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गर्मी के सीजन में लोग महुआ के पेड़ों की रखवाली करते हैं और सुबह चार बजे से ही महुआ बीनने की दौड़ शुरू हो जाती है. बाद में इन्हें बेचकर ग्रामीण अच्छी कमाई करते हैं, जिससे घर चलता है. इसी वजह से गर्मी के सीजन में इन पेड़ों को गरीबों का सोना कहते हैं. क्योंकि इससे होने वाली चंद दिन की कमाई पूरे साल का सहारा बनती है.
Mahua: गर्मी शुरू होते ही गांवों में महुआ के पेड़ों के नीचे अलग ही हलचल दिखाई देने लगती है. शिवपुरी जिले के ग्रामीण इलाकों में महुआ को यूं ही ‘गरीबों का सोना’ नहीं कहा जाता है. कई परिवार रात में चटाई बिछाकर पेड़ों के नीचे डेरा डाल लेते हैं. इसकी वजह साफ है कि पेड़ से गिरने वाला हर फूल उनकी सालभर की कमाई से जुड़ा होता है. जानवरों से बचाने और कोई दूसरा न उठा ले जाए, इसके लिए लोग पूरी रात पहरा देते हैं.
सुबह होते-होते टोकरियां भरनी शुरू हो जाती हैं. यही महुआ बाद में सुखाकर बेचा जाता है, जिससे घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी होती हैं. खाने-पीने, देसी दवा, पशुचारे और कई घरेलू कामों में इसका उपयोग होता है. ग्रामीणों के लिए यह सिर्फ एक पेड़ नहीं, बल्कि जीवन का मजबूत सहारा है.
सुबह 4 बजे से शुरू होती है महुआ बीनने की दौड़
महुआ की रखवाली करने वाले ग्रामीण सुबह करीब 4 बजे ही पेड़ के नीचे पहुंच जाते हैं. बताया जाता है कि इसी समय से महुआ के फूल तेजी से गिरने लगते हैं. अगर देर हो जाए तो जानवर या अन्य लोग इसे उठा ले जाते हैं. इसलिए अंधेरे में ही टोकरी लेकर लोग पहुंच जाते हैं. सुबह 11 से 12 बजे तक महुआ गिरता रहता है और लोग लगातार बीनते रहते हैं. यह रोज का नियम बन जाता है.
महुआ है आमदनी का जरिया
महुआ की खास बात यह है कि इसे लगाने की जरूरत नहीं पड़ती है. यह अपने आप उग आता है. बिना किसी खर्च के यह ग्रामीणों को आमदनी देता है. इससे कई तरह की चीजें बनाई जाती हैं, जिन्हें गांवों में खूब पसंद किया जाता है और फायदेमंद भी माना जाता है. यही वजह है कि महुआ ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है.