देसी जुगाड़! न बिजली का झंझट और न ज्यादा खर्च, गर्मी में मिलेगी AC जैसी ठंडक

देसी जुगाड़! न बिजली का झंझट और न ज्यादा खर्च, गर्मी में मिलेगी AC जैसी ठंडक


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Shivpuri News: धनीराम ने कहा कि उन्होंने पहले भी इस तरह की झोपड़ी बनाई थी. उसमें गर्मी का असर बहुत कम महसूस हुआ था, इसलिए इस बार भी वह उसी पारंपरिक तरीके को अपनाकर अपने परिवार को भीषण गर्मी से राहत दिलाना चाहते हैं.

शिवपुरी. मध्य प्रदेश के शिवपुरी शहर में गर्मी के मौसम में जहां एक ओर लोग एसी और कूलर के सहारे राहत पाने की कोशिश करते हैं, वहीं शिवपुरी के ग्रामीण अंचल में गरीब लोग एक अनोखा और देसी समाधान अपनाते हैं. यहां के ग्रामीण धान की पराली (पुआल) से ऐसी झोपड़ी बनाते हैं, जो प्राकृतिक रूप से बेहद ठंडी रहती है. खास बात यह है कि इस झोपड़ी को बनाने में ज्यादा खर्च भी नहीं आता और यह पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल होती है. इस झोपड़ी की बनावट ही इसकी सबसे बड़ी खासियत है. पुआल से बनी दीवारें और छत गर्मी को अंदर आने से रोकती हैं. पुआल के बीच हवा के छोटे-छोटे रास्ते बने रहते हैं, जिससे झोपड़ी के अंदर लगातार ठंडी हवा का प्रवाह बना रहता है. यही कारण है कि तेज धूप और लू के बावजूद अंदर का तापमान काफी कम रहता है.

ग्रामीण बताते हैं कि दिन के समय जब बाहर तापमान 45 डिग्री तक पहुंच जाता है, तब भी इन झोपड़ियों के अंदर ठंडक महसूस होती है. यही वजह है कि कई लोग इसे एसी और कूलर से भी ज्यादा असरदार मानते हैं. इसके अलावा यह झोपड़ी प्राकृतिक सामग्री से बनी होने के कारण स्वास्थ्य के लिए भी सुरक्षित रहती है. आज के समय में जब बिजली की कमी और महंगे उपकरणों की समस्या सामने आती है, ऐसे में यह देसी तकनीक गरीबों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है. यह न सिर्फ सस्ती है बल्कि टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल भी है. ग्रामीणों का यह पारंपरिक ज्ञान आधुनिक जीवन के लिए भी एक प्रेरणा बन सकता है.

ग्रामीणों का देसी जुगाड़
ग्रामीण क्षेत्रों में लोग सीमित संसाधनों के बावजूद अपनी जरूरतों का समाधान खुद ही ढूंढ लेते हैं. धान की पराली से बनी झोपड़ी इसका बेहतरीन उदाहरण है. यह देसी जुगाड़ न सिर्फ सस्ता है बल्कि बेहद प्रभावी भी है. बिना बिजली के ही यह झोपड़ी गर्मी में ठंडक देती है, जिससे लोगों को एसी या कूलर की जरूरत नहीं पड़ती. प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर ग्रामीण पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुंचाते. यह जुगाड़ बताता है कि पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय सामग्री का सही उपयोग करके बड़ी समस्याओं का हल आसानी से निकाला जा सकता है.

पहले भी बनाई पुआल की झोपड़ी
पिपरो निवासी धनीराम सिर पर धान की पराली लेकर अपने घर जाते हुए बताते हैं कि वह इस बार गर्मी से बचने के लिए पुआल की झोपड़ी तैयार करेंगे. उनका कहना है कि यह झोपड़ी कूलर और एसी जैसी ठंडक देती है जबकि इसमें बिजली की कोई जरूरत नहीं होती. धनीराम के अनुसार, उन्होंने पहले भी इस तरह की झोपड़ी बनाई थी और उसमें गर्मी का असर बहुत कम महसूस हुआ था, इसलिए इस बार भी वह उसी पारंपरिक तरीके को अपनाकर अपने परिवार को गर्मी से राहत दिलाना चाहते हैं.

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Rahul Singh

राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.



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