टेस्ट क्रिकेट की सबसे भयानक शुरुआत, पहली गेंद फेंक दी थी पिच के बाहर

टेस्ट क्रिकेट की सबसे भयानक शुरुआत, पहली गेंद फेंक दी थी पिच के बाहर


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टेस्ट क्रिकेट की सबसे भयानक शुरुआत, पहली गेंद फेंक दी थी पिच के बाहर

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नवंबर 1991, ब्रिस्बेन का मैदान और सामने थे ऑस्ट्रेलिया के दिग्गज ओपनर मार्क टेलर. भारत के लिए एक नया युवा गेंदबाज अपना टेस्ट डेब्यू कर रहा था.  श्रीनाथ ने अपनी पहली ही गेंद इतनी तेजी और घबराहट में डाली कि वह पिच पर टप्पा खाने के बजाय सीधे पिच के बाहर जाकर गिरी. मैदान पर सन्नाटा पसर गया, फिर हंसी की लहर दौड़ गई

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भारतीय टेस्ट इतिहास में डेब्यू मैच में सबसे भयानक गेंद फेंकने वाले गेंदबाज थे जवागल श्रीनाथ

नई दिल्ली. भारत के महानतम तेज गेंदबाजों में से एक, जवागल श्रीनाथ की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है. वह एक ऐसे गेंदबाज थे जिन्होंने उस दौर में भारतीय तेज गेंदबाजी का बोझ अकेले अपने कंधों पर उठाया, जब स्पिनरों का दबदबा हुआ करता था.  ‘मैसूर एक्सप्रेस’ के नाम से मशहूर श्रीनाथ ने अपनी रफ्तार और बाउंस से दुनिया के दिग्गज बल्लेबाजों को खौफ में रखा.

एक डरावनी शुरुआत: जब पिच के बाहर गिरी पहली गेंद

नवंबर 1991, ब्रिस्बेन का मैदान और सामने थे ऑस्ट्रेलिया के दिग्गज ओपनर मार्क टेलर. भारत के लिए एक नया युवा गेंदबाज अपना टेस्ट डेब्यू कर रहा था.  श्रीनाथ ने अपनी पहली ही गेंद इतनी तेजी और घबराहट में डाली कि वह पिच पर टप्पा खाने के बजाय सीधे पिच के बाहर जाकर गिरी. मैदान पर सन्नाटा पसर गया, फिर हंसी की लहर दौड़ गई. मार्क टेलर हैरान थे और स्लिप में खड़े खिलाड़ी अपनी मुस्कान नहीं रोक पा रहे थे.  एक युवा गेंदबाज के लिए इससे बुरा सपना कुछ नहीं हो सकता था, लेकिन यह उस ‘तूफान’ के आने से पहले की खामोशी थी जो अगले एक दशक तक विश्व क्रिकेट में छाने वाला था.

भारतीय गेंदबाजी के ‘अकेले योद्धा’

90 के दशक में जब कपिल देव अपने करियर के ढलान पर थे, तब श्रीनाथ ने भारत के स्ट्राइक गेंदबाज की कमान संभाली. उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ 1996 में अहमदाबाद में 21 रन देकर 6 विकेट झटककर भारत को अविश्वसनीय जीत दिलाई थी. वह भारत के पहले ऐसे गेंदबाज थे जिन्होंने लगातार 150 किमी/घंटा की रफ्तार से गेंदबाजी करने की क्षमता दिखाई.

संन्यास से वापसी और 2003 वर्ल्ड कप का ‘मैजिक’

साल 2002 में श्रीनाथ ने टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कह दिया था और वह सीमित ओवरों के खेल से भी दूर होने का मन बना चुके थे लेकिन तत्कालीन कप्तान सौरव गांगुली जानते थे कि दक्षिण अफ्रीका की तेज पिचों पर श्रीनाथ के अनुभव के बिना विश्व कप जीतना नामुमकिन है.  गांगुली के बार-बार अनुरोध करने पर श्रीनाथ ने अपना फैसला बदला और 2003 वर्ल्ड कप खेलने का निर्णय लिया.  उस टूर्नामेंट में 33 साल के श्रीनाथ ने अपनी गेंदों से आग उगल दी.  उन्होंने पूरे वर्ल्ड कप में शानदार अनुशासन दिखाया और 16 विकेट चटकाए, जो उस टूर्नामेंट में जहीर खान के बाद किसी भी भारतीय द्वारा लिए गए सबसे ज्यादा विकेट थे.  उन्होंने नामीबिया के खिलाफ मैच में केवल 30 रन देकर 4 विकेट लिए और भारत को फाइनल तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई.

विरासत और नया सफर

जवागल श्रीनाथ ने अपने करियर का अंत 315 वनडे और 236 टेस्ट विकेटों के साथ किया. रिटायरमेंट के बाद उन्होंने खेल को नहीं छोड़ा और आज वह आईसीसी के सबसे सम्मानित मैच रेफरी में से एक हैं. ब्रिस्बेन की उस पहली ‘पिच से बाहर’ वाली गेंद से लेकर विश्व के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाजों के स्टंप उखाड़ने तक, श्रीनाथ का सफर भारतीय क्रिकेट के इतिहास में अटूट समर्पण और जीवटता की मिसाल है.



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