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Zimbabwe Tatenda Taibu left cricket to become pastor: सिर्फ 21 साल की उम्र में टेस्ट कप्तान बनने वाले जिम्बाब्वे के तदेंदा तायबू ने ईश्वर की सेवा के लिए अपने करियर के सबसे अहम मोड़ पर संन्यास का ऐलान कर दिया था. तायबू ने जब क्रिकेट से संन्यास लिया था उनकी उम्र सिर्फ 29 साल की थी.
तदेंदा तायबू ने 29 साल की उम्र में लिया था संन्यास
नई दिल्ली: क्रिकेट इतिहास में कई ऐसे क्रिकेटर हुए जिनकी शुरुआत तो जबरदस्त हुई थी, लेकिन करियर का अंत ऐसा हुआ कि वह आज गुमनामी में अपना जीवन जी रहे हैं. ऐसा ही जिम्बाब्वे के एक क्रिकेटर तदेंदा तायबू हैं, जो साल 2004 में दुनिया के सबसे युवा टेस्ट कप्तान बनने का रिकॉर्ड अपने नाम किया था, लेकिन ईश्वर की भक्ति में वह ऐसा लीन हुए कि उन्होंने सिर्फ 29 साल की उम्र में क्रिकेट को अलविदा कह दिया.
बता दें कि तायबू का जिम्बाब्वे क्रिकेट में उदय किसी चमत्कार से कम नहीं था. साल 2004 में जब जिम्बाब्वे क्रिकेट आंतरिक विवादों और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा था तब महज 21 साल और 2 दिन की उम्र में उन्हें टेस्ट टीम की कप्तानी सौंपी गई थी. उन्होंने नवाब पटौदी का दशकों पुराना रिकॉर्ड तोड़कर इतिहास के सबसे युवा टेस्ट कप्तान बनने का गौरव हासिल भी किया था. हालांकि, आगे चलकर अफगानिस्तान के राशिद खान ने उनके रिकॉर्ड तोड़ा.
सुरक्षा कराणों से छोड़ दिया था देश
एक छोटे कद के विकेटकीपर-बल्लेबाज होने के बावजूद उनकी तकनीक और फुर्ती लाजवाब थी. 2005 में बांग्लादेश के खिलाफ उनकी कप्तानी में मिली पहली टेस्ट जीत ने उन्हें रातों-रात जिम्बाब्वे क्रिकेट का हीरो बना दिया था. हालाकि, सफलता की यह राह कांटों भरी थी. क्रिकेट बोर्ड के साथ बढ़ते मतभेदों और सुरक्षा कारणों से उन्हें 2005 में कप्तानी छोड़नी पड़ी और देश से पलायन करना पड़ा.
तायबू ने कुछ समय नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका में बिताया, लेकिन खेल के प्रति उनका जुनून उन्हें 2007 में फिर से जिम्बाब्वे की राष्ट्रीय टीम में वापस ले आया. वापसी के बाद भी वे टीम के मुख्य स्तंभ बने रहे और कई जुझारू पारियां खेलीं. साल 2012 में जब तायबू अपने करियर के शिखर पर थे और उनकी उम्र केवल 29 साल थी, उन्होंने पूरी दुनिया को स्तब्ध कर दिया. उन्होंने अचानक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास की घोषणा कर दी.
ईसाई धर्म की सेवा के लिए तायबू बन गए पादरी
जिस उम्र में खिलाड़ी अपने करियर के सबसे सुनहरे दौर में होते हैं, तायबू ने उस चमक-धमक को छोड़ने का फैसला किया क्योंकि उनका बुलावा कहीं और से आया था. उन्होंने बड़ी सादगी से स्पष्ट किया कि अब उनका जीवन क्रिकेट के मैदान के लिए नहीं, बल्कि पूरी तरह से ईश्वर की सेवा के लिए समर्पित है. तायबू ने अपने एक बयान में कहा था कि उन्हें महसूस हुआ कि वे जिस भगवान की सेवा करना चाहते हैं, उसके लिए उन्हें अपना पूरा समय देना होगा और क्रिकेट अब उनके जीवन की प्राथमिकता नहीं रही.
संन्यास के बाद वे पूरी तरह से ईसाई धर्म और चर्च की गतिविधियों में लीन हो गए. उन्होंने धन-दौलत और शोहरत के ग्लैमर को पीछे छोड़ते हुए एक पादरी के रूप में ईश्वर के संदेश को फैलाने का मार्ग चुना. उनके लिए सफलता की परिभाषा बदल चुकी थी. अब यह मैदान पर बनाए गए शतकों से नहीं, बल्कि आध्यात्मिक शांति और दूसरों के जीवन में बदलाव लाने से मापी जाने लगी.
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अक्टूबर 2025 से नेटवर्क 18 समूह में चीफ सब एडिटर के पद पर कार्यरत. पत्रकारिता में 9 साल का अनुभव. एबीपी न्यूज डिजिटल में स्पोर्ट्स बीट से करियर की शुरुआत। इंडिया टीवी और नवभारत टाइम्स ग्रुप जैसे प्रतिष्ठित संस्…और पढ़ें