इंदौर का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल एमवाय सड़क हादसों में ‘बीमा क्लेम’ की बंदरबांट का अड्डा बन गया है। भास्कर के 3 रिपोर्टर्स ने यहां 7 दिन तक पड़ताल की तो सामने आया कि हादसे की खबर मिलते ही पुलिस, दलाल, एम्बुलेंस और कुछ निजी अस्पतालों का संगठित नेटवर्क शुरू हो जाता है। बीमा क्लेम दिलाने के नाम पर ये 15% से 25% तक कमीशन लेते हैं। गंभीर हालत में लाए गए या मृत मरीजों की जानकारी अस्पताल परिसर से ही बाहर पहुंचती है। इसके बाद दलाल परिजनों तक पहुंचकर बीमा क्लेम दिलाने की बात करते हैं। एक बार बात तय हो जाए तो मामला पुलिस चौकी के जरिए कागजी प्रक्रिया में जाता है और फिर आगे की प्रक्रिया होती है। सरकारी अस्पताल से निजी अस्पतालों तक मरीज भेजने का भी तय सिस्टम है। लामा के जरिए मरीज शिफ्ट कराने पर अलग-अलग अस्पतालों में 12% से 25% तक कमीशन तय मिला। जो व्यक्ति सबसे पहले मरीज की सूचना देता है, वही उसे अपने केस के रूप में आगे बढ़ाता है। इसमें दलाल, एम्बुलेंस ड्राइवर और अस्पतालों के प्रतिनिधि शामिल रहते हैं। सिलसिलेवार पूरे नेटवर्क का खुलासा… सबसे पहले जहां से खेल शुरू होता है- एमवाय पुलिस चौकी: क्लेम एडवाइजर बनकर मिले रिपोर्टर एएसआई ने कहा- ज्ञात केस में गाड़ी लगवाने के 20, अज्ञात में 15% कमीशन… चौकी से ही पूरी कार्रवाई हो जाती है भास्कर टीम क्लेम एडवाइजर बनकर एमवायएच पुलिस चौकी पहुंची। यहां तैनात एएसआई नूरसिंह मौरे ने स्पष्ट कहा कि यहां ज्ञात और अज्ञात दोनों तरह के केस लिए जाते हैं। ज्ञात मामलों में 20% और अज्ञात मामलों में 15% हिस्सा तय है। रिपोर्टर: हम क्लेम एडवाइजर हैं… अज्ञात केस में गाड़ी लगवाते हैं। यहां क्या सिस्टम रहता है? एएसआई नूरसिंह मौरे : हमारे यहां ज्ञात-अज्ञात दोनों केस आते हैं। अज्ञात में आपको परिवार-वामिल देखना पड़ेगा। रिपोर्टर: जो भी प्रोसेस है, बता दीजिए। एएसआई: यहां कमीशन पर काम होता है… कागजी प्रक्रिया पूरी होने के बाद आपसे संपर्क करा देंगे। रिपोर्टर: कितना रहता है हिस्सा? एएसआई: ज्ञात में 20, अज्ञात में 15 फीसदी। रिपोर्टर: और कहीं बात करनी पड़ेगी? एएसआई: नहीं, चौकी से ही सब हो जाता है। पूरी कार्रवाई यहीं से चलती है। रिपोर्टर: आप ड्यूटी पर नहीं रहे तो? एएसआई: उसकी चिंता मत करो। यहां दो शिफ्ट में स्टाफ रहता है, टीमवर्क में काम होता है। रिपोर्टर: इसमें और कौन-कौन रहेगा? एएसआई: चौकी प्रभारी, ड्यूटी इंचार्ज, ऑपरेटर, पूरा स्टाफ कवर हो जाएगा। निजी अस्पताल: लामा के जरियेे यहां मरीज शिफ्ट करने पर कमीशन तय लामा (लीव अगेंस्ट मेडिकल एडवाइस) के जरिए मरीजों को निजी अस्पताल ले जाने के मामलों में 12% से 25% तक कमीशन तय है। अब तीन हॉस्पिटल का नेटवर्क समझिए… 1. एवीपी हॉस्पिटल, भंवरकुआं रोड, इंदौर रिपोर्टर: हम क्लेम के केस देखते हैं… लामा मरीज यहां लेते हैं क्या? नरेंद्र मिश्रा, सीईओ: हां… अगर पार्टी के पास क्लेम है तो जरूर लेते हैं… रिपोर्टर: हमें भी कुछ मिलेगा इसमें? मिश्रा: केस पर निर्भर करता है… आमतौर पर 12 से 15 प्रतिशत दे देते हैं…। रिपोर्टर: मरीज कैसे तय होता है? मिश्रा: जिसने पहले सूचना दी… मरीज उसी का।… 2. आनंद हॉस्पिटल, भंवरकुआं रोड रेफर केस में 20 से 25% कमीशन रिपोर्टर: लामा के मरीज यहां भी आते हैं? राहुल दुबे, पीआरओ टीम: हां… सभी केस लेते हैं…। रिपोर्टर: रेफर करवाने वालों का हिस्सा तय है? दुबे: हां… 20 से 25 प्रतिशत तक देते हैं… रिपोर्टर: कोई दिक्कत तो नहीं? दुबे: सावधानी रखना पड़ती है…। खुलकर बात नहीं कर सकते…। अस्पताल : 10 हजार रुपए में डिसेबिलिटी सर्टिफिकेट, कोर्ट में बयान देने हों तो 2 हजार रुपए, वीसी के जरिये 3 हजार लगेंगे क्लेम को मजबूत करने वाले दस्तावेज भी इस नेटवर्क का हिस्सा हैं। डिसेबिलिटी सर्टिफिकेट बनाने के लिए 10 हजार रुपए और कोर्ट में बयान देने का अलग चार्ज। 3. डॉ. सुरेंद्र बापट (सर्जन, बापट हॉस्पिटल):
भास्कर टीम क्लेम एडवाइजर बनकर पहुंची। पता चला कि अयोग्यता सर्टिफिकेट बनाने का भी रेट फिक्स है। रिपोर्टर: हमें अयोग्यता का सर्टिफिकेट बनवाना हैं, मामला खरगोन जिले का है? डॉ. बापट: एक बार में पेशेंट को चेक करूंगा, फिर बता सकता हूं। रिपोर्टर: क्या डाक्यूमेंट चाहिए और प्रोसीजर क्या रहेगा? डॉ. बापट: एफआईआर की कॉपी में पेशंट का नाम और मेडिकल डाक्यूमेंट। रिपोर्टर: व्यक्ति गरीब है, प्रतिशत बढ़ सकता है क्या? डॉ. बापट: यह मैं पेशेंट देखने के बाद ही बता सकता हूं। इसका चार्ज 10 हजार रुपए है। इंदौर कोर्ट में बयान होंगे तो उसके 2 हजार रुपए लगेंगे। वीडियो कांफ्रेसिंग होगी तो 3 हजार रु. देने होंगे।
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