारा भी सालाना बजट होता है। 10 लोगों के एक दलम को साल भर के लिए 2 से 3 लाख रुपए मिलते हैं, जिससे खाने-पीने और जरूरत का सामान खरीदा जाता है। बालाघाट में जो 11 लाख रुपए मिले थे, वो पार्टी के ही पैसे थे, जो बजट के बाद बांटे जाने थे। क्या मकसद पूरा हुआ?
इंटरव्यू के अंत में सबसे अहम सवाल पूछा गया- क्या जिस मकसद को लेकर आपने अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगा दी, वो पूरा हो गया? तीनों एक पल के लिए खामोश हो जाते हैं। फिर सुरेंद्र कहते हैं, नहीं, मकसद पूरा नहीं हुआ। लेकिन हमारी लड़ाई ने एक बड़ा काम किया है। आज आदिवासी अपने हक के लिए जाग गए हैं। सरकारें हमारी बात सुनने लगी हैं। हम देश के दुश्मन नहीं हैं। हम तो बस जल-जंगल-जमीन पर आदिवासियों के अधिकार की बात करते हैं। कोई भी क्रांति किसी एक लीडर की मोहताज नहीं होती। समय के साथ नए लोग जुड़ते हैं और अपनी रणनीति बनाते हैं। तीनों पूर्व कमांडर्स के बारे में सिलसिलेवार जानिए… झीरम हमले में महेंद्र कर्मा थे प्राइम टारगेट
छत्तीसगढ़ में झीरम घाटी हमला सबसे बड़े नक्सली हमलों में से एक था जिसमें महेंद्र कर्मा समेत कांग्रेस के कई बड़े नेताओं की मौत हुई थी। इस हमले में शामिल नक्सलियों में सुरेंद्र एक अहम भूमिका में थे। सुरेंद्र मूल रूप से सुकमा के रहने वाले हैं। वे बताते हैं, ‘मेरी उम्र 15 साल थी, जब मैंने पार्टी का बाल संगठन जॉइन किया। हमारे गांव में पुलिस वाले आते थे, लोगों को बेवजह परेशान करते थे, मुर्गा-दारू मांगते थे। मेरे मां-बाप भी उनसे तंग आ चुके थे। इसी गुस्से ने मुझे संगठन की ओर खींचा। झीरम घाटी हमले को लेकर वो बताते हैं कि हमारे निशाने पर मुख्य रूप से महेंद्र कर्मा थे, क्योंकि सलवा जुडूम के कारण बस्तर के 600 से ज्यादा गांव उजाड़ दिए गए थे। महेंद्र कर्मा को जिंदा पकड़ना चाहते थे
जब झीरम घाटी हमले की प्लानिंग हो रही थी तब पार्टी में इस बात पर लंबी बहस हुई थी कि इस हमले में निर्दोष लोग भी मारे जा सकते हैं। हमने तय किया कि हम महेंद्र कर्मा को जिंदा पकड़ेंगे। हमने 3 घंटे तक उन्हें सरेंडर करने के लिए चेतावनी दी, लेकिन वे गाड़ी से बाहर नहीं निकले और पुलिस को फायरिंग जारी रखने के लिए कहते रहे। जब तक वे बाहर निकले, क्रॉस-फायरिंग में कई दूसरे नेता मारे जा चुके थे। ‘मेरा नक्सली बनने का इरादा नहीं था’
राकेश की कहानी अलग है। वे पढ़े-लिखे थे और नक्सली बनने का उनका कोई इरादा नहीं था। राकेश बताते हैं कि 2003 की बात है, मैं 12वीं पास कर चुका था। गढ़चिरौली में अपने गांव में मैंने एक नक्सली पोस्टर देखा। मेरे मन में सवाल आया कि ये कौन लोग हैं? अगर आदिवासियों के लिए लड़ रहे हैं, तो उन्हें ही क्यों मार रहे हैं? इस सवाल का जवाब जानने के लिए मैं उनसे मिलने जंगल पहुंचा। वहां हथियारबंद नक्सली थे। मैंने उनसे पूछा- ये हथियार क्यों? जवाब मिला- आत्मरक्षा के लिए। फिर पूछा- ये लड़ाई कब तक चलेगी? बोले- जब तक नया समाज नहीं बन जाता। पुलिस ढूंढने लगी तो 1 महीना नक्सलियों के बीच रूका
राकेश बताते हैं कि मैं लौट आया, लेकिन महीने भर बाद मुझे महाराष्ट्र राज्य कमेटी के जोनल कमांडर दीपक तेलतुमड़े से मिलवाया गया। उन्होंने मुझे आंबेडकर, भगत सिंह, माओ और लेनिन के विचार बताए। उन्होंने कहा- नौकरी करके किसकी सेवा करोगे? जनता की लड़ाई लड़ो। उन्होंने मुझे 3 दिन रुकने को कहा। वे बोले, अगर अभी छोड़ दिया तो हमें अपना कैंप बदलना पड़ेगा। मैं रुक गया। उधर गांव में पुलिस मुझे ढूंढने लगी। डर के मारे मैं 1 महीना वहीं रुका रहा। जब उन्होंने जाने को कहा, तो मैंने कहा कि अब जाऊंगा तो पुलिस पकड़ेगी। बस, फिर मैं पार्टी का ही होकर रह गया। मेरा छोटा भाई आज सरकारी शिक्षक है और मेरे कई दोस्त पुलिस में अफसर और डॉक्टर हैं। टीआई ने मारा तो सहन नहीं हुआ
दीपक की कहानी उस सच्चाई को बयां करती है, जो कई आदिवासियों को नक्सली बनने पर मजबूर करती है। वे कहते हैं, मैं पांचवी तक पढ़ा हूं। 1996 में पार्टी ने मेरा नाम दीपक रखा, पहले मेरा नाम मंगल सिंह उइके था। हम गांव में दारुबंदी और तेंदूपत्ता के सही दाम के लिए पोस्टर चिपकाते थे। उसी समय एक टीआई था प्रशांत कतलम। एक दिन वह हमारे इलाके के 30-35 लोगों को उठाकर ले गया और इतना मारा कि एक आदमी की रास्ते में ही मौत हो गई। गांव में पुलिस का इतना खौफ हो गया कि सुबह होने से पहले ही घर की औरतें हमें खेतों में जाकर छिप जाने को कहती थीं। वे डरती थीं कि अगर पुलिस मर्दों को ले गई तो हल कौन चलाएगा।



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