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बालाघाट पूरी तरह से नक्सल मुक्त हो चुका है, लेकिन लोगों के मन में पुराने दौर की यादें अभी भी ताजा हैं. कई लोग ये मानते हैं कि नक्सलवाद खत्म हो चुका है, लेकिन उसकी विचारधारा अभी भी बनी हुई है. अब इस मामले में पर लोकल 18 ने नक्सल प्रभावित इलाकों के लोगों से बातचीत की है. इस दौरान लोग अब लोग तेजी से विकास की मांग उठाते नजर आए.
31 मार्च वह तारीख है, जिसका ऐलान केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने नक्सलवाद के खात्मे के लिए किया था. अब वह डेडलाइन भी निकल चुकी है. ऐसे में इस तारीख से एक दिन पहले ही संसद में केंद्रीय गृहमंत्री ने ऐलान कर दिया कि अब देश नक्सल मुक्त हो चुका है. लेकिन बालाघाट में यह घड़ी तय डेडलाइन से चार महीने पहले ही आ गई. 12 दिसंबर 2025 को डीवीसीएम दीपक उर्फ सुधाकर उइके और एसीएम रोहित के सरेंडर के साथ बालाघाट ही नहीं पूरा मध्य प्रदेश नक्सल मुक्त हुआ. ऐसे में अब जब पूरा देश नक्सल मुक्त हो चुका है. तब लोकल 18 ने बालाघाट के नक्सल प्रभावित इलाकों के लोगों, नक्सल मामले और आदिवासी विषयों के एक्सपर्ट्स से बातचीत की, जानिए उनका अब क्या कहना है…
एक दौर डर का था अब वो भी खत्म
नक्सल मामलों के जानकार रफी अंसारी कहते हैं कि वह 1992 के समय से प्रभावित इलाकों में लगातार काम कर रहे है. उनका कहना है कि पहले के समय न सड़कें थी और दूसरी सुविधाएं भी नहीं थी. उस समय जाते थे तो अक्सर बाइक के टायर पंचर हो जाते थे. तब विकास नहीं था और नक्सली अपनी पैठ जमा चुके थे. ऐसे में सुरक्षा बल ही नहीं लोग भी मुखबिर के शक में मारे गए. अब वह दौर भी खत्म हो चुका है. अब हालात बदले हैं सड़कें, बिजली और दूसरी बुनियादी सुविधाएं पहुंच रही हैं. लेकिन अब बहुत सा काम बाकी है. ऐसे में उस इलाकों में सरकारों को गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है.
अब सरकार को डेवलपमेंट पर ध्यान दें
आदिवासी समस्याओं पर लंबे समय से काम कर रहे यमलेश वंजारी से लोकल 18 ने बातचीत की. उनका कहना है कि सरकार ने डेडलाइन तय की और उस डेडलाइन में लक्ष्य को लगभग हासिल भी कर लिया. इसके लिए सरकार के साथ सुरक्षाबलों की और उनकी नीतियों की तारीफ होनी चाहिए. लेकिन जिस विचारधारा और जल, जंगल, जमीन की की बातों से प्रभावित क्षेत्रों के लोगों को जोड़ा था उस पर भी सरकार को ध्यान देना चाहिए. गुजरात के डांग जिले से लेकर पश्चिम बंगाल तक आदिवासी है. जो खुद को स्वदेशी लोग मानते हैं. उनके मन में कई तरह के विरोध की चिंगारी फूटती है. ऐसे में सरकार को इससे निपटने के लिए चिंतन मनन करना चाहिए. वहीं, उनके जीवन को बेहतर बनाने के लिए सरकार क्या नीति बनाती है? ये देखने की बात है.
सशस्त्र तो खत्म हुआ लिए विचारधारा का क्या
हर जगह एक कथन सुनने के लिए मिलता है कि सशस्त्र माओवाद खत्म हुआ है, लेकिन विचारधारा का क्या. इस पर नक्सल मामलों के जानकार रफी अंसारी कहते हैं कि ये विचारधारा है क्या पता? ये खत्म होगी या नहीं ये तो भविष्य बताएगा. क्रांति अत्याचार से निकलती है. ऐसे में अत्याचार बंद होना चाहिए.
वहीं, यमलेश कहते हैं कि जिन मामलों को लेकर नक्सली जनता के बीच गए और वहीं मामले अब जनता के जहन में उतर गए. फिलहाल नक्सलवाद सशस्त्र तौर पर खत्म हुआ, लेकिन वैचारिक रूप में अब मौजूद है. ऐसे में सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए. अगर नजरअंदाज करते हैं, तो आगे के बारे स्पष्ट नहीं कह सकते हैं.
ग्रामीण बोले- अस्पताल और रोजगार की जरूरत
इस मामले में लोकल 18 नक्सल प्रभावित इलाकों के लोगों से बातचीत की. उनका कहना है कि नक्सलवाद तो खत्म हुआ लेकिन पुलिस चौकियां क्यों खुल रही है? ऐसे में ग्रामीण कहते है कि अच्छा है ये खुल रही है लेकिन अस्पताल क्यों नहीं खुलता है. समय पर एंबुलेंस नहीं आती. इलाके में डॉक्टर नहीं है. सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए. वहीं, दूसरे ग्रामीण का ये कहना है कि सरकार ने इस इलाके में माइनिंग तो की, लेकिन स्थानीय लोगों को रोजगार नहीं दिया. यहां एक माइनिंग उकवा में है तो दूसरी भरवेली में. दोनों में बाहर से मजदूर मंगाए जाते हैं लेकिन स्थानीय लोगों को रोजगार नहीं देते हैं.