Last Updated:
Khandwa News: करन सेन ने लोकल 18 से कहा कि उन्होंने जिंदगी में गरीबी देखी है, संघर्ष देखा है, इसलिए वह चाहते हैं कि गांव के बच्चों को वे सब दिक्कतें न झेलनी पड़ें, जो उन्होंने झेली थीं.
खंडवा. मध्य प्रदेश के खंडवा जिले के सुरगांव जोशी गांव में रहने वाले करन सेन की कहानी बिल्कुल अलग है. वह दिन में बच्चों को पढ़ाते हैं और शाम होते ही अपने सैलून को संभालते हैं. एक तरफ शिक्षा की जिम्मेदारी, तो दूसरी तरफ परिवार का पुश्तैनी काम, दोनों को साथ लेकर चल रहे करन आज गांव में मिसाल बन चुके हैं. करन सेन का जीवन आसान नहीं रहा. उनके पिता अनिल सेन पिछले करीब 25 साल से गांव में सैलून चलाते आ रहे हैं. पहले के समय में हालात ऐसे थे कि लोग बाल कटवाने के बदले पैसे नहीं बल्कि अनाज देते थे. इसी काम से परिवार चलता था. घर की आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं थी, इसलिए करन ने छोटी उम्र से ही अपने पिता के साथ सैलून पर हाथ बंटाना शुरू कर दिया था लेकिन करन के अंदर पढ़ाई करने की अलग ही लगन थी. दिन में काम और बाकी समय में पढ़ाई, इसी तरह उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी. गांव के सरकारी स्कूल से पढ़ाई करने के बाद उन्होंने खंडवा जाकर डिप्लोमा इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की. पढ़ाई के दौरान और बाद में उन्होंने शहर के कई संस्थानों में बच्चों को पढ़ाया भी, जिससे उन्हें टीचिंग का अनुभव मिला.
इसी दौरान करन को एक बात हमेशा खटकती रही कि गांव के बच्चे अच्छी पढ़ाई के लिए शहर जाते हैं लेकिन हर परिवार इतना खर्च नहीं उठा पाता. रोज आना-जाना, किराया और महंगी फीस, ये सब किसान परिवारों के लिए आसान नहीं होता. कई बच्चे इसी कारण पढ़ाई बीच में छोड़ देते हैं या आगे पढ़ नहीं पाते. यहीं से करन के मन में एक बड़ा विचार आया कि क्यों न गांव में ही अच्छी कोचिंग शुरू की जाए ताकि बच्चों को बाहर न जाना पड़े और कम खर्च में बेहतर शिक्षा मिल सके. इसके बाद करन ने अपने गांव में ही डॉल्फिन कोचिंग की शुरुआत कर दी. शुरुआत में संसाधन कम थे लेकिन हौसला बड़ा था.
मां ने महिला समूह से लिया लोन
उनकी मां ने महिला समूह से लोन लेकर उनकी मदद की, जिससे उन्होंने टिन शेड में छोटा सा सैलून और कोचिंग का काम शुरू किया. धीरे-धीरे बच्चों का भरोसा बढ़ा और कोचिंग में संख्या भी बढ़ती गई. आज आलम यह है कि उनके यहां 100 से 150 बच्चे पढ़ने आते हैं. खास बात यह है कि उन्होंने अकेले नहीं बल्कि एक टीम बनाकर काम शुरू किया. आज उनके साथ 4-5 टीचर जुड़े हुए हैं, जिनमें से कुछ खंडवा से गांव आकर बच्चों को पढ़ाते हैं. करन सिर्फ पढ़ाई तक सीमित नहीं हैं. वह बच्चों के लिए गर्मियों में समर कैंप भी लगाते हैं, जिसमें इंग्लिश स्पीकिंग, बेसिक नॉलेज और पर्सनैलिटी डेवलपमेंट जैसी चीजें सिखाई जाती हैं. उनका मकसद साफ है, गांव के बच्चों को शहर जैसी शिक्षा गांव में ही देना.
पुश्तैनी काम को नहीं भूले करन सेन
वहीं दूसरी तरफ करन अपने पुश्तैनी काम को भी नहीं भूले. शाम होते ही करन अपने सैलून पर पहुंच जाते हैं और गांव के लोगों की हेयर कटिंग, दाढ़ी और अन्य काम करते हैं. उनका मानना है कि कोई भी काम छोटा नहीं होता और मेहनत से किया गया हर काम इज्जत दिलाता है. लोकल 18 से बातचीत में करन कहते हैं कि उन्होंने जिंदगी में गरीबी देखी है, संघर्ष देखा है, इसलिए वह चाहते हैं कि गांव के बच्चों को वो दिक्कतें न झेलनी पड़ें, जो उन्होंने झेली थीं. वह युवाओं को भी संदेश देते हैं कि अगर मन में कुछ करने की चाह हो, तो छोटे से गांव से भी बड़ी शुरुआत की जा सकती है.
करन सेन की कहानी सिर्फ एक इंसान की कहानी नहीं बल्कि उस सोच की कहानी है, जो कहती है कि अगर इरादा मजबूत हो, तो एक साथ कई जिम्मेदारियां निभाकर भी समाज में बदलाव लाया जा सकता है.
About the Author
राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.