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Agriculture News: किसान अब पारंपरिक तरीकों के साथ आधुनिक तकनीकों का भी इस्तेमाल कर रहे हैं. ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग टेक्निक से न सिर्फ पानी की बचत हो रही है बल्कि खरबूज की फसल की गुणवत्ता और मिठास भी बढ़ रही है.
सतना. मध्य प्रदेश के सतना जिले का बकिया बंधा डैम क्षेत्र दशकों से खरबूज उत्पादन का बड़ा केंद्र रहा है. जो कभी सिर्फ जलाशय के रूप में जाना जाता था, वही इलाका हर गर्मियों में खरबूज हब बनकर सामने आता है. यहां उगने वाले मीठे और गुणवत्तापूर्ण खरबूजे न सिर्फ विंध्य क्षेत्र बल्कि मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में अपनी खास पहचान बना चुके हैं. डैम के किनारे की उपजाऊ मिट्टी और नमी से भरपूर वातावरण इस फसल के लिए बेहद अनुकूल साबित हो रहा है, जिससे किसानों को बेहतर उत्पादन और मुनाफा दोनों मिल रहे हैं. बकिया बंधा डैम के आसपास की जमीन साल में करीब 6 महीने खेती के लिए उपलब्ध रहती है और बाकी समय यह पूरा क्षेत्र पानी में डूबा रहता है. यही कारण है कि यहां के किसान सीमित समय में अधिक उत्पादन लेने पर फोकस करते हैं. लगभग 5000 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले इस इलाके में 1000 से अधिक किसान मौसमी खेती कर रहे हैं. कंदवा, भोलवार, गोलहटा और बकिया जैसे आसपास के गांवों के किसान यहां आकर खरबूज और तरबूज की खेती करते हैं.
स्थानीय किसान दिनेश लोकल 18 को बताते हैं कि पहले यहां लौकी, खीरा और अन्य सब्जियों की खेती होती थी लेकिन समय के साथ खरबूजे की मांग तेजी से बढ़ी. अब यहां के खरबूजे रीवा, सतना, सेमरिया सहित कई क्षेत्रों के व्यापारी तो खुद खेतों तक पहुंचकर माल खरीदते हैं. लोकल 18 से बातचीत में किसान दुर्गेश कुमार सेन ने बताया कि उनकी फसल दूरदराज तक जाती है और अच्छी गुणवत्ता के कारण बाजार में इसकी खास डिमांड रहती है.
विभिन्न किस्मों से मिल रहा बेहतर उत्पादन
इस क्षेत्र में खरबूज की मधुराजा, निर्मल, सफेदा, अलीशा और जिंटेक्स जैसी पारंपरिक किस्मों के साथ-साथ अप्रैल की गर्मी में बॉबी, कुंदन, नवल और वीएनआर जैसी हाइब्रिड किस्मों की भी खेती की जा रही है. मधुराजा किस्म सबसे ज्यादा पसंद की जाती है और इसका बाजार भाव भी अधिक रहता है जबकि अलीशा अपेक्षाकृत सस्ती होती है. ये फसलें 70 से 100 दिनों के भीतर तैयार हो जाती हैं, जिससे किसानों को कम समय में बेहतर रिटर्न मिलता है.
कम लागत में लाखों का मुनाफा
खरबूजे की खेती में लागत भी अपेक्षाकृत कम आती है. एक एकड़ में लगभग 15 से 20 हजार रुपये का खर्च आता है जबकि उत्पादन 100 से 150 क्विंटल तक हो सकता है. यदि बाजार में 15 से 20 रुपये प्रति किलो का भाव मिल जाए, तो किसान प्रति एकड़ 1.5 से 2.5 लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा कमा सकते हैं. यही वजह है कि यह खेती अब किसानों के लिए आय का मजबूत साधन बनती जा रही है.
तकनीक से गुणवत्ता और मिठास
किसान अब पारंपरिक तरीकों के साथ-साथ आधुनिक तकनीकों को भी अपना रहे हैं. ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग तकनीक के उपयोग से न सिर्फ पानी की बचत हो रही है बल्कि फसल की गुणवत्ता और मिठास भी बढ़ रही है. इससे बाजार में बेहतर दाम मिलने की संभावना भी बढ़ जाती है. स्थानीय किसानों के अनुसार, साल 1980 में जब डैम निर्माण के दौरान गांवों का पुनर्वास किया गया था, तब से यहां की जमीन पर खेती शुरू हुई. शुरुआत में सीमित स्तर पर खेती होती थी लेकिन धीरे-धीरे यह क्षेत्र खरबूजे के उत्पादन का बड़ा केंद्र बन गया. आज यह इलाका न सिर्फ स्थानीय किसानों को रोजगार दे रहा है बल्कि क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान कर रहा है. इस तरह बकिया बंधा डैम अब सिर्फ पानी का स्रोत नहीं बल्कि किसानों के लिए कमाई का सबसे बड़ा जरिया बन चुका है.
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राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.