माता के चमत्कारी मंदिर! मुकदमों पर मिलेगी विजय, ज्योत जलाकर पूरी होगी कामना

माता के चमत्कारी मंदिर! मुकदमों पर मिलेगी विजय, ज्योत जलाकर पूरी होगी कामना


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Chhatarpur Temples: बुंदेलखंड के देवी मंदिरों की अलग-अलग मान्यताएं हैं. चैत्र नवरात्रि के पर्व पर देवी मंदिरों में रोजाना हजारों भक्तों की भीड़ उमड़ रही है. सच्ची श्रद्धा से माता की भक्ति करने पर भक्तों की मनोकामना पूरी होती है. जानते हैं छतरपुर के चमत्कारी देवी मंदिरों के बारे में.

चैत्र नवरात्रि पर आपको हम छतरपुर जिले के ऐसे चमत्कारी देवी मंदिरों की कहानी बताने जा रहे हैं, जिनका इतिहास हजारों साल पुराना है. यहां त्रेता युग से लेकर आल्हा-ऊदल के जमाने की देवियां विराजमान हैं.

छतरपुर में विराजमान मां पीतांबरा की ख्याति एक शक्तिपीठ के रूप में है. एक पीतांबरा माता दतिया में विराजी हैं, तो उन्हीं की छाया छतरपुर में पीतांबरा माता मानो साक्षात विराजमान हैं. पुरातन काल से ही पीतांबरा माता बगलामुखी को तंत्र-मंत्र साधना की देवी के रूप में जाना जाता है. ऐसा माना जाता है कि संकट से बचने के लिए और मुकदमों पर विजय के लिए माता पीतांबरा की पूजा की जाती है.

अब बात करते हैं शहर के खेरे के देवी माता मंदिर की, जो सैकड़ों वर्ष पुराना है. माना जाता है कि नगर की रक्षा के लिए माता यहां विराजमान हुई थीं. इसी आस्था के कारण नवरात्रि के दौरान इस मंदिर में विशेष रूप से धार्मिक माहौल रहता है. मंदिर के पुजारी रज्जू महाराज के मुताबिक, यहां वर्षों से यह परंपरा चली आ रही है कि भक्त नवरात्रि में ज्योत जलाकर माता से अपनी मनोकामना मांगते हैं. सच्चे मन से मांगी गई हर इच्छा पूरी होती है.

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छतरपुर से लगभग 55 किमी दूर लवकुशनगर में माता का एक ऐसा मंदिर है, जिसका इतिहास त्रेता युग से जुड़ा हुआ है. इस मंदिर को मां बंबर बेनी के नाम से जाना जाता है.

इस मंदिर के पहाड़ पर महर्षि वाल्मीकि का आश्रम भी है. किंवदंती के अनुसार, भगवान राम द्वारा माता सीता का निष्कासन किए जाने के बाद वह यहां वाल्मीकि आश्रम में रहीं. यहां आश्रम में ही लव और कुश का जन्म हुआ था.

छतरपुर जिले से लगभग 100 किमी दूर गौरिहार जनपद के अंतर्गत ठकुर्रा गांव में देवी मां का एक ऐसा मंदिर है, जिसकी स्थापना खुद वीर योद्धा आल्हा ने की थी. इतिहासकार बताते हैं कि इस मंदिर के पास में ही आल्हा-ऊदल का किला था, जहां आल्हा रहते थे. लोक मान्यता के अनुसार, यहां आज भी लोग आल्हा मां के दर्शन करने आते हैं.

छतरपुर से लगभग 70 किमी दूर चंदला के बछौन गांव में स्थित 500 साल पुराना कालका माई का मंदिर धार्मिक आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र है. यह मंदिर 500 साल से भी पुराना है. लोकमान्यता के अनुसार, इस मंदिर की खोज कुशवाहा समाज के एक चरवाहे द्वारा की गई थी. इस मंदिर की पूजा-अर्चना कुशवाहा समाज द्वारा ही की जाती है.

छतरपुर जिले के बारीगढ़ से लगभग तीन किमी दूर मां धंधागीरि मंदिर स्थित है. इस मंदिर के बारे में मान्यता यह है कि इस मंदिर में खुद माता चलकर आई थीं. इसी मंदिर में चंदेल राजाओं के सेनापति आल्हा और ऊदल भी आते थे.

छतरपुर जिले के गौरिहार जनपद के बदौराकलां गांव में मां देवी का एक ऐसा प्राचीन मंदिर है, जहां श्रद्धालुओं की भीड़ 12 महीने लगी रहती है. मां देवी का यह मंदिर देवी के 52 शक्तिपीठों में से एक है. यहां मां को भद्रकाली नाम से जाना जाता है. इस मंदिर का संबंध राजा कर्ण से भी जुड़ा है. पुजारी शिव नारायण शर्मा ने लोकल 18 से कहा कि मां के इस मंदिर का संबंध देवी के 52 शक्तिपीठों से है. आज इस धार्मिक स्थान को मां भद्रकाली नाम से जाना जाता है.



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