काले और लाल मुंह के बंदरों में क्या अंतर? आप नहीं जानते होंगे ये रोचक बातें; जानें फैक्ट्स

काले और लाल मुंह के बंदरों में क्या अंतर? आप नहीं जानते होंगे ये रोचक बातें; जानें फैक्ट्स


पिछले कुछ समय से मंदिरों के पास सड़कों पर बंदरों की तादाद बढ़ती जा रही है. लेकिन बंदरों को लेकर चौंकाने वाला अध्ययन सामने आया है, जिसमें कहा जा रहा है कि बंदरों की संख्या में 60% से भी अधिक की कमी आ गई है. जैसे-जैसे जंगलों का विनाश हो रहा है, बंदरों का ग्राफ गिरता जा रहा है. जबकि यह इकोसिस्टम का हिस्सा हैं और इन्हें जंगलों का गार्ड भी कहा जाता है. यह बहुत इंटेलिजेंट होते हैं. आज हम इन लाल मुंह और काले मुंह वाले बंदर के बारे में कुछ रोचक बातें जानेंगे.

लोकल 18 की टीम ने सतना पीजी कॉलेज के प्रोफेसर और बंदरों के व्यावहारिक जीवन पर पीएचडी करने वाले डॉक्टर शिवेश प्रताप सिंह से बात की, जो सागर यूनिवर्सिटी में आयोजित एक सेमिनार में शामिल होने के लिए आए थे. यह पिछले 23 सालों से बंदरों के ऊपर काम कर रहे हैं, जिनमें उन्हें कुछ चौंकाने वाली जानकारियां मिली.

मुख्य रूप से बंदरों की होती हैं दो प्रजाति
डॉक्टर शिवेश प्रताप सिंह बताते हैं कि बंदरों की प्रमुख रूप से दो प्रजाति होती हैं. जिसमें एक लाल मुंह वाले बंदर होते हैं, जिनको हनुमान लंगूर कहा जाता है और दूसरे काले मुंह के बंदर होते हैं, जिनको मकाक कहते हैं. इनमें काले मुंह वाले बंदरों को पेड़ों पर रहना अच्छा लगता है और लाल मुंह वाले जमीन पर रहना पसंद करते हैं. इसलिए जब यह दोनों समूह आपस में मिलते भी हैं तो इनमें कभी संघर्ष नहीं होता.

इन बंदरों के व्यावहारिक जीवन के अध्ययन में यह भी पाया गया कि जब कोई बंदर उम्र दराज हो जाता है या किसी कारणवश विकलांग हो जाता है या उनकी पूंछ को कोई नुकसान होता है, तो बंदरों का ग्रुप उस बंदर को अलग कर देता है. ऐसा हमने अक्सर देखा है कि कहीं-कहीं पर केवल एक बंदर रहता है जिसका या तो हाथ पैर टूटा होगा या पूंछ में कोई प्रॉब्लम होगी.

जंगल में रहने वाले बंदर होते हैं काफी हष्ट-पुष्ट
जो बंदर आज भी जंगलों में रहते हैं. वह जंगलों में पाए जाने वाली पेड़ों की पत्ती, तना, जड़, फल और गोंद खाते हैं. वह औषधीय होती है, जिनका उपयोग आयुर्वेद में इंसानों के लिए किया जाता है. फीमेल बंदर जब प्रेग्नेंट होती है तो उस समय वह अलग-अलग तरह के पेड़ों का गोंद खाती है, जिनमें धावन का गोंद इन्हें सबसे अधिक प्रिय होता है. जंगलों के अंदर रहने वाले बंदर ज्यादा हष्ट पुष्ट होते हैं और उन्हें किसी तरह की बीमारी होने की संभावना कम रहती है.

जंगल में जब कोई बड़ा जीव शेर भेड़िया या अन्य मांसाहारी किसी शाकाहारी प्राणी हिरण चीतल का शिकार करता है. उसको मारता है तो इस दौरान कई मुंह के बंदर पेड़ों पर चढ़कर उसकी डोलियों को जोर-जोर से हिलाते हैं, जिससे दूसरे प्राणी सतर्क हो जाते हैं. वही इन पेड़ों की जो पत्तियां गिरती हैं. वह दूसरे जीवन के भोज्य पदार्थ के रूप में काम आती है.

बंदरों को वनस्पतिक और फल
उन्होंने आगे बताया कि जो बंदर शहरों में आ जाते हैं और उन्हें इंसानों के द्वारा अलग-अलग तरह का रसायन युक्त भोज्य पदार्थ दिए जाते हैं. उसकी वजह से वह जल्दी रोगी हो जाते हैं और उनमें कुछ इस तरह की भी बीमारियां हो जाती हैं, जो पालतू जानवरों और इंसानों को भी संक्रमित कर देती हैं. इसलिए उन्हें खाना देने से बचना चाहिए जबकि वनस्पतिक फल या अन्य चीज देना चाहिए जो वह जंगल में खाते हैं.



Source link