UPSC टॉपर की 8वीं पास मां बोलीं–हारिये न हिम्मत: बेटी 3 बार फेल, लेकिन मां हारी नहीं, बीमा एजेंट पति–पत्नी का नेत्रहीन बेटा IAS बना – Madhya Pradesh News

UPSC टॉपर की 8वीं पास मां बोलीं–हारिये न हिम्मत:  बेटी 3 बार फेल, लेकिन मां हारी नहीं, बीमा एजेंट पति–पत्नी का नेत्रहीन बेटा IAS बना – Madhya Pradesh News




शुरुआत में बिलकुल पता नहीं था कि हमारी बेटी कौन-सी परीक्षा की तैयारी कर रही है। हमने उससे बस इतना ही कहा कि भगवान पर भरोसा रखो और पूरी लगन से तैयारी करो। इस दौरान बेटी कई बार फेल हुई। हमने कभी उसका हौसला टूटने नहीं दिया। मैं बस यही कहती थी, ‘हारिए न हिम्मत, बिसारिए न राम। यूपीएससी में 260वीं रैंक हासिल करने वाली प्राची चौहान की मां साधना चौहान जब ये कहती हैं तो उनके चेहरे की चमक और बढ़ जाती है। कहती हैं कि हम तो सिर्फ 8वीं तक पढ़े हैं। पिता चंद्रभान भी बहुत नहीं पढ़े, मगर बेटियों को पढ़ाने में पीछे नहीं हटे। 23 मार्च को राज्य सरकार ने यूपीएससी में सिलेक्ट हुए प्रदेश की प्रतिभाओं का कुशाभाऊ ठाकरे सभागार में सम्मान समारोह रखा था। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने यहां यूपीएससी चयनित उम्मीदवारों का सम्मान किया। यादव ने उन्हें कहा कि हमें तो हर 5 साल में चुनाव की परीक्षा में बैठना पड़ा है, लेकिन आपका सिलेक्शन जिंदगी भर के लिए पक्का हो गया। भास्कर ने ऐसे चुनिंदा कैंडिडेट्स से बात की, जिनकी सफलता के लिए उनके माता-पिता ने कठिन तपस्या की। पढ़िए रिपोर्ट… कभी प्री में फेल तो कभी मेंस में, लेकिन हार नहीं मानी प्राची कहती हैं- ‘मेरी UPSC की यात्रा बिलकुल भी आसान नहीं रही। यह मेरा चौथा प्रयास था। इससे पहले तीन बार परीक्षा दी। कभी प्रीलिम्स में नहीं निकल पाई तो कभी मेंस में सिर्फ दो नंबर से रह गई। लगातार असफलताओं का सामना करना पड़ा, लेकिन हर असफलता ने कुछ नया सिखाया। आखिरकार इस पूरी यात्रा ने मुझे यही समझाया कि अगर आप ईमानदारी से मेहनत करते हैं तो सफलता जरूर मिलती है। मैंने 12वीं के बाद तय कर लिया था कि मुझे UPSC करना है। कॉलेज के साथ-साथ मैंने अपनी तैयारी शुरू कर दी थी। सबसे मुश्किल दौर तब आया, जब तीसरे प्रयास में मेरा मेंस क्लियर नहीं हुआ। लगातार असफलता मानसिक रूप से तोड़ देती है। उस समय खुद को संभालना। फिर से खड़ा होना… सबसे बड़ा संघर्ष था। एक और दबाव था समाज और रिश्तेदारों का। अकसर कहा जाता था- ‘अब शादी करा दो, चार बेटियां हैं, कब तक पढ़ाओगे।’ मां बोली- भरोसा था बेटी कुछ बड़ा करेगी प्राची बताती हैं- मेरे पापा को मुझ पर पूरा विश्वास था। उन्होंने साफ कहा- ‘तुम मेहनत करो। हमें भरोसा है, तुम जरूर सफल होगी।’ मेरी दादी ने भी यही कहा- जब तक मैं अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो जाती, मेरी शादी नहीं होगी। यही भरोसा और सपोर्ट मेरी सबसे बड़ी ताकत बना। इस वजह से मैं बिना किसी दबाव के अपनी तैयारी पर पूरा फोकस कर पाई।” प्राची की मां साधना चौहान कहती हैं कि जिस दिन बेटी का सिलेक्शन हुआ, उसने आकर कहा- ‘मम्मी, आपने सही कहा था। हिम्मत नहीं हारना चाहिए।’ मुझे गर्व है कि बेटी ने इतनी मेहनत के बाद यह मुकाम हासिल किया। मैं ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं हूं। मुझे भरोसा था कि बेटी कुछ बड़ा करेगी। मां बोली- मैंने ठान लिया था, उसे पैरों पर खड़ा करूंगी दूसरी कहानी है कि अक्षत बल्दवा की। बीमा एजेंट माता-पिता को अक्षत के जन्म के डेढ़ महीने बाद पता चला कि उसे रेटिनोब्लास्टोमा बीमारी है, यानी उसकी आंखों में रोशनी नहीं है। अक्षत की मां मीना बल्दवा कहती हैं कि उस दिन से ही मैंने ठान लिया था कि उसे जल्द से जल्द अपने पैरों पर खड़ा करना है। उसे किसी पर निर्भर नहीं रहने देना है। शुरुआत में हमने उसे एक साल तक सामान्य स्कूल में पढ़ाया। बाद में ब्रेल सीखने के लिए सेवा मंदिर स्कूल भेजा। वहां उसने पांचवीं तक पढ़ाई की। इसके बाद छठी से फिर सामान्य स्कूल में पढ़ाया। उसने 12वीं के बाद नेशनल लॉ स्कूल यूनिवर्सिटी, बेंगलुरू से BA LL.B. की पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई के दौरान ही उसका झुकाव सामाजिक विषयों की ओर बढ़ने लगा। जैसे सोशियोलॉजी, अखबार पढ़ना और किताबों में रुचि लेना। 10वीं के बाद से ही उसने साफ कह दिया था कि उसे UPSC करना है। मैंने भी कहा कि अगर यही करना है तो अभी से तैयारी शुरू करो। अखबार पढ़ो। समझ बढ़ाओ। धीरे-धीरे उसका इंटरेस्ट और मजबूत होता गया। ‘समाज से जो मिला, वो वापस लौटाना चाहता हूं’ अक्षत कहते हैं- मैं जिस ब्लाइंड कम्युनिटी से आता हूं। वहां ज्यादातर लोग ग्रुप-डी जैसी नौकरियों की ओर जाते हैं। मैंने सोचा कि मुझे भीड़ का हिस्सा नहीं बनना है। मुझे कुछ अलग करना है। देश की सबसे बड़ी परीक्षा देना है। खुद को साबित करना है। जब रिजल्ट आया, उस दिन मेरे माता-पिता की खुशी देखने लायक थी। यहां तक पहुंचने में मुझे जो भी समाज से सहयोग मिला है, उसे वापस समाज को लौटाना मेरी जिम्मेदारी है। मैं उसी दिशा में काम करना चाहता हूं, ताकि और लोगों को भी आगे बढ़ने का मौका मिले। जो आपके पास नहीं है, उसे स्वीकारना जरूरी अक्षत बताते हैं- अगर अपनी पूरी यात्रा की बात करूं तो मैंने एक चीज बहुत गहराई से सीखी है, जो आपके पास नहीं है, उसे स्वीकार करना बहुत जरूरी है। मेरी खुद की एक शारीरिक कमी है। मुझे दिखाई नहीं देता, अगर मैं इसे स्वीकार नहीं करता। आगे बढ़ने की कोशिश नहीं करता तो शायद मैं यहीं रुक जाता। आज की भाषा में कहें तो मूव ऑन करना बहुत जरूरी है, अगर आप एक ही जगह अटके रहेंगे तो आगे नहीं बढ़ पाएंगे। जहां तक आगे की जिम्मेदारियों की बात है तो मैं मानता हूं कि मेरी डिसेबिलिटी की वजह से मुझे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा, लेकिन यहां तक पहुंचने के लिए मैंने हर मुश्किल का कोई न कोई हल निकाला है। मुझे यह नहीं पता कि आगे कौन-कौन सी नई चुनौतियां आएंगी, लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि हर समस्या का समाधान होता है। मैं चुनौतियों से डरने वाला नहीं हूं। चौथे प्रयास में यूपीएससी क्लियर की अंकुश बताते हैं- मुझे 12वीं तक UPSC के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। जब मैं इंदौर ग्रेजुएशन के लिए गया, वहां प्रतियोगी माहौल मिला। पहली बार पता चला कि UPSC नाम की परीक्षा होती है। वहीं से मैंने तय किया कि मुझे इसी दिशा में आगे बढ़ना है। मेरी शुरुआती पढ़ाई गांव में हुई। आठवीं तक गांव में पढ़ा। फिर 9वीं, 10वीं और 12वीं तहसील स्तर पर पूरी की। मैंने पूरी पढ़ाई हिंदी मीडियम से की है। जहां तक प्रयासों की बात है। यह मेरा चौथा प्रयास था। इस बार रैंक उतनी अच्छी नहीं आई, इसलिए मैं फिर से कोशिश करूंगा, ताकि मुझे IAS के रूप में बेहतर अवसर मिले, अगर अपने लक्ष्य की बात करूं तो महिलाओं और किसानों से जुड़े मुद्दे मेरे लिए सबसे अहम हैं। महिलाओं के संदर्भ में सबसे बड़ी समस्या यह है कि उन्हें अकसर सपने देखने, उन्हें पूरा करने का अवसर नहीं मिलता। मेरा मानना है कि शिक्षा ही सबसे बड़ा माध्यम है, जो महिलाओं को सशक्त बना सकती है, उन्हें अपने सपनों तक पहुंचने का रास्ता देती है। वहीं किसानों के मुद्दों पर बहुत बातें होती हैं, लेकिन जमीनी स्तर की समस्याओं को कम लोग समझते हैं। कुल 958 चयनित उम्मीदवारों में से 61 अभ्यर्थी मप्र के संघ लोकसेवा आयोग (यूपीएससी) के ताजा नतीजों में मध्यप्रदेश ने अब तक का सबसे बेहतर प्रदर्शन किया है। इस बार कुल 958 चयनित उम्मीदवारों में से 61 अभ्यर्थी मप्र के हैं, जो राज्य के लिए ऑल टाइम हाई है। खास बात यह है कि इनमें 16 छात्र सरकारी कॉलेज और विश्वविद्यालयों से पढ़े हैं, जो चयन के ट्रेंड में बड़े बदलाव का संकेत देता है। तीन साल में मप्र का प्रदर्शन तेजी से सुधरा है। 2023 में जहां सिर्फ 29 चयन हुए थे, वहीं 2024 में संख्या 53, अब 61 तक पहुंच गई है। तीन साल में चयन लगभग दोगुना हो गया है। इस बार टॉप रैंकर्स में भी मप्र की मजबूत मौजूदगी रही। यूपी, बिहार और राजस्थान के बाद मप्र चौथा राज्य है, जहां से सबसे ज्यादा छात्रों का यूपीएससी में सिलेक्शन हुआ है।



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