ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध का असर अब एमपी के फॉर्मा उद्योग पर पड़ने लगा है। प्रदेश की 100 फॉर्मा कंपनियों का एक्सपोर्ट जीरो हो गया है। एमपी की फॉर्मा कंपनियों का एक्सपोर्ट 190 देशों में होता है। यहां से यूएई, सऊदी अरब और ओमान जैसे देशों में सबसे ज्यादा सस्ती दवाइयों का एक्सपोर्ट किया जाता है। लेकिन कंटेनर भाड़े और इंश्यूरेंस महंगा होने के कारण फॉर्मा का एक्सपोर्ट पूरी तहर से ठप हो गया है। करोड़ों रुपए का तैयार माल गोदाम व पोर्ट पर अटका हुआ है। यहां के दवा उद्योगों का कहना है कि हम निर्यात करना चाहते हैं, लेकिन न तो कंटेनर मिल रहे और न ही माल की बुकिंग हो रही है। वहीं एक्सपोर्टरों का कहना है कि रेड सी और होर्मुज जैसे प्रमुख समुद्री मार्गों में अस्थिरता के कारण कोई भी शिपिंग कंपनी रिस्क नहीं लेना चाहती। पहले वे 3 कारण जानिए जिससे एमपी फॉर्मा का एक्सपोर्ट पूरी तरह से ठप हुए … 1. वेसल नहीं मिल रहे, शिपिंग कंपनी ने अपने वेसल डाउन कर दिए है, कंपिनयों ने अपने वेसल को युद्ध के हाई रिस्क को देखते हुए समुद्र में उतारने से मना का दिया है। 2. कंटेनर का भाड़ा 40 परसेंट तक बढ़ गया है। उदाहरण के लिए युद्ध के पहले भारत से अफ्रीका जाने वाले 40 फीट के कंटेनर का भाड़ा 3 से 3.5 लाख रूपए था वह भाड़ा बढ़कर अब 4.25 लाख से लेकर 4.50 लाख रुपए तक हो गया है। 3. कुछ शिपिंग कंपनियां अपने वेसल को भेजने के लिए रिस्क भी ले रही हैं तो कंटेनर की उपलब्ध नहीं है। इसके साथ ही इंश्यूरेंस इतना महंगा हो गया है कि लॉजिस्टिक कॉस्ट प्रोडक्शन कॉस्ट से महंगी हो रही है। कंपनियों ने प्रोडक्शन शिफ्ट में कटौती की इंडियन ड्रग्स मैन्यूफैक्चरिंग एसोसिएशन मप्र के सचिव डॉ. अनिल सबरवाल ने बताया कि एमपी की लगभग 100 फॉर्मा कंपनियों का एक्सपोर्ट जीरो हो गया है। हमारा एक्सपोर्ट पूरी तरह से रुक गया है। जिसके कारण फॉर्मा इंडस्ट्री इस समय काफी दबाव में हैं, क्योंकि उनके पास जो भी एक्सपोर्ट का मटेरियल बना हुआ है वह होल्ड पर चला गया है। कंपनियों को क्लीयरेंस और बैंकिंग में परेशानी आ रही है। सबसे बड़ी परेशानी रेडी स्टॉक को रखने और ऑर्डर को एग्जीक्यूट करने में हो रही है। पैकिंग मटेरियल में 20 प्रतिशत तक की तेजी है। वहीं, पीवीसी के भाव भी 30 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं। पिछले दिनों अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ा ली है, लेकिन डिस्पैच रुक गए हैं और आगामी ऑर्डर रुक गए हैं। लेकिन अब हालात यह है कि फॉर्मा इंडस्टी शटडॉउन की तरफ बढ़ गई है। एमपी की जो फॉर्मा कंपनियां पहले तीन शिफ्ट में काम करती थी वह अब 1 शिफ्ट में ही काम कर रही है। वहीं फॉर्मा इंडस्ट्री सूत्रों की मानें तो आने वाले एक हफ्ते में यह प्रोडक्शन और कम हो जाएगा। बताया जा रहा है कि इंडस्ट्रियां आने वाले समय में हफ्ते में 5 दिन ही प्रोडक्शन शिफ्ट चलाएंगी। कंपनियों के एक्सपोर्ट कमिटमेंट पूरे नहीं हो रहे पीथमपुर औद्योगिक संगठन के अध्यक्ष डॉ. गौतम कोठारी ने बताया कि एमपी की फॉर्मा कंपिनयों के पास पर्याप्त ऑर्डर है, लेकिन कंटेनर नहीं मिलने के कारण वह अपने एक्सपोर्ट कमिटमेंट पूरे नहीं कर पा रही है। इंडस्ट्री की एकस्पोर्ट ट्रांसपोर्ट कॉस्ट दो से चार गुना तक बढ़ गई है। जबकि एक्सपोर्ट कमिटमेंट में प्राइस का सेटलमेंट पहले से फिक्स होता है, इसके कारण कई कंपनियों को निर्यात में भी घाटा उठाना पड़ेगा। माल की लागत 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ गई है। पीथमपुर के फार्मा सेक्टर व एसईजेड की केमिकल इंडस्ट्री को भी काफी परेशानी आ रही है। यही नहीं, स्टील कंपनियों, जो कि माल निर्यात करते हैं, उनको भी लागत बढ़ने से परेशानी आ रही है। इन्वेंटरी संकट और अंतरराष्ट्रीय बाजार पर प्रभाव फॉर्मा इंडस्ट्री बहुत ज्यादा तैयार स्टॉक नहीं रखतीं। फॉर्मा इंडस्ट्री के प्रतिनिधियों ने कहा कि ‘जस्ट-इन-टाइम’ इन्वेंटरी सिस्टम के कारण बहुत कम स्टॉक रखती हैं। यदि युद्ध 10-15 दिनों तक और चला तो आवश्यक दवाओं की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। यूएई, सऊदी अरब और ओमान जैसे देश सस्ती दवाइयों के लिए भारत पर काफी निर्भर हैं, इसलिए इस स्थिति का असर अंतरराष्ट्रीय बाजार पर भी पड़ सकता है। कुल मिलाकर बढ़ती कच्चे माल की कीमतें, शिपिंग समस्याएं और नियंत्रित दवा कीमतें फार्मा उद्योग पर भारी दबाव डाल रही हैं। बल्क में ड्रग और पेट्रोकेमिकल की आवक ठप इंदौर एक प्रमुख औद्योगिक शहर है। यहां के पीथमपुर, सांवेर रोड और पालदा में 5600 से ज्यादा उद्योग हैं। इनमें फार्मा, केमिकल, मेटल और प्लास्टिक उद्योग कच्चे माल के लिए लगभग 60 फीसदी मिडिल ईस्ट पर निर्भर हैं। युद्ध के चलते बहरीन, कतर और सऊदी अरब से बल्क ड्रग, पेट्रोकेमिकल और अन्य इनपुट की सप्लाई प्रभावित हुई है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में दिक्कत के कारण चीन और यूरोप से आयात भी प्रभावित है। तैयार माल के निर्यात में भी मुश्किल आ रही है। कंटेनर एक्सपोर्ट का खर्च 4 गुना तक बढ़ गया है। मौजूदा हालात में ऑर्डर भेजने में परेशानी उद्योग संगठनों के अनुसार इंदौर से प्रदेश का 40–50% एक्सपोर्ट होता है। हर महीने 80 हजार से अधिक कंटेनर कांडला और जेएनपीटी भेजे जाते हैं। वर्तमान में मिडिल ईस्ट, अफ्रीका और यूरोप से फार्मा, सोया और फूड प्रोसेसिंग के बड़े ऑर्डर हैं, लेकिन उन्हें भेजने में दिक्कत आ रही है। कंटेनर भाड़ा बढ़ गया है और इंश्योरेंस मिलना भी मुश्किल हो गया है। समुद्री और हवाई हमलों के खतरे के कारण कंपनियां बीमा देने से बच रही हैं। एयर कार्गो की क्षमता भी सीमित है। वहीं कंटेनर की एक कमी का कारण चायना से कंटेनर की आवक कम होना भी है। अधिकांश कंटेनर चायना से भारत आते है फिर भारत से अन्य देशों के लिए रवाना होते है। लेकिन चायना से इस समय कंटेनर की आवक ना के बराबर हो गई है इसका प्रमुख कारण यह है कि पहले जो कंटेनर चायना से 1 से 1.5 लाख में आता था वह अब 3 लाख तक में आ रहा है। इसलिए कंपनियों से कंटेनर होल्ड कर दिए है।
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